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________________ पद्मपुराणे मयोऽपि तनयाचिन्ता शल्योद्धाराससंमदः । तद्वियोगात् सशोकश्च स्थितः स्वोचितधामनि ॥४२॥ प्रापद्देवीसहस्रस्य प्राधान्यं चारुविभ्रमा । क्रमान्मन्दोदरी मर्तुर्गुणैराकृष्टमानसा ॥४३॥ अभिप्रेतेषु देशेषु स रेमे सहितस्तया । पुरन्दर इवेन्द्राण्या सर्वेन्द्रियमनोज्ञया ॥८॥ प्रभावं वेदितं वाञ्छन् विद्यायामपि भूरिशः। व्यापारानित्यसौ चक्रे समेतः परया रुचा ॥८५।। एको भवत्यनेकश्च सर्वस्वीकृतसंगमः । वितनोत्यर्कवत्तापं ज्योत्स्ना मुञ्चति चन्द्रवत् ॥८६॥ वहिवन्मुञ्चति ज्वालां वर्षनम्बुधरो यथा । वायुवञ्चलयत्यद्रीन् कुरुते सुरनाथताम् ॥८७।। आपगानाथतां याति पर्वतत्वं प्रपद्यते । मत्तवारणतामेति भवत्यश्वो महाजवः ॥८॥ क्षणादारात् क्षणाद्दूरे क्षणाद् दृश्यः क्षणाच नो । क्षणान्महान् क्षणात्सूक्ष्मः क्षणाद्रीमो न च क्षणात् ॥४९॥ एवं च रममाणोऽसौ नाम्ना मेघरवं गिरिम् । प्रापत्तत्र च सद्वापीमपश्यद् विमलाम्भसम् ॥१०॥ कुमुदैरुत्पलैः पद्मः स्वच्छैरन्यैश्च वारिजैः । पर्यन्तसंचरत्क्रौञ्चहंसचक्राहसारसाम् ॥११॥ मृदुशष्पपटच्छन्नतटां सोपानमण्डिताम् । नमसेव विलीनेन पूरितां सवितुः करैः ।।१२।। अर्जुनादिमहोत्तुङ्गपादपव्याप्तरोधसम् । प्रस्फुरच्छफरीचक्रसमुच्छलितसीकराम् ।।९३॥ भ्रक्षेपानिव कुर्वाणां तरङ्गरतिमङ्गुरैः । जल्पन्तीमिव नादेन पक्षिणां श्रोत्रहारिणाम् ।।९४॥ मान रहा था मानो समस्त संसारकी लक्ष्मी ही मेरे हाथ लग गयी है ॥८१|| पुत्रीकी चिन्तारूपी शल्यके निकल जानेसे जिसे हर्ष हो रहा था तथा साथ ही उसके वियोगसे जिसे शोक हो रहा था ऐसा राजा मय भी अपने योग्य स्थानमें जाकर रहने लगा ।।८२।। जिसके हाव सन्दर थे तथा जिसने अपने गणोंसे पतिका मन आकृष्ट कर लिया था ऐसी मन्दोदरीने क्रमसे हजारों देवियोंमें प्रधानता प्राप्त कर ली ॥८३॥ समस्त इन्द्रियोंको प्रिय लगनेवाली उस रानी मन्दोदरीके साथ दशानन, इच्छित स्थानोंमें इन्द्राणीके साथ इन्द्रके समान क्रीड़ा करने लगा ।।८४।। उत्कृष्ट कान्तिसे सहित दशानन अपनी विद्याओंका प्रभाव जाननेके लिए निम्नांकित बहत सारे कार्य करता था ॥८५|| वह एक होकर भी अनेक रूप धरकर समस्त स्त्रियोंके साथ समागम करता था। कभी सूर्यके समान सन्ताप उत्पन्न करता था तो कभी चन्द्रमाके समान चाँदनी छोड़ने लगता था ।।८६॥ कभी अग्निके समान ज्वालाएं छोड़ता था तो कभी मेघके समान वर्षा करने लगता था। कभी वायुके समान बड़े-बड़े पहाड़ोंको चला देता था तो कभी इन्द्र-जैसा प्रभाव जमाता था ।।८७|| कभी समुद्र बन जाता था, कभी पर्वत हो जाता था, कभी मदोन्मत्त हाथी बन जाता था और कभी महावेगशाली घोड़ा हो जाता था ।।८८|| वह क्षण-भरमें पास आ जाता था, क्षण-भरमें दूर पहुँच जाता था, क्षण-भरमें दृश्य हो जाता था, क्षण-भर में अदृश्य हो जाता था, क्षण-भरमें महान् हो जाता था, क्षण-भरमें सूक्ष्म हो जाता था, क्षण-भरमें भयंकर दिखाई देने लगता था और क्षण भरमें भयंकर नहीं रहता था ।।८९।। इस प्रकार रमण करता हुआ वह एक बार मेघरव नामक पर्वतपर गया और वहाँ स्वच्छ जलसे भरी वापिका पहुँचा ॥९०।। उस वापिकामें कुमुद, नीलकमल, लालकमल, सफेद कमल तथा अन्यान्य प्रकारके कमल फूल रहे थे और उसके किनारेपर क्रौंच, हंस, चकवा तथा सारस आदि पक्षी घूम रहे थे॥११॥ उसके तट हरी-हरी कोमल घास-रूपी वस्त्रसे आच्छादित थे, सीढ़ियाँ उसकी शोभा बढ़ा रही थी और उसका जल तो ऐसा जान पड़ता था, मानो सूर्यकी किरणोंसे पिघलकर आकाश ही उसमें भर गया हो ॥९२॥ अर्जुन ( कोहा) आदि बड़े-बड़े ऊँचे वृक्षोंसे उसका तट व्याप्त था। जब कभी उसमें मछलियोंके समूह ऊपरको उछलते थे तब उनसे जलके छींटे ऊपर उड़ने लगते थे ॥१३॥ अत्यन्त भंगुर अर्थात् जल्दी-जल्दी उत्पन्न होने और मिटनेवाली तरंगोंसे वह ऐसी जान १. शल्योद्गारात् म. । २. विमलाम्भसाम् म.। ३. रोधसाम् म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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