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________________ २२० पद्मपुराणे इति स्तुत्वा मुनि भूयः प्रणम्य त्रिःप्रदक्षिणम् । नितान्तं स्वं च निन्दित्वा शूत्कारमुखराननः ॥१७३। उपकण्ठं मुनेश्चैत्यभवनं त्रपयान्वितः । विरको विषयासङ्गे प्रविष्टः कैकसीसुतः ॥१७४॥ अनादरेण विक्षिप्य चन्द्रहासमसिं भुवि । आवृतो निजनारी मिश्चक्रे जिनवरार्चनम् ॥१७५॥ निष्कृष्य च स्नसातन्त्रों भुजे वीणामवीवदत् । भक्तिनिर्भरभावश्च जगौ स्तुतिशतैर्जिनम् ॥१७६॥ नमस्ते देवदेवाय लोकालोकावलोकिने । तेजसातीतलोकाय कृतार्थाय महात्मने ॥१७७॥ त्रिलोककृतपूजाय नष्टमोहमहारये । वाणीगोचरतामुक्तगुणसंघातधारिणे ॥१७८॥ महैश्वर्यसमेताय 'विमुक्तिपथदेशिने । सुखकाष्ठासमृद्धाय दूरीभूतकुवस्तवे ॥१७९॥ निःश्रेयसस्य भूतानां हेतवेऽभ्युदयस्य च । महाकल्याणमूलाय वेधसे सर्वकर्मणाम् ॥१८॥ ध्याननिर्दग्धपापाय जन्मविध्वंसकारिणे । गुरवे गुरुमुक्ताय प्रणतायानतात्मने ॥१८१॥ आद्यन्तपरिमुक्ताय संतताद्यन्तयोगिने । अज्ञातपरमार्थाय परमार्थावबोधिने ॥१८२॥ सर्वशून्यप्रतिज्ञाय सर्वास्तिक्योपदेशिने । सर्वक्षणिकपक्षाय कृत्स्ननित्यत्व शिने ॥१८३॥ पृथक्त्वैकत्ववादाय सर्वानेकान्तदेशिने । जिनेश्वराय सर्वस्मा एकस्मै शिवदायिने ॥१८४॥ अवस्थामें ही विषयोंको छोड़कर मोक्ष-मार्गमें स्थित हुए हैं वे पुण्यात्मा हैं, महाशक्तिशाली है और मक्तिलक्ष्मीके समीपमें विचरनेवाले हैं ॥१७२। इस प्रकार स्तुति कर उसने मनिराजको प्रणाम कर तीन प्रदक्षिणाएं दीं, अपने आपकी बहुत निन्दा की और दुःखवश मुँहसे सू-सू शब्द कर रुदन किया ॥१७३॥ मुनिराजके समीप जो जिन-मन्दिर था लज्जासे युक्त और विषयोंसे विरक्त रावण उसीके अन्दर चला गया ॥१७४।। वहां उसने चन्द्रहास नामक खड्गको अनादरसे पृथिवीपर फेंक दिया और अपनी स्त्रियोंसे युक्त होकर जिनेन्द्रदेवकी पूजा की ॥१७५॥ उसके भाव भक्तिमें इतने लीन हो गये थे कि उसने अपनी भुजाकी नाड़ीरूपी तन्त्रीको खींचकर वीणा बजायी और सैकड़ों स्तुतियोंके द्वारा जिनराजका गुणगान किया ॥१७६।। वह गा रहा था कि नाथ ! आप देवोंके देव हो, लोक और अलोकको देखनेवाले हो, आपने अपने तेजसे समस्त लोकको अतिक्रान्त कर दिया है, आप कृतकृत्य हैं, महात्मा हैं। तीनों लोक आपकी पूजा करते हैं, आपने मोह रूपी महा शत्रुको नष्ट कर दिया है, आप वचनागोचर गुणोंके समूहको धारण करनेवाले हैं। आप महान् ऐश्वर्यसे सहित हैं, मोक्षमार्गका उपदेश देनेवाले हैं, सूखकी परम सीमासे समद्ध हैं, आपने समस्त कत्सित वस्तुओंको दूर कर दिया है। आप प्राणियोंके लिए मोक्ष तथा स्वर्गके हेतु हैं, महाकल्याणोंके मूल कारण हैं, समस्त कार्योंके विधाता हैं। आपने ध्यानाग्निके द्वारा समस्त पापोंको जला दिया है, आप जन्मका विध्वंस करनेवाले हैं, गुरु हैं, आपका कोई गुरु नहीं है, सब आपको प्रणाम करते हैं और आप स्वयं किसीको प्रणाम नहीं करते। आप आदि तथा अन्तसे रहित हैं, आप निरन्तर आदि तथा अन्तिम योगी हैं, आपके परमार्थको कोई नहीं जानता पर आप समस्त परमार्थको जानते हैं। आत्मा रागादिक विकारोंसे शून्य है ऐसा उपदेश आपने सबके लिए दिया है, 'आत्मा है', 'परलोक है' इत्यादि आस्तिक्यवादका उपदेश भी आपने सबके लिए दिया है, पर्यायार्थिक नयसे संसारके समस्त पदार्थ क्षणिक हैं इस पक्षका निरूपण आपने जहाँ किया है वहाँ द्रव्यार्थिक नयसे समस्त पदार्थोंको नित्य भी आपने दिखलाया है। हमारी आत्मा समस्त परपदार्थोसे पृथक् अखण्ड एक द्रव्य है ऐसा कथन आपने किया है, आप सबके लिए अनेकान्त धर्मका प्रतिपादन करनेवाले हैं, कमरूप शत्रुओंको जीतनेवालोंमें श्रेष्ठ हैं, सर्व पदार्थों को जाननेवाले होनेसे सर्वरूप हैं, अवण्ड चैतन्य पुंजके धारक होनेसे एकरूप हैं और मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं अतः आपको १. विमुक्तपथ -म.। २. दूरोभूत-दुरीहित ब.। ३. न ज्ञातः परमार्थो यस्य स तस्मै । ४. देशिने म. । ५. -मादाय क., ब, । ६. -दशिने क.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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