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________________ सप्तमं पर्व १६१ कण्टकेन कृतवाणः संम्बरेण समं ततः । ध्यानवक्तव्याताहीनो दध्यौ मन्त्रं प्रयत्नतः ॥३१२॥ यदि नाम तदा ध्यानाविशेच्छुमणोत्तमः । अष्टकर्मसमुच्छेदं ततः कुर्वीत तरक्षणात् ॥३१३॥ अत्रान्तरे सदेहानां कृताञ्जलिपुटस्थितम् । सहस्रं तस्य विद्यानामनेकं वशतामितम् ॥३१४॥ समाप्लिमेति नो यावरसंख्या मन्त्रविवर्तने । तावदेवास्य ताः सिद्धा निश्चयात् किं न लभ्यते ॥३१५॥ निश्चयोऽपि पुरोपात्ताल्लभ्यते कर्मणः सितात् । कर्माण्येव हि यच्छन्ति विघ्नं दुःखानुभाविनः ॥३१६॥ काले दानविधि पात्रे क्षेमे चायुःस्थितिक्षयम् । सम्यग्बोधिफलां विद्या नामव्यो लब्धुमर्हति ॥३१७॥ कस्यचिद्दशभिर्वर्षे विद्या मासेन कस्यचित् । क्षणेन कस्यचित्सिद्धिं यान्ति कर्मानुभावतः ॥३१८॥ धरण्यां स्वपितु त्यागं करोतु चिरमन्धसः । मज्जत्वप्सु दिवानक्तं गिरेः पततु मस्तकात् ॥३१९॥ विधत्तां पञ्चतायोग्यां क्रियां विग्रहशोषिणीम् । पुण्यैर्विरहितो जन्तुस्तथापि न कृती भवेत् ॥३२०॥ अन्नमात्रं क्रियाः पुंसां सिद्धेः सुकृतकर्मणाम् । अकृतोत्तमकर्माणो यान्ति मृत्यु निरर्थकाः ॥३२१॥ सर्वादरान्मनुष्येण तस्मादाचार्यसेवया । पुण्यमेव सदा कार्य सिद्धिः पुण्यैर्विना कुतः ३२२॥ पश्य श्रेणिक पुण्यानां प्रमावं यद्दशाननः । असंपूर्ण गतः काले विद्यासिद्धिं महामनाः ॥३२३॥ संक्षेपेण करिष्यामि विद्यानां नामकीर्तनम् । अर्थसामर्थ्यतो लब्धं भवावहितमानसः ॥३२४॥ नमःसंचारिणी कायदायिनी कामगामिनी । दुर्निवारा जगत्कम्पा प्रज्ञप्तिर्भानुमालिनी ॥३२५॥ लिया था ॥३११।। शत्रुसे बदला लेनेकी इच्छारूपी कण्टक तथा जितेन्द्रियतारूपी संवर दोनों ही जिसकी रक्षा कर रहे थे ऐसा दशानन ध्यानसम्बन्धी दोषोंसे रहित होकर प्रयत्नपूर्वक मन्त्रका ध्यान करता रहा ॥३१२॥ आचार्य कहते हैं कि यदि ऐसा ध्यान कोई मुनिराज धारण करते तो वह उस ध्यानके प्रभावसे उसी समय अष्टकर्मोका विच्छेद कर देते ॥३१३॥ इसी बीच में हाथ जोडकर सामने खड़ी हुई अनेक हजार शरीरधारिणी विद्याएँ दशाननको सिद्ध हो गयीं ॥३१४।। मन्त्र जपनेकी संख्या समाप्त नहीं हो पायी कि उसके पहले ही समस्त विद्याएँ उसे सिद्ध हो गयीं, सो ठीक ही है क्योंकि दृढ़ निश्चयसे क्या नहीं मिलता है ? ॥३१५।। दृढ़ निश्चय भी पूर्वोपाजित उज्ज्वल कर्मसे ही प्राप्त होता है। यथार्थमें कर्म ही दुःखानुभवमें विघ्न उत्पन्न करते हैं ॥३१५॥ योग्य समय पात्रके लिए दान देना, क्षेत्रमें आयुकी स्थिति समाप्त होना तथा रत्नत्रयकी प्राप्तिरूपी फलसे युक्त विद्या प्राप्त होना, इन तीन कार्योंको अभव्य जीव कभी नहीं पाता है ॥३१७।। किसीको दस वर्षमें, किसीको एक माहमें और किसीको एक क्षणमें ही विद्याएं सिद्ध हो जाती हैं सो यह सब कर्मों का प्रभाव है ॥३१८॥ भले ही पृथिवीपर सोवे, चिरकाल तक भोजनका त्याग रखे, रात-दिन पानीमें डूबे रहे, पहाड़की चोटीसे गिरे, और जिससे मरण भी हो जावे ऐसी शरीर सुखानेवाली क्रियाएँ करे तो भी पुण्यरहित जीव अपना मनोरथ सिद्ध नहीं कर सकता ॥३१९-३२०|| जिन्होंने पूर्व भवमें अच्छे कार्य किये हैं उन्हें सिद्धि अनायास ही प्राप्त होती है। तपश्चरण आदि क्रियाएँ तो निमित्त मात्र हैं पर जिन्होंने पूर्वभवमें उत्तम कार्य नहीं किये वे व्यर्थ ही मृत्युको प्राप्त होते हैं-उनका जीवन निरर्थक जाता है ।।३२१।। इसलिए मनुष्यको पूर्ण आदरसे आचार्यकी सेवा कर सदा पुण्यका ही संचय करना चाहिए क्योंकि पुण्य के बिना सिद्धि कैसे हो सकती है ? ॥३२२॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! पुण्यका प्रभाव देखो कि महामनस्वी दशानन, समय पूर्ण न होनेपर भी विद्याओंकी सिद्धिको प्राप्त हो गया ॥३२३।। अब मैं संक्षेपसे विद्याओंका नामोल्लेख करता हूँ। विद्याओंके ये नाम उनके अर्थ-कार्यकी सामर्थ्यसे ही प्राप्त हुए हैं-प्रचलित हैं। हे श्रेणिक ! सावधान चित्त होकर सुनो ॥३२४॥ संचारिणी, कामदायिनी, कामगामिनी, दुर्निवारा, १. शबरेण म. । २. -माविशच्छुम म. । ३. वद्धात् । ४. कामदामिनी म. । ५. कायगामिनी म.। २१ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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