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________________ अष्टमं पर्व १७९ तस्य नन्दनमालायामुत्पन्ना वरकन्यका । राजीवसरसी नाम्ना पति प्राप्ता विभीषणम् ॥१५॥ कान्तया कान्तया साकं न स प्राप रति कृती । देववत् परमाकारः पद्मया पद्मया तया ॥१५२॥ अथ मन्दोदरी गर्भ कालयोगाददीधरत् । सद्यः कल्पितचित्तस्थदोहदाहारिविभ्रमा ॥१५३॥ नीता च जनकागारं प्रसूता 'बालकं वरम् । इन्द्र जित्ख्यातिमायातो यः समस्तमहीतले ॥१५॥ मातामहगृहे वृद्धि प्राप्तश्च जननन्दनः । स कुर्वन् निर्मरक्रीडां सिंहशाव इवोत्तमाम् ॥१५५।। ततोऽसौ पुनरानीता सपुत्रा भर्तुरन्तिकम् । दत्तदुःखा पितुः स्वस्य पुत्रस्य च वियोगतः ॥१५६॥ दशग्रीवोऽथ पुत्रास्यं दृष्ट्वा परममागतः । आनन्दं पुत्रतो नान्यत्प्रीतेरायतनं परम् ॥१५७॥ कालक्रमात् पुनर्गम दधाना पितुरन्तिकम् । नीता सुखं प्रसूता च मेघवाहनबालकम् ।।१५८॥ भर्तुरन्तिकमानीता पुनः सा भोगसागरे । पतिता स्वेच्छयातिष्ठद् गृहीतपतिमानसा ॥१५९।। दारको स्वजनानन्दं कुर्वाणौ चारुविभ्रमौ । तौ युवत्वं परिप्राप्ती महोक्षविपुलेक्षणौ ।।१६०॥ अथ वैश्रवणो यासां कुरुते स्वामिता पुराम् । व्यध्वंसयदिमा गत्वा कुम्भकर्णः सहस्रशः ।।१६१॥ तासु रत्नानि वस्त्राणि कन्यकाश्च मनोहराः । गणिकाश्चानयद्वीरः स्वयंप्रभपुरोत्तमम् ।।१६२॥ अथ वैश्रवणः ऋद्धो ज्ञात्वा पृथुकचेष्टितम् । सुमालिनोऽन्तिकं दूतं प्रजिघायातिगर्वितः ॥१६॥ प्रविवेश ततो दूतः प्रतिहारनिवेदितः । उपचारं च संप्राप्तः कृतकं लोकमार्गतः ॥१६४॥ करता था जो मयका महामित्र था ।।१५०। उसकी नन्दनमाला नामकी स्त्रीसे राजीवसरसी नामकी कन्या उत्पन्न हुई थी वह विभीषणको प्राप्त हुई ॥१५१|| देवोंके समान उत्कृष्ट आकारको धारण करनेवाला बुद्धिमान् विभीषण, लक्ष्मीके समान सुन्दरी उस राजीवसरसी स्त्रीके साथ क्रीड़ा करता हुआ तृप्तिको प्राप्त नहीं हुआ॥१५२॥ तदनन्तर समय पाकर मन्दोदरीने गर्भ धारण किया। उस समय उसके चित्तमें जो दोहला उत्पन्न होते थे उनकी पूर्ति तत्काल की जाती थी। उसके हावभाव भी मनको हरण करनेवाले थे ॥१५३|| राजा मय पुत्रीको अपने घर ले आया वहाँ उसने उस उत्तम बालकको जन्म दिया जो समस्त पृथ्वीतलमें इन्द्रजित् नामसे प्रसिद्ध हुआ॥१५४॥ लोगोंको आनन्दित करनेवाला इन्द्रजित् अपने नानाके घर ही वृद्धिको प्राप्त हुआ। वहाँ वह सिंहके बालकके समान उत्तम क्रीड़ा करता हुआ सुखसे रहता था ॥१५५।। तदनन्तर मन्दोदरी पुत्रके साथ अपने भर्ता दशाननके पास लायी गयी सो अपने तथा पुत्रके वियोगसे वह पिताको दुःख पहुँचानेवाली हुई ।।१५६।। दशानन पुत्रका मुख देख परम आनन्दको प्राप्त हुआ। यथार्थमें पुत्रसे बढ़कर प्रीतिका और दूसरा स्थान नहीं है ।।१५७|| कालक्रमसे मन्दोदरीने फिर गर्भ धारण किया सो पुनः पिताके समीप भेजी गयी। अबकी बार वहाँ उसने सुखपूर्वक मेघवाहन नामक पुत्रको जन्म दिया ||१५८|| तदनन्तर वह पुनः पतिके पास आयी और पतिके मनको वश कर इच्छानुसार भोगरूपी सागरमें निमग्न हो गयी ॥१५९|| सुन्दर चेष्टाओंके धारी दोनों बालक आत्मीयजनोंका आनन्द बढ़ाते हुए तरुण अवस्थाको प्राप्त हुए। उस समय उनके नेत्र किसी महावृषभके नेत्रोंके समान विशाल हो गये थे ।।१६०|| ___ अथानन्तर वैश्रवण जिन नगरोंका राज्य करता था, कुम्भकर्ण हजारों बार जा-जाकर उन नगरोंको विध्वस्त कर देता था ॥१६१।। उन नगरोंमें जो भी मनोहर रत्न, वस्त्र, कन्याएँ अथवा गणिकाएं होती थीं शूरवीर कुम्भकर्ण उन्हें स्वयंप्रभनगर ले आता था ॥१६२॥ तदनन्तर जब वैश्रवणको कुम्भकर्णको इस बालचेष्टाका पता चला तब उसने कुपित होकर सुमालीके पास दूत भेजा। वैश्रवण इन्द्रका बल पाकर अत्यन्त गर्वित रहता था ||१६३॥ तदनन्तर द्वारपालके द्वारा १. बालकंदलम् म. । २. -स्तस्य ख. । ३. स्वयं म. । ४. तिष्ठन् म. । ५. गृहीता म. । ६. मणिका ख. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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