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________________ अष्टमं पर्व १७१ विद्युद्दण्डेन संयुक्तं मेघानामिव तं चयम् । अवलोक्य समासन्नमुत्तस्थौ संभ्रमान्मयः ॥४१॥ कृत्वा यथोचिताचारमासनेषु पुनः स्थिताः' । मण्डलाग्रप्रमाजालश्यामलीकृतविग्रहाः ॥४२॥ मारीची वज्रमध्यश्च वज्रनेत्रो नमस्तडित् । उग्रनको मरुद्धको मेधावी सारणः शुकः ॥४३॥ एवमाद्या गतास्तोषं परं दृष्ट्वा दशाननम् । इत्यूचुर्मङ्गलं वाक्यं दैत्यनाथस्य मन्त्रिणः ॥४४॥ अस्मभ्यं तव दैत्येश धिषणातिगरीयसी । नराणामुत्तमो येन मनस्येष निवेशितः ॥४५।। इति चाहुर्दशग्रीवमहो ते रूपमुज्ज्वलम् । अहो प्रश्रयसंभारो वीयं चातिशयान्वितम् ॥४६॥ दक्षिणस्यामयं श्रेण्यामसुरप्रथिते पुरे । दैत्यानामधिपो नाम्ना मयो भुवनविश्रुतः ॥४७॥ गुणैरेष समाकृष्टः कुमार तव निर्मलैः । आयातः कं न कुर्वन्ति सज्जना दर्शनोत्सुकम् ॥४८॥ स्वागतादिकमित्याह ततो रत्नश्रवःसुतः । सतां हि कुलविद्येयं यन्मनोहरभाषणम् ॥१९॥ साधुना देत्यनाथेन प्रेमदर्शनकारिणा । उचितेन नियोगेन जनोऽयमनुगृह्यताम् ॥५०॥ वचः सोऽयं ततः प्राह तात युक्तमिदं तव । प्रतिकूलसमाचारा न भवन्त्येव साधवः ॥५१॥ दृष्टोऽसी सचिवेस्तस्य कौतुकाक्रान्तमानसेः। कृतानन्दश्च सद्वाक्यः पुनरुक्तः समाकुलैः ॥५२॥ ततो गर्भगृहं रम्यं प्रविष्टोऽयं सुभावनः । चकार महती पूजां जिनेन्द्राणां विशेषतः ॥५३॥ स्तवांश्च विविधानुक्त्वा रोमहर्षणकारिणः । मस्तकेऽअलिमास्थाय चूडामणिविभूषिते ॥५४॥ प्रभासे सूर्यको निष्प्रभ करता हुआ दशानन आ गया है ॥४०॥ बिजलीके सहित मेघराशिके समान उस दशाननको निकटवर्ती देख मय हड़बड़ाकर आसनसे उठ खड़ा हुआ ।।४१॥ यथायोग्य आचार प्रदर्शित करनेके बाद संब पुनः आसनोंपर आरूढ़ हुए। तलवारकी कान्तिसे जिनके शरीर श्यामल हो रहे थे ऐसे मारीच, वज्रमध्य, वज्रनेत्र, नभस्तडित्, उग्रनक, मरुद्वक्त्र, मेधावी, सारस और शुक आदि मयके मन्त्री लोग दशाननको देखकर परम सन्तोषको प्राप्त हुए और निम्नलिखित मंगल वचन मयसे कहने लगे कि हे दैत्यराज! आपकी बुद्धि हम सबसे अधिक श्रेष्ठ है क्योंकि आपने ही इस पुरुषोत्तमको हृदयमें स्थान दिया था। अर्थात् हम लोगोंका इसकी ओर ध्यान नहीं गया जबकि आपने इसका अपने मनमें अच्छी तरह विचार रखा ॥४२-४५॥ मयसे इतना कहकर उन मन्त्रियोंने दशाननसे कहा कि अहो तुम्हारा उज्ज्वल रूप आश्चर्यकारी है, तुम्हारा विनयका भार अद्भुत है और तुम्हारा पराक्रम भी अतिशयसे सहित है ।।४६॥ यह दैत्योंका राजा दक्षिणश्रेणीके असरसंगीत नामा नगरका रहनेवाला है तथा संसारमें मय नामसे प्रसिद्ध है। यह आपके गणोंसे आकर्षित होकर यहाँ आया है सो ठीक ही है क्योंकि सज्जन पुरुष किसे दर्शनके लिए उत्कण्ठित नहीं करते?।।४७-४८॥ तब रत्नश्रवाके पुत्र दशाननने कहा कि आपका स्वागत है। आचार्य कहते हैं कि जो मधुर भाषण है वह सत्पुरुषोंकी कुलविद्या है ।।४९॥ दैत्योंके अधिपति उत्तम पुरुष हैं जिन्होंने कि हमें प्रेमपूर्वक दर्शन दिये। मैं चाहता हूँ कि ये उचित आदेश देकर इस जनको अनुगृहीत करें ॥५०॥ तदनन्तर मयने कहा कि हे तात! तुम्हें यह कहना उचित है क्योंकि जो उत्तम पुरुष हैं वे विरुद्ध आचरण कभी नहीं करते ॥५१॥ जिनका चित्त कौतुकसे व्याप्त था ऐसे मयके मन्त्रियोंने भी दशाननके दर्शन किये और आकुलतासे भरे तथा बार-बार कहे हुए उत्तम वचनोंसे उसे आनन्दित किया ॥५२॥ तदनन्तर अच्छी भावनासे युक्त दशाननने चन्द्रप्रभ जिनालयके महामनोहर गर्भगृहमें प्रवेश किया। वहां उसने प्रधानरूपसे जिनेन्द्र भगवान्की बड़ी भारी पूजा की ।।५३।। रोमांच उत्पन्न करनेवाले अनेक प्रकारके स्तवन पढ़े, हाथ जोड़कर चूड़ामणिसे सुशोभित मस्तकपर लगाये, और १. स्थितः म. । २. विग्रहः म. । ३. दैत्यस्य म. । ४. चाह म.। ५. इदं मयस्ततः ख. । इदं मयसुतः म. । ६. स्वभावतः म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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