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________________ १८४ पपपुराणे विवेदेति च धिक्कष्टं संसारं दुःखमाजनम् । चक्रवत्परिवर्तन्ते प्राणिनो यत्र योनिषु ॥२२०॥ 'पश्यैश्वर्यविमूढेन किं वस्तु प्रस्तुतं मया। बन्धुविध्वंसनं यत्र क्रियते गर्ववत्तया ॥२२१॥ उदात्तमिति चावोचद भो भो शृण दशानन । किमिदं क्रियते पापं क्षणिकश्रीप्रचोदितम् ॥२२॥ मातृष्वसुः सुतोऽहं ते सोदरप्रीतिसंगतः । ततो बन्धुषु नो युक्तं व्यवहर्तुमसांप्रतम् ॥२२३॥ कृत्वा प्राणिवधं जन्तुर्मनोज्ञविषयाशया। प्रयाति नरकं भीमं सुमहादुःखसंकुलम् ॥२२४॥ यथैकदिवसं राज्यं प्राप्त संवत्सरं वधम् । प्राप्नोति सदृशं तेन निश्चये विषयैः सुखम् ॥२२५॥ चक्षुःपक्ष्मपुटासङ्गक्षणिकं ननु जीवितम् । न वेल्सि किं यतः कर्म कुरुते भोगकारणम् ।।२२६॥ ततो हसन्नुवाचेदं दशास्यः करुणोज्झितः । धर्मश्रवणकालोऽयं न वैश्रवण वर्तते ॥२२७॥ मत्तस्तम्बेरमारूडैमण्डलाग्रकरैर्नरैः । क्रियते मारणं शत्रोर्न तु धर्मनिवेदनम् ॥२२८॥ मागे तिष्ठ कृपाणस्य किं व्यर्थ बहु भाषसे । कुरु वा प्रणिपातं मे तृतीयास्ति न ते गतिः ॥२२९॥ अथवा धनपालस्त्वं द्रविणं मम पालय । कुर्वाणो हि निजं कर्म पुरुषो नैव लजते ॥२३०॥ ततो वैश्रवणो भूय उवाचेति दशाननम् । नूनमायुस्तव स्वल्पं कर येनेति भाषसे ॥२३॥ भूयोऽपि मानसं बिभ्रत्ततो रोषणरूषितम् । अस्ति चेत्तव सामर्थ्य जहीत्याह दशाननः ॥२३२॥ जगाद स ततो ज्येष्टस्त्वं मां प्रथममाजहि । वीर्यमक्षतकायानां शूराणां नहि वर्धते ॥२३३॥ ही अनुपम विषाद और राज्यलक्ष्मीसे उदासीनताको प्राप्त हुआ। जिस प्रकार पहले बाहुबलि अपने भाई भरतसे द्वेष कर पछताये उसी प्रकार वैश्रवण भी भाई दशाननसे विरोध कर पछताया। वह मन ही मन शान्त अवस्थाको प्राप्त होता हुआ विचार करने लगा कि जिस संसारमें प्राणी नाना योनियोंमें चक्रकी भाँति परिवर्तन करते रहते हैं वह संसार दुःखका पात्र है, कष्ट स्वरूप है, अतः उसे धिक्कार हो ॥२१९-२२०।। देखो, ऐश्वर्यमें मत्त होकर मैंने यह कौन-सा कार्य प्रारम्भ कर रखा है कि जिसमें अहंकारवश अपने भाईका विध्वंस किया जाता है ॥२२१॥ वह इस प्रकार उत्कृष्ट वचन कहने लगा कि हे दशानन ! सुन, क्षणिक राज्यलक्ष्मीसे प्रेरित होकर यह कौन-सा पापकर्म किया जा रहा है ? ॥२२२॥ मैं तेरी मौसीका पुत्र हूँ अतः तुझपर सगे भाई-जैसा स्नेह करता हूँ। भाइयोंके साथ अनुचित व्यवहार करना उचित नहीं है ।।२२३।। यह प्राणी मनोहर विषयोंकी आशासे प्राणियोंका वध कर बहुत भारी दुःखोंसे युक्त भयंकर नरकमें जाता है ॥२२४।। जिस प्रकार कोई मनुष्य एक दिनका तो राज्य प्राप्त करे और उसके फलस्वरूप वर्ष-भर मृत्युको प्राप्त हो उसी प्रकार निश्चयसे यह प्राणी विषयोंके द्वारा क्षणस्थायी सुख प्राप्त करता है और उसके फलस्वरूप अपरिमित काल तक दुःख प्राप्त करता है ।।२२५॥ यथार्थमें यह जीवन नेत्रोंकी टिमकारके समान क्षणभंगुर है सो हे दशानन ! क्या तू यह जानता नहीं है जिससे भोगोंके निमित्त यह कार्य कर रहा है ? ॥२२६॥ तब दयाहीन दशाननने हंसते हुए कहा कि हे वैश्रवण! यह धर्मश्रवण करनेका समय नहीं है ॥२२७|| मदोन्मत्त हाथियोंपर चढ़े तथा तलवारको हाथमें धारण करनेवाले मनुष्य तो शत्रुका संहार करते हैं न कि धर्मका उपदेश ॥२२८|| व्यर्थ ही बहुत क्यों बक रहा है ? या तो तलवारके मार्ग में खड़ा हो या मेरे लिए प्रणाम कर। तेरी तीसरी गति नहीं है ।।२२९।। अथवा तू धनपाल है सो मेरे धनकी रक्षा कर। क्योंकि जिसका जो अपना कार्य होता है उसे करता हुआ वह लज्जित नहीं होता ॥२३०॥ तब वैश्रवण फिर दशाननसे बोला कि निश्चय ही तेरी आयु अल्प रह गयी है इसीलिए तू इस प्रकार कर वचन बोल रहा है ॥२३१।। इसके उत्तरमें रोषसे रूषित मनको धारण करनेवाले दशाननने फिर कहा कि यदि तेरी सामथ्यं है तो मार ।।२३२।। तब वैश्रवणने कहा कि तू बड़ा है इसलिए प्रथम तू ही मुझे मार क्योंकि जिनके शरीरमें १. पश्यैश्वर्यमूढेन म. । २. विषयी म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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