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________________ १८० पद्मपुराणे उवाचेदं तथा दूतो वाक्यालङ्कारसंज्ञितः । समक्षं दशवक्त्रस्य सुमालिनमिति क्रमात् ॥१६५॥ समस्तभुवनव्यापिकीर्तिवैश्रवणश्रुतिः' । वदतीदं महाराजो भवन्तं कुरु चेतसि ॥१६६॥ पण्डितोऽसि कुलीनोऽसि लोकज्ञोऽसि महानसि । अकार्यसंगभीतोऽसि देशकोऽसि सुवर्त्मसु ॥१६७॥ एवंविधस्य ते युक्तं कुर्वन्तं शिशुचापलम् । प्रमत्तचेतसं पौत्रं निवारयितुमात्मनः ॥१६॥ तिरश्चां मानुषाणां च प्रायो भेदोऽयमेव हि । कृत्याकृत्यं न जानन्ति यदेकेऽन्यत्तु तद्विदः ॥१६९॥ विस्मरन्ति च नो पूर्व वृत्तान्तं दृढमानसाः । जातायामपि कस्याञ्चिद्भूतौ विद्युत्समद्युतौ ॥१७०॥ शान्तिौलिवधेनैव शेषस्य स्यात् कुलस्य ते । को हि स्वकुलनिर्मूलध्वंसहेतुक्रियां भजेत् ॥१७॥ समुद्रीचिसंसक्तः शक्रस्य ध्वस्तविद्विषः । प्रतापो विस्मृतः किं ते यतोऽनुचितमीहते ॥१७२॥ स त्वं क्रीडसि मण्डूको दंष्ट्राकण्टकसंकटे । वक्त्ररन्ध्रे भुजङ्गस्य विषाग्निकणमोचिनि ॥१७३॥ नियन्तुमथ शक्नोषि नैतं तस्करदारकम् । ततो ममार्पयायव करोम्यस्य नियन्त्रणम् ॥१७॥ नैवं चेत् कुरुते पश्य ततश्चारकवेश्मनि । निगडैः संयुतं पौत्रं यात्यमानमनेकधा ॥१७५॥ अलंकारोदयं त्यक्त्वा चिरं कालमवस्थितः । तदेव विवरं भूयः प्रवेष्टुमभिवान्छसि ॥१७६।। कुपिते मयि शके वा न तेऽस्ति शरणं भुवि । जलबुदबुदवद्वातादचिरादेव नश्यसि ॥१७७|| ततः परुषवाग्वातवेगाहतमनोजलः । क्षोभं परममायातो दशाननमहार्णवः ।।१७८॥ समाचार भेजकर दूतने भीतर प्रवेश किया। दूत लोकाचारके अनुसार योग्य विनयको प्राप्त था ॥१६४।। दूतका नाम वाक्यालंकार था सो उसने दशाननके समक्ष ही सुमालीसे इस प्रकार क्रमसे कहना शुरू किया ॥१६५।। जिनकी कीर्ति समस्त संसारमें फैल रही है ऐसे वैश्रवण महाराजने आपसे जो कहा है उसे चित्तमें धारण करो ॥१६६।। उन्होंने कहा है कि तुम पण्डित हो, कुलीन हो, लोक व्यवहारके ज्ञाता हो, महान् हो, अकार्यके समागमसे भयभीत हो और सुमार्गका उपदेश देनेवाले हो ।।१६७॥ सो तुम्हें लड़कों जैसी चपलता करनेवाले अपने प्रमादी पौत्रको मना करना उचित है ॥१६८॥ तिर्यंच और मनुष्योंमें प्रायः यही तो भेद है कि तिर्यंच कृत्य और अकृत्यको नहीं जानते हैं पर मनुष्य जानते हैं ।।१६९।। जिनका चित्त दृढ़ है ऐसे मनुष्य बिजलीके समान भंगुर किसी विभूतिके प्राप्त होनेपर भी पूर्व वृत्तान्तको नहीं भूलते हैं ॥१७०।। तुम्हारे कुलका प्रधान माली मारा गया इसीसे समस्त कुलको शान्ति धारण करना चाहिए थी क्योंकि ऐसा कौन पुरुष होगा जो अपने कुलका निर्मूल नाश करनेवाले काम करेगा ॥१७१॥ शत्रुओंको नष्ट करनेवाले इन्द्रका वह प्रताप जो कि समुद्रकी लहर-लहरमें व्याप्त हो रहा है तुमने क्यों भुला दिया? जिससे कि अनुचित काम करनेकी चेष्टा करते हो ॥१७२।। तुम मेंढकके समान हो और इन्द्र भुजंगके समकक्ष है, सो तुम इन्द्ररूपी भुजंगके उस मुखरूपी बिलमें क्रीड़ा कर रहे हो जो दाढ़रूपी कण्टकोंसे व्याप्त है तथा विषरूपी अग्निके तिलगे छोड़ रहा है ॥१७३|| यदि तुम इस चोर बालकपर नियन्त्रण करने में समर्थ नहीं हो तो आज ही मुझे सौंप दो मैं स्वयं इसका नियन्त्रण करूँगा ॥१७४।। यदि तुम ऐसा नहीं करते हो तो अपने पौत्रको जेलखानेके अन्दर बेड़ियोंसे बद्ध तथा अनेक प्रकारकी यातना सहते हुए देखोगे ॥१७५।। जान पड़ता है कि तुमने अलंकारोदयपुर (पाताललंका ) को छोड़कर बहुत समय तक बाहर रह लिया है अब फिरसे उसी बिलमें प्रवेश करना चाहते हो ।।१७६।। यह निश्चित समझ लो कि मेरे या इन्द्र के कुपित होनेपर पृथ्वीमें तुम्हारा कोई शरण नहीं है. जिस प्रकार जरा-सी हवा चलनेसे पानीका बबला नष्ट हो जाता है उसी प्रकार तुम भी नष्ट हो जाओगे ॥१७७|| तदनन्तर उस दूतके कठोर वचनरूपी वायुके वेगसे जिसका मनरूपी जल आघातको प्राप्त १. विश्रवणश्रुतिः म. । २. चरतीदं म. । ३. संसक्तशक्रस्य-म., ख. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org,
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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