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________________ अष्टमं पर्व बभूव सुमहज्जन्यं कृतविक्रान्तसंमदम् । कातरोत्पादितत्रासं शिरःक्रीतयशोधनम् ॥२०७॥ ततो निजं बलं नीतं खेदं यक्षमटैश्विरात् । स धारयितुमारब्धो दशास्यो रणमस्तकम् ॥२०८॥ अभ्यायान्तं च तं दृष्ट्वा सितातपनिवारणम् । कालमेघमिवोर्ध्व स्थरजनीकरमण्डलम् ॥२०९॥ सचापं तमिवासक्तशचीपतिशरासनम् । हेमकण्टकसंवीतं 'विद्युतालमिवाचितम् ॥२१०॥ किरीटं बिभ्रतं नानारत्नसङ्गविराजितम् । युक्तं तमिव वज्रेण छादयन्तं नभस्विषा ॥ २११॥ विलक्षाश्चाभवन् यक्षा विषण्णाक्षाः क्षतौजसः । पराङ्मुखक्रियायुक्ताः क्षणात् क्षीणरणाशयाः ॥२१२॥ त्रासाकुलितचित्तेषु ततो यक्षपदातिषु । आर्वतमिव यातेषु भ्रमत्सु सुमहारवम् ॥२१३॥ स्वसेनामुखतां जग्मुर्य क्षाणां बहवोऽधिपाः । पुनरेभिः कृतं सैन्यं रणस्याभिमुखं तथा ॥२१४॥ तत उच्छेत्तुमारब्धो यक्षनाथान् दशाननः । उत्पयोत्पत्य गगने सिंहो मत्तगजानिव ॥ २१५ ॥ प्रेरितः कोपवातेन दशाननतनूनपात् । शस्त्रज्वालाकुलः शत्रुसैन्यकक्षे व्यजृम्भत ॥ २१६ ॥ न सोऽस्ति पुरुषो भूमौ रथे वाजिनि वारणे । विमाने वा न यरिछद्रः कृतो दाशाननैः शरैः ॥ २१७॥ ततोऽभिमुखमायातं दृष्ट्वा दशमुखं रणे । अभजद्वान्धवस्नेहं परं वैश्रवणः क्षणात् ॥ २१८|| विषादमतुलं चागान्निर्वेदं च नृपश्रियः । यथा बाहुबली पूर्व शमकर्मणि संगतः ॥ २१९ ॥ मुखके समान था तथा जिनकी धार पैनी थी, ऐसे चक्रों, यमराजकी जिह्वाके समान दिखने वाली तथा खूनकी बूँदें बरसानेवाली तलवारों, उसके रोमके समान दिखनेवाले भाले, यमराजकी प्रदेशिनी अंगुलीकी उपमा धारण करनेवाले बाणों, यमराजकी भुजाके आकार परिघ नामक शस्त्रों और उनकी मुट्ठी के समान दिखनेवाले मुद्गरोंसे दोनों सेनाओं में बड़ा भारी युद्ध हुआ । उस युद्ध जहाँ पराक्रमी मनुष्योंको हर्षं हो रहा था वहाँ कातर मनुष्योंको भय भी उत्पन्न हो रहा था। दोनों ही सेनाओंके शूरवीर अपना सिर दे-देकर यशरूपी महाधन खरीद रहे थे । २०५ - २०७।। तदनन्तर चिरकाल तक यक्षरूपी भटोंके द्वारा अपनी सेनाको खेद खिन्न देख दशानन उसे सँभालनेके लिए तत्पर हुआ || २०८|| तदनन्तर जिसके ऊपर सफेद छत्र लग रहा था और उससे जो उस काले मेघ के समान दिखाई देता था जिसपर कि चन्द्रमाका मण्डल चमक रहा था, जो धनुषसे सहित था और उससे इन्द्रधनुष सहित श्याम मेघके समान जान पड़ता था, सुवर्णमय कवचसे युक्त होने के कारण जो बिजली से युक्त श्याम मेघके समान दिखाई देता था, जो नाना रत्नोंके समागमसे सुशोभित मुकुट धारण कर रहा था और उससे ऐसा जान पड़ता था मानो कान्तिसे आकाशको आच्छादित करता हुआ वज्रसे युक्त श्याम मेघ ही हो। ऐसे दशाननको आता हुआ देख यक्षोंकी आँखें चौंधिया गयीं, उनका सब ओज नष्ट हो गया, युद्धसे विमुख हो भागनेकी चेष्टा करने लगे और क्षण-भर में उनका युद्धका अभिप्राय समाप्त हो गया ॥ २०९ - २१२ ॥ तदनन्तर जिनके चित्त भयसे व्याकुल हो रहे थे ऐसे यक्षोंके पैदल सैनिक महाशब्द करते हुए जब भ्रमर में पड़े के समान घूमने लगे तब यक्षोंके बहुत सारे अधिपति अपनी सेनाके सामने आये और उन्होंने सेनाको फिरसे युद्ध के सम्मुख किया ॥ २१३ - २१४ ॥ तदनन्तर जिस प्रकार सिंह आकाशमें उछल-उछलकर मत्त हाथियों को नष्ट करता है उसी प्रकार दशानन यक्षाधिपतियोंको नष्ट करनेके लिए तत्पर हुआ ॥२१५॥ शस्त्ररूपीं ज्वालाओंसे युक्त दशाननरूपी अग्नि, क्रोधरूपी वायुसे प्रेरित होकर शत्रुसेनारूपी वनमें वृद्धिको प्राप्त हो रही थी || २१६ | उस समय पृथिवी, रथ, घोड़े, हाथी अथवा विमानपर ऐसा एक भी आदमी नहीं बचा था जो रावणके बाणोंसे सछिद्र न हुआ हो || २१७ || तदनन्तर युद्ध में दशाननको सामने आता देख वैश्रवण, क्षण-भर में भाईके उत्तम स्नेहको प्राप्त हुआ || २१८ || साथ ३. सितातपत्रवारणम् म । ४ विद्युतात- म । ५. मायान्तं म । १. साधारयितु म । २. अभ्यायातं म । ६. संगते ख. म. । Jain Education International १८३ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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