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________________ पद्मपुराणे शरत्पयोधराकारतटसंघातसंकटम् । क्षीरेणेव जगत्सर्व क्षालयन्तं करोत्करैः ॥११९॥ क्वचिद्विश्रब्धसंसुप्तमृगाधिपदरीमुखम् । क्वचित्सुप्तशयुश्वासवाताघूर्णितपादपम् ॥१२०॥ क्वचित्परिसरक्रीडस्कुरङ्गककदम्बकम् । क्वचिन्मत्तद्विपवातकलिताधित्यकावनम् ॥१२१॥ क्वचित्पुलकिताकारं प्रसूनप्रकराचितम् । क्वचिदृक्षसटाभारैरुद्ध तैीषणाकृतिम् ॥१२२॥ क्वाचित्पावनेनेव युक्तं शाखामृगाननैः । क्वचिखैङ्गिक्षतस्यन्दिसालादिसुरभीकृतम् ॥१२३॥ क्वचिद्विद्युल्लताश्लिष्टसंभवद्घनसंततिम् । क्वचिद्दिवाकराकारशिखरोद्योतिताम्बरम् ॥१२॥ पाण्डुकस्येव कुर्वाणं विजिगीषां क्वचिद्वनैः । सुरमिप्रसवोत्तुङ्गविस्तीर्णघनपादपैः ॥१२५॥ अवतीर्णश्च तत्रासावपश्यत्तं महामुनिम् । ध्यानार्णवसमाविष्टं तेजसाबद्धमण्डलम् ।।१२६॥ आशाकरिकराकारप्रलम्बितभुजद्वयम् । पन्नगाभ्यामिवाश्लिष्टं महाचन्दनपादपम् ॥१२७॥ आतापनशिलापीठमस्तकस्थं सुनिश्चलम् । कुर्वाणं प्राणिविषयं संशयं प्राणधारिणम् ॥१२८॥ ततो बालिरसावेष इति ज्ञात्वा दशाननः । अतीतं संस्मरन् वैरं जज्वाल क्रोधवह्निना ॥१२९॥ बद्धवा च भृकुटीं भीमा दष्टोष्टः प्रखरस्वरः । बभाण भासुराकारो मुनिमेवं सुनिर्भयः ॥१३०॥ अहो शोभनमारब्धं त्वया कर्तमिदं तपः । यदद्याप्यभिमानेन विमानं स्तम्भ्यते मम ॥१३॥ शिलाएँ ही उसका लम्बा-चौड़ा वक्षःस्थल था, बड़े-बड़े वृक्ष ही उसकी महाभुजाएँ थीं और गुफाएँ ही उसका गम्भीर मुख थीं, इस प्रकार वह पर्वत अपूर्व पुरुषकी आकृति धारण कर रहा था ॥११८॥ वह शरदऋतुके बादलोंके समान सफेद-सफेद किनारोंके समूहसे व्याप्त था तथा किरणोंके समूहसे ऐसा जान पड़ता था मानो समस्त संसारको दूधसे ही धो रहा हो ॥११९।। कहीं उसकी गुफाओंमें सिंह निःशंक होकर सो रहे थे और कहीं सोये हुए अजगरोंकी श्वासोच्छ्वासकी वायुसे वृक्ष हिल रहे थे ।।१२०॥ कहीं उसके किनारोंके वनोंमें हरिणोंका समूह क्रीड़ा कर रहा था और कहीं उसकी अधित्यकाके वनोंमें मदोन्मत्त हाथियोंके समूह स्थित थे ॥१२१॥ कहीं फूलोंके समूहसे व्याप्त होनेके कारण ऐसा जान पड़ता था मानो उसके रोमांच ही उठ रहे हों और कहीं उद्धत रीक्षोंकी लम्बी-लम्बी सटाओंसे उसका आकार भयंकर हो रहा था ॥१२२।। कहीं बन्दरोंके लाल-लाल मुँहोंसे ऐसा जान पड़ता था मानो कमलोंके वनसे ही युक्त हो और कहीं गेंडा-हाथियोंके द्वारा खण्डित साल आदि वृक्षोंसे जो पानी झर रहा था उससे सुगन्ध फैल रही थी ॥१२३।। कहीं बिजलीरूपी लताओंसे आलिंगित मेघोंकी सन्तति उत्पन्न हो रही थी और कहीं सूर्यके समान देदीप्यमान शिखरोंसे आकाश प्रकाशमान हो रहा था ॥१२४॥ जिनके लम्बे-चौड़े सघन वृक्ष सुगन्धित फूलोंसे ऊँचे उठे हुए थे ऐसे वनोंसे वह पर्वत ऐसा जान पड़ता था मानो पाण्डकवनको जीतना ही चाहता हो ॥१२५॥ दशाननने उस पर्वतपर उतरकर उन महामुनिके दर्शन किये। वे महामुनि ध्यानरूपी समुद्र में निमग्न थे और तेजके द्वारा चारों ओर मण्डल बाँध रहे थे ।।१२६॥ दिग्गजोंके शुण्डादण्डके समान उनकी दोनों भुजाएँ नोचेकी ओर लटक रही थीं और उनसे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो सर्पोसे आवेष्टित चन्दनका बड़ा वृक्ष ही हो ॥१२७।। वे आतापन योगमें शिलापीठके ऊपर निश्चल बैठे थे और प्राणियोंके प्रति ऐसा संशय उत्पन्न कर रहे थे कि ये जीवित हैं भी या नहीं ॥१२८॥ तदनन्तर 'यह बालि है' ऐसा जानकर दशानन पिछले वैरका स्मरण करता हुआ क्रोधाग्निसे प्रज्वलित हो उठा ॥१२९|| जो ओंठ चबा रहा था, जिसकी आवाज अत्यन्त कर्कश थी, और जो अत्यन्त देदीप्यमान आकारका धारक था ऐसा दशानन भ्रकुटी बाँधकर बड़ी निर्भयताके साथ मुनिराजसे कहने लगा ॥१३०॥ कि अहो ! तुमने यह बड़ा अच्छा तप करना प्रारम्भ किया है कि अब भी अभिमानसे मेरा विमान १. परिसरत् म. । २. बनेनैव म. । ३. खिङ्गकृतस्यन्दि म. । खङ्गिकृतस्पर्श ब. । ४. संभवध्वनिसन्तति म. । ५. शिखरद्योतिताम्बरम् म, । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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