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________________ पद्मपुराणे निर्वास्यासौ स्थितः सार्धं तव स्वस्त्रा महाबलः । उपकारित्वमेतस्मात्संप्राप्तः स्वजनः स ते ॥ ३८ ॥ ततो दशाननोऽवादीत् प्रिये युद्धाद् बिभेमि न । स्थितस्त्वद्वचने किन्तु शेषैरेवास्मि कारणैः ॥३९॥ अथ चन्द्रोदरे कालं प्राप्ते कर्मनियोगतः । वनितास्यानुर/धाख्या वराकी शरणोज्झिता ॥४०॥ इतश्वेतश्च विद्याया बलेनाथ विवर्जिता । अन्तर्वत्नी वने भीमे बभ्राम हरिणी यथा ॥ ४१ ॥ असूत च सुतं कान्तं मणिकान्तमहीधरे । मृदुपल्लवपुष्पौघच्छन्ने समशिलातले ॥४२॥ ततोऽसौ क्रमतो वृद्धिं नीतो विपिनवासया । उद्विग्नचित्तया मात्रा तदाशास्थितजीवया ॥ ४३ ॥ यतोऽयं प्रतिपक्षेण गर्भ एव विराधितः । ततो विराधिताभिख्यां प्रापितो भोगवर्जितः ॥४४॥ न तस्य गौरवं चक्रे कश्चिदप्यवनौ नरः । प्रच्युतस्य निजस्थानात् केशस्यवोत्तमाङ्गतः ॥४५॥ प्रतिकर्तुमशकोsit वैरं चित्तेन धारयन् । आचारागतवृत्तिस्थो देशान् पर्याट वाञ्छितान् ॥४६॥ रेमे वर्षधराग्रेषु काननेषु च चारुषु । तथातिशयदेशेषु गीर्वाणागमनेषु च ||४७ || ध्वजच्छत्रादिरम्येषु संकुलेषु गजादिभिः । वीराणां विभ्रमं पश्यन् संग्रामेषु समं सुरैः || ४८ ॥ नगर्या मथ लङ्कायां सुरेशस्येव तिष्ठतः । परान् प्राप्नुवतो भोगान् दशवक्त्रस्य भास्वतः ||४९| प्रतिकूलितवानाज्ञां वालिर्बलसमन्वितः । विद्याभिरद्भुतं कर्म कुर्वतीभिरुपासितः ||५०|| दशास्येन ततो दूतः प्रेषितोऽस्मै महामतिः । जगाद वानराधीशं स्वामिनो मानमुद्वहन् ॥५१॥ २१० अलंकारोदय नगरको जब राजा सूर्यरजने छोड़ा था तब चन्द्रोदर नामा विद्याधर तुम्हारी इच्छा के प्रतिकूल उस नगर में जम गया था सो उसे निकालकर महाबलवान् खरदूषण तुम्हारी बहन के साथ उसमें रह रहा है इस प्रकार तुम्हारे स्वजन उससे उपकारको भी प्राप्त हुए हैं ||३७-३८ || यह कहकर जब मन्दोदरी चुप हो रही तब दशाननने कहा कि हे प्रिये ! यद्यपि मैं युद्धसे नहीं डरता हूँ तो भी अन्य कारणों को देखता हुआ मैं तुम्हारे वचनोंमें स्थित हूँ अर्थात् तुम्हारे कहे अनुसार उसका पीछा नहीं करता हूँ ||३९|| अथानन्तर कर्मोंके नियोगसे चन्द्रोदर विद्याधर कालको प्राप्त हुआ सो उसकी दीन-हीन अनुराधा नामकी गर्भवती स्त्री शरणरहित हो तथा विद्याके बलसे शून्य हो हरिणीकी नांई भयंकर वनमें इधर-उधर भटकने लगी ||४० - ४१|| वह भटकती भटकती मणिकान्त नामक पर्वतपर पहुँची । वहाँ उसने कोमल पल्लव और फूलों के समूहसे आच्छादित समशिलातलपर एक सुन्दर पुत्र उत्पन्न किया || ४२|| तदनन्तर जिसका चित्त निरन्तर उद्विग्न रहता था, और पुत्रकी आशासे ही जिसका जीवन स्थित था ऐसी उस वनवासिनी माताने क्रमक्रमसे उस पुत्रको बड़ा किया ||४३|| चूँकि शत्रुने उस पुत्रको गर्भमें ही विराधित किया था इसलिए भोगों से रहित उस पुत्रका माताने विराधित नाम रखा || ४४ || जिस प्रकार अपने स्थान - मस्तक से च्युत हुए केशका कोई आदर नहीं करता उसी प्रकार उस विराधितका पृथिवीपर कोई भी आदर नहीं करता था || ४५|| वह शत्रुसे बदला लेने में समर्थ नहीं था इसलिए मनमें ही वैर धारण करता था और कुछ परम्परागत आचारका पालन करता हुआ इच्छित देशों में घूमता रहता था ||४६|| वह कुलाचलों के ऊपर, मनोहर वनों में तथा जहाँ देवोंका आगमन होता था ऐसे अतिशयपूर्ण स्थानों में क्रीड़ा किया करता था ||४७|| वह ध्वजा, छत्र आदिसे सुन्दर तथा हाथियों आदि व्याप्त देवोंके साथ होनेवाले युद्धों में वीर मनुष्योंकी चेष्टाएँ देखता हुआ घूमता फिरता था || ४८ || अथानन्तर उत्कृष्ट भोगोंको प्राप्त करता हुआ देदीप्यमान दशानन लंकानगरी में इन्द्रके समान रहता था || ४९ || सो आश्चर्यजनक कार्य करनेवाली विद्याओंसे सेवित बलवान् बाली उसकी आज्ञाका अतिक्रम करने लगा ||५०॥ तदनन्तर दशाननने बालीके पास महाबुद्धिमान् दूत भेजा । सो स्वामीके गर्वको धारण करता हुआ दूत बालीके पास जाकर कहने लगा कि दशानन इस १. -नुरोधाख्या म । २ अतोऽयं म । ३. वृत्तस्थो ख. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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