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________________ नवमं पर्व २१७ क्व धर्मः क्व च संक्रोधो वृथा श्राम्यसि दुर्मते । इच्छस्येकत्वमाधातुममृतस्य विषस्य च ॥१३२॥ तस्मादपनयाम्येनं दर्पमद्य तवोद्धतम् । कैलासनगमुन्मूल्य क्षिपाम्यब्धौ समं त्वया ॥१३३॥ ततोऽसौ सर्वविद्यामिातामिस्तत्क्षणाद्वृतः । विकृत्य सुमहद्रूपं सुरेन्द्र इव मीषणम् ॥१३४॥ 'महाबाहुवनेनान्धं ध्वान्त कृत्वा समन्ततः प्रविष्टो धरणी भित्त्वा पातालं पातकोद्यतः ॥१३५॥ आरेभे च समुद्धतु भुजैर्भूरिपराक्रमः । क्रोधप्रचण्डरक्ताक्षो हुङ्कारमुखराननः ॥१३६॥ ततो विषकणक्षेपिलम्बमानोरगाधरः । केसरिक्रमसंप्राप्तभ्रश्यन्मत्तमतङ्गजः ॥१३७॥ संभ्रान्तनिश्चलोत्कर्णसारङ्गककदम्बकः । स्फुटितोद्देश-निष्पीतत्रुटिताखिलनिझरः ॥१३८॥ पर्यस्यदुद्धतारावमहानोकहसंहतिः । स्फुटीकृतशिलाजालसन्धिशब्दैः सुदुःस्वरः ॥१३९॥ पतद्विकटपाषाणरवापूरितविष्टपः । चलितश्चालयन् क्षोणी भृशं कैलासपर्वतः ॥१४०॥ स्फुटितावनिपीताम्बुः प्राप शोषं नदीपतिः । उहुः स्वच्छतया मुक्ता विपरीतं समुद्रगाः ॥११॥ जस्ता व्यलोकयनाशाः प्रमथाः पृथुविस्मयाः । किं किमेतदहो हा-हा-हुँ-हीति प्रसृतस्वराः ॥१४२॥ जहरप्सरसो मीता लताप्रवरमण्डपम् । वयसां निवहाः प्राप्ताः कृतकोलाहला नमः ॥१४३॥ पातालादुस्थितैः क्रूरैरट्टहासैरनन्तरैः । दशवक्त्रैः समं दिग्भिः पुस्फोटे च नभस्तलम् ॥१४॥ रोका जा रहा है ॥१३१।। धर्म कहाँ और क्रोध कहाँ ? अरे दुर्बुद्धि ! तू व्यर्थ ही श्रम कर रहा है और अमृत तथा विषको एक करना चाहता है ॥१३२।। इसलिए मैं तेरे इस उद्धत अहंकारको आज ही नष्ट किये देता हूँ। तू जिस कैलास पर्वतपर बैठा है उसे उखाड़कर तेरे ही साथ अभी समद्र में फेंकता हूँ ॥१३३।। तदनन्तर उसने समस्त विद्याओंका ध्यान किया जिससे आकर उन्होंने उसे घेर लिया। अब दशाननने इन्द्रके समान महाभयंकर रूप बनाया और महाबाहुरूपी वनसे सब ओर सघन अन्धकार फैलाता हुआ वह पृथिवीको भेदकर पातालमें प्रविष्ट हुआ। पाप करनेमें वह उद्यत था ही ॥१३४-१३५॥ तदनन्तर क्रोधके कारण जिसके नेत्र अत्यन्त लाल हो रहे थे, और जिसका मुख क्रोधसे मुखरित था ऐसे प्रबल पराक्रमी दशाननने अपनी भुजाओंसे कैलासको उठाना प्रारम्भ किया ॥१३६|| आखिर, पृथिवीको अत्यन्त चंचल करता हुआ कैलास पर्वत स्वस्थानसे चलित हो गया। उस समय वह कैलास विषकणोंको छोड़नेवाले लम्बे-लम्बे लटकते हुए साँपोंको धारण कर रहा था। सिंहोंकी चपेट में जो मत्त हाथी आ फंसे थे वे छूटकर अलग हो रहे थे। घबड़ाये हुए हरिणोंके समूह अपने कानोंको ऊपरकी ओर निश्चल खड़ा कर इधर-उधर भटक रहे थे। फटी हुई पृथिवीने झरनोंका समस्त जल पी लिया था इसलिए उनकी धाराएँ टूट गयी थीं। बड़े-बड़े वृक्षोंका जो समूह टूट-टूटकर चारों ओर गिर रहा था उससे बड़ा भारी शब्द उत्पन्न हो रहा था। शिलाओंके समूह चटककर चट-चट शब्द कर रहे थे इससे वहाँ भयंकर शब्द हो रहा था। और बडे-बडे पत्थर टट-टटकर नीचे गिर रहे थे तथा उससे उत्पन्न होनेवाले शब्दोंसे समस्त लोक व्याप्त हो रहा था ॥१३७-१४०॥ विदीर्ण पृथिवीने समुद्रका सब जल पी लिया था इसलिए वह सूख गया था। समुद्रकी ओर जानेवाली नदियाँ स्वच्छतासे रहित होकर उलटी बहने लगी थीं ॥१४१॥ प्रमथ लोग भयभीत होकर दिशाओंकी ओर देखने लगे तथा बहुत भारी आश्चर्यमें निमग्न हो 'यह क्या है ? क्या है ? हा-हा-हुँ-ही आदि शब्द करने लगे ॥१४२॥ अप्सराओंने भयभीत होकर उत्तमोत्तम लताओंके मण्डप छोड़ दिये और पक्षियोंके समूह कलकल शब्द करते हुए आकाशमें जा उड़े ॥१४३।। पातालसे लगातार निकलनेवाले दशाननके दसमुखोंको अट्टहाससे दिशाओंके साथ-साथ आकाश फट पड़ा ॥१४४।। १. महावायुवनेनाथ म. । २. निस्फीत ख. । ३. सत्त्वैः सदुश्चरः म. । ४. भुक्त्वा म. । ५. मण्डपात् म. । For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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