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________________ अष्टमं पर्व २०३ युद्धे वैश्रवणो येन निर्जितः पुरुतेजसा । अहमप्यमुना नीतो भङ्ग कृतरणश्चिरम् ॥४८५॥ सृष्टं वीररसेनेव वपुस्तस्य महात्मनः । 'दुरीक्ष्यो व्योममध्यस्थसवितेव निदाघजः ॥४८६॥ इति श्रुत्वा सुराधीशः संग्रामाय कृतोद्यतिः । निरुद्धो मन्त्रिवण नय याथात्म्यवेदिना ॥४८७॥ जगाद च स्मितं श्रुत्वा मातुलं क्व स यास्यति । भयं मुञ्च सुविश्रब्धो मवास्मिन्नासने सुखम् ॥४८॥ जामातुरथ वाक्येन परित्यज्य रिपोर्भयम् । पुरं सुरवरोद्गीतमध्युवास यमः सुखी ॥४८९॥ विधायान्तकसंमानं सुरेशोऽन्तःपुरं ययौ । कामभोगसमुद्रेऽसौ तत्र मग्नो महामदः ॥४९०॥ दशास्यचरितं तस्मै यतपतिनोदितम् । वनवासो धनपतेर्भनिनो यश्च संयुगे ॥४९१॥ सर्वमैश्वर्यमत्तस्य विस्मृतं तस्य तत्क्षणात् । अभ्यग्रपठितं शास्त्रं यथाभ्यसनवर्जितम् ॥४९२॥ कृतोपलम्मं स्वप्नेऽपि ज्ञायते वस्तुलेशतः । निरन्वयं तु तस्येदं विस्मृतं पूर्वचोदितम् ॥४९३॥ प्राप्य वा सुरसंगीतपुरस्य पतितां यमः । विसस्मार परिप्राप्तां परिभूतिं दशाननात् ॥४९४॥ मेने च मम सर्वश्रीदुहिता रूपशालिनी । सा च गीर्वाणनाथस्य प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ॥४९५॥ अत्यन्तमन्तरङ्गोऽयं संबन्धो महता सह । अतो जन्म कृतार्थ मे प्राप्य शक्रप्रतीक्ष्यताम् ॥४९६॥ ततो महोदयोत्साहः श्रीमानुद्वासितान्तकः । नगरं सूर्यरजसे ददौ किष्किन्धसंज्ञकम् ॥१९७॥ तथाक्षरजसे किष्कुपुरं परमसंपदम् । प्राप्य गोत्रक्रमायाते नगरे तो सुखं स्थितौ ॥४९८॥ इच्छा हो सो करें परन्तु अब मैं यमपना अर्थात् यम नामा लोकपालका कार्य नहीं करूँगा ।।४८४।। विशाल तेजको धारण करनेवाले जिस योधाने पहले युद्ध में वैश्रवणको जीता था उसी योद्धा दशाननने मुझे भी पराजित किया है। यद्यपि मैं चिरकाल तक उसके साथ युद्ध करता रहा पर स्थिर नहीं रह सका ॥४८५।। उस महात्माका शरीर ऐसा जान पड़ता है मानो वीर रससे ही बना हो। वह आकाशके मध्यमें स्थित ग्रीष्मकालीन सूर्यके समान दुनिरीक्ष्य है अर्थात् उसकी ओर कोई आँख उठाकर भी नहीं देख सकता है ।।४८६।। यह सुनकर इन्द्र युद्धके लिए उद्यत हुआ परन्तु नीतिको यथार्थताको जाननेवाले मन्त्रिमण्डलने उसे रोक दिया ॥४८७॥ इन्द्र, यमका जामाता था सो यमकी बात सुन मन्द हास्य करते हुए उसने कहा कि हे मातुल! दशानन कहाँ जायेगा ? तुम भयको छोड़ो और निश्चिन्त होकर इस आसनपर सुखसे बैठो ॥४८८॥ इस प्रकार जामाताके वचनसे शत्रुका भय छोड़कर यम इन्द्रके द्वारा बतलाये हुए नगरमें सुखसे रहने लगा ॥४८९॥ बहत भारी गर्वको धारण करनेवाला इन्द्र यमका सन्मानकर अन्तःपरमें चला गया और वहाँ जाकर कामभोगरूपी समुद्र में निमग्न हो गया ॥४९०॥ यमने दशाननका जो चरित्र इन्द्रके लिए कहा था तथा युद्ध में दशाननसे पराजित होकर वैश्रवणको जो वनवास करना पड़ा था, ऐश्वर्यके मदमें मस्त रहनेवाले इन्द्रके लिए वह सब क्षण-भरमें उस प्रकार विस्मृत हो गया जिस प्रकार कि पहले पढ़ा शास्त्र अभ्यास न करनेपर विस्मृत हो जाता है ।।४९१-४९२॥ स्वप्नमें उपलब्ध वस्तुका कुछ तो भी स्मरण रहता है परन्तु इन्द्रके लिए पूर्व कथित बातका निर्मूल विस्मरण हो गया ॥४९३।। इधर इन्द्रका यह हाल हुआ उधर यम सुरसंगीत नामा नगरका स्वामित्व पाकर दशाननसे प्राप्त हुए तिरस्कारको बिलकुल भूल गया ।।४९४।। वह मानता था कि मेरी पुत्री सर्वश्री अत्यन्त रूपवती है और इन्द्रको प्राणोंसे भी अधिक प्रिय है ।।४९५॥ इस प्रकार एक बड़े पुरुषके साथ मेरा अन्तरंग सम्बन्ध है इसलिए इन्द्रका सम्मान पाकर मेरा जन्म कृतकृत्य अर्थात् सफल हुआ है ॥४९६।। तदनन्तर महान् अभ्युदय और उत्साहको धारण करनेवाले दशाननने यमको हटाकर किष्किन्ध नामा नगर सूर्यरजके लिए दिया ॥४९७॥ और ऋक्षरजके लिए परम सम्पत्तिको १. दुरीक्षो म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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