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________________ १७० पद्मपुराणे अवतीर्य नमोभागात् समीपे तस्य वेश्मनः । सानीकिनी विशश्राम चकार च यथोचितम् ॥२७॥ तूर्यादिडम्बरं त्यक्त्वा दैत्यानामधिपस्ततः । आप्तः कतिपयैर्युक्तो विनीताकल्पशोभितः ॥२८॥ अभिमानोदयं मुक्त्वा सकन्यः प्राप्तविस्मयः। तं प्रासादं समारुक्षत्प्रतीहारनिवेदितः ॥२९॥ सप्तमं च तलं प्राप्तः क्रमेण निभृतक्रमः । वनदेवीमिवैक्षिष्ट मूर्तामुत्तमकन्यकाम् ॥३०॥ अथेन्दुनखया तस्य कृताभ्यागतेसत्क्रिया । प्रपद्यन्ते परिभ्रंशं कुलज्ञा नोपचारतः ॥३१॥ ततः सुखासनासीनः स्थितां कन्योचितासने । अपृच्छत् प्रश्रयादेवं तां मयो विनयान्विताम् ॥३२॥ वत्से कासि कुतो वासि कस्माद्वा कारणादिह । वससि प्रभयेऽरण्ये कस्य चेदं महागृहम् ॥३३॥ एकाकिन्या कथं चास्मिन् तिरुत्पद्यते तव । वपुरुस्कृष्टमेतत्ते पीडानां नैव भाजनम् ॥३४॥ एवं पृष्टा सती बाला स्त्रीणां स्वाभाविकी त्रपा । मन्दं वनमृगी मुग्धा जगादेति नतानना ॥३५॥ षष्ठभक्तेन संसाध्य चन्द्रहासमिमं मम । शैलराजं गतो भ्राता वन्दितुं जिनपुङ्गवान् ॥३६॥ दशवक्त्रेण तेनाहं पालनार्थ निरूपिता। आर्य तिष्ठामि चैत्येऽस्मिन् चन्द्रप्रभविराजिते ॥३७॥ यदि च स्युर्भवन्तोऽपि द्रष्टुमेत समागताः । क्षणमात्रं ततोऽत्रैव स्थानं कुर्वन्तु सजनाः ॥३८॥ यावदेवं समालापो वर्तते मधुरस्तयोः । तेजसा मण्डलं ते स्म नमस्तले ॥३९॥ उक्तं च कन्यया नूनमागतोऽयं दशाननः । सहस्रकिरणं कुर्वन् प्रभया विगतप्रभम् ॥४०॥ सौधर्म स्वर्गको ही छूना चाहता है ॥२६॥ राजा मयकी सेना आकाशसे उतरकर उसी महलके समीप यथायोग्य विश्राम करने लगी ॥२७॥ तदनन्तर दैत्योंका अधिपति राजा मय तुरही आदि वादित्रोंका आडम्बर छोड़कर तथा विनीत मनुष्योंके योग्य वेष-भूषा धारणकर कुछ आप्तजनोंके साथ उस महलके समीप पहुँचा। कन्या मन्दोदरी उसके साथ थी। महलको देखते ही राजा मयका जहाँ अहंकार छूटा वहाँ उसे आश्चर्य भी कम नहीं हआ। तदनन्तर द्वारपालके द्वारा समाचार भेजकर वह महलके ऊपर च ॥२८-२९।। सावधानीसे पैर रखता हुआ जब वह क्रमसे सातवें खण्डमें पहुँचा तब वहाँ उसने मूर्तिधारिणी वनदेवीके समान उत्तम कन्या देखी ॥३०॥ वह कन्या दशाननकी बहन चन्द्रनखा थी सो उसने सबका अतिथि-सत्कार किया सो ठीक ही है क्योंकि कुलके जानकार मनुष्य योग्य उपचारसे कभी नहीं चूकते ॥३१।। तदनन्तर जब मय सुखकारी आसनपर बैठ गया और चन्द्रनखा भी कन्याओंके योग्य आसनपर बैठ चुकी तब विनय दिखाती हुई उस कन्यासे मयने बड़ी नम्रतासे पूछा ॥३२॥ कि हे पुत्रि! तू कौन है ? और किस कारणसे इस भयावह वनमें रहती है तथा यह बड़ा भारी महल किसका है ? ॥३३।। इस महलमें अकेली रहते हुए तुझे कैसे धैर्य उत्पन्न होता है। तेरा यह उत्कृष्ट शरीर पीडाका पात्र तो किसी तरह नहीं हो सकता ॥३४॥ स्त्रियोंके लज्जा स्वभावसे ही होती है इसलिए मयके इस प्रकार पूछनेपर उस सती कन्याका मुख लज्जासे नत हो गया। साथ ही वनकी हरिणीके समान भोलो थी ही अतः धीरे-धीरे इस प्रकार बोली कि मेरा भाई दशानन षष्ठोपवास अर्थात् तेलाके द्वारा इस चन्द्रहास खड्गको सिद्ध कर जिनेन्द्र भगवान्को वन्दना करने के लिए सुमेरु पर्वतपर गया है । दशानन मुझे इस खड्गकी रक्षा करनेके लिए कह गया है सो हे आर्य ! मैं चन्द्रप्रभ भगवान्से सुशोभित इस चैत्यालयमें स्थित हूँ। यदि आप लोग दशाननको देखनेके लिए आये हैं तो क्षण मात्र यहींपर विश्राम कीजिए ।।३५-३८|| जबतक उन दोनोंमें इस प्रकारका मधुर आलाप चल रहा था तबतक आकाशतलमें तेजका मण्डल दिखाई देने लगा ॥३९।। उसी समय कन्याने कहा कि जान पड़ता है अपनी १. समारुह्य म. । २. -म्यागम म.। ३. प्रपद्यान्तपारभ्रश कुलजातोपचारत: म.। ४. स चासनामीन: म. । ५. -मेवं म. । ६. ददशाते म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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