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________________ १६० पपपुराणे इत्युक्तं वितथं पूर्वमेकस्यापि यतोऽधुना । यूयं म्लेच्छस्य पर्याप्ता न योऽपि हतौजसः ॥२९८॥ दशग्रीव वृथा स्तोत्रमकरोत्ते विभीषणः । एकापि नास्ति ते ग्रीवा जननी यो न रक्षति ॥२९९॥ कालेन यावता यातस्त्वं मे मानेन वर्जितः । निष्कान्तो जठरादस्मादुच्चारस्तावता वरम् ॥३०॥ भानुकर्णोऽप्ययं मुक्तः कर्णाभ्यां यो न मे स्वरम् । आत शृणोति कुर्वत्या विगतक्रियविग्रहः ॥३०१॥ विभीषणोऽप्ययं व्यर्थ नाम धत्ते विभीषणः । शक्तो यो नैककस्यापि शबरस्य मृताकृतिः ॥३०२॥ म्लेच्छैर्विधर्म्यमाणायां दयां कुरुत नो कथम् । स्वसरि प्रेम हि प्रायः पितृभ्यां सोदरे परम् ॥३०३॥ विद्या हि साध्यते पुत्रः स्वजनानां समृद्धये । तेषां च पितरौ श्रेष्ठौ तयोश्चैषा व्यवस्थितिः ॥३०४॥ भ्रूक्षेपमात्रतोऽप्येते शबरा यान्ति मस्मताम् । भवतां दृग्विषव्यालचक्षुःपातादिव द्रुमाः ॥३०५॥ जठरेण मया यूयं धारिताः सुखलिप्सया। पुत्रा हि गदिताः पित्रोः प्रारोहा इव धारकाः ॥३०६।। यदैवसपि न ध्यानभङ्गस्तेषामजायत । तदेति तैः समारब्धं मायाकर्मातिदारुणम् ॥३०७॥ छिन्नं पित्रोः शिरस्तेषां पुरः सायकधारया । पुरो दशाननस्यापि मूर्दा भ्रात्रोनिपातितः ॥३०८॥ तयोरपि पुरो मूर्दा दशग्रीवस्य पातितः । येन तौ कोपतः प्राप्तावीषद्ध्यानविकम्पनम् ॥३०९॥ दशग्रीवस्तु भावस्य दधानोऽत्यन्तशुद्धताम् । महावीर्यो दधस्थैयं मन्दरस्य महारुचिः ॥३१०॥ अवभज्य हृषीकाणां प्रसारं निजगोचरे । अचिरामाचलं चित्तं कृत्वा दासमिवाश्रवम् ॥३११॥ प्राप्त सब विद्याधर मिलकर भी मेरी एक भुजाके लिए पर्याप्त नहीं हैं। परन्तु इस समय तो तुम तीनों ही इतने निस्तेज हो रहे हो कि एक ही म्लेच्छके लिए पर्याप्त नहीं हो ॥२९७-२९८।। हे दशग्रीव. यह विभीषण तेरी व्यर्थ ही स्तुति करता था। जबकि तु माताकी रक्षा नहीं कर पा रहा है तब तो मैं समझती हूँ कि तेरे एक भी ग्रीवा नहीं है ।।२९९|| मानसे रहित तू जितने समय तक मेरे उदरमें रहकर बाहर निकला है उतने समय तक यदि मैं मलको भी धारण करती तो अच्छा होता ॥३००। जान पड़ता है यह भानुकर्ण भी कर्णो से रहित है इसलिए तो मैं चिल्ला रही हूँ और यहाँ मेरे दुःख-भरे शब्दको सुन नहीं रहा है। देखो, कैसा निश्चल शरीर धारण किये हैं ॥३०१॥ यह विभीषण भी इस विभीषण नामको व्यर्थ ही धारण कर रहा है और मुर्दा जैसा इतना अकर्मण्य हो गया है कि एक भी म्लेच्छका निराकरण करनेमें समर्थ नहीं है ॥३०२॥ देखो, ये म्लेच्छ बहन चन्द्रनखाको धर्महीन बना रहे हैं सो इसपर भी तुम दया क्यों नहीं करते हो? माता-पिताकी अपेक्षा भाईका बहनपर अधिक प्रेम होता है पर इसकी तुम्हें चिन्ता कहाँ है ? ॥३०३॥ हे पुत्रो ! विद्या सिद्ध की जाती है आत्मीयजनोंकी समृद्धिके लिए सो उन आत्मीयजनोंको अपेक्षा माता-पिता श्रेष्ठ हैं और माता-पिताकी अपेक्षा बहन श्रेष्ठ है यही सनातन व्यवस्था है ॥३०४।। जिस प्रकार विषधर सर्पकी दृष्टि पड़ते हो वृक्ष भस्म हो जाते हैं उसी प्रकार तुम्हारी भौंहके संचार मात्रसे म्लेच्छ भस्म हो सकते हैं ॥३०५।। मैंने तुम लोगोंको सुख पानेकी इच्छासे ही उदरमें धारण किया था क्योंकि पुत्र वही कहलाते हैं जो पायेकी तरह माता-पिताको धारण करते हैं-उनकी रक्षा करते हैं ॥३०६।। इतना सब कुछ करनेपर भी जब उनका ध्यान भंग नहीं हुआ, तब उन देवोंने अत्यन्त भयंकर मायामयो कार्य करना शुरू किया ॥३०७|| उन्होंने उन तीनोंके सामने तलवारकी धारसे माता-पिताका सिर काटा तथा रावणके सामने उसके अन्य दो भाइयोंका सिर काटकर गिराया ॥३०८|| इसी प्रकार उन दो भाइयोंके सामने रावण का सिर काटकर गिराया। इस कार्यसे विभीषण और भानुकर्णके ध्यानमें क्रोधवश कुछ चंचलता आ गयी ।।३०९|| परन्तु दशानन भावोंकी शुद्धताको धारण करता हुआ मेरुके समान स्थिर बना रहा। वह महाशक्तिशाली तथा दृढ़श्रद्धानी जो था ॥३१०॥ उसने इन्द्रियोंके संचारको अपने आपमें ही रोककर बिजलीके समान चंचल मनको दासके समान आज्ञाकारी बना १. अववद्य ख. ! Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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