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________________ १५८ पद्मपुराणे रूपेण तास्ततस्तेषां समाकृष्य कचेष्विव । देव्यः समीपमानीताः कौतुकाकुलचेतसः ॥२६९॥ उचुस्तासामिदं काश्चित्कुञ्चितालकलासिना । वक्त्रेण सद्विरेफेण पद्मस्य श्रियमाश्रिताः ॥२७॥ नितान्तं सुकुमाराङ्गा विसर्पकान्तितेजसः । तपश्चरत किं कायमपरित्यक्तवाससः ॥२७॥ भोगविना न गात्राणामीदृशी जायते रुचिः । ईदृग्देहतया नापि शक्यते परतो भयम् ॥२७२॥ जटामुकुटमारः क्व क्व चेदं प्रथमं वयः । विरुद्धसंप्रयोगस्य स्रष्टारो यूयमुद्गताः ॥२७३॥ पीनेस्तनतटास्फालसुखसंगमनोचितौ। करौ शिलादिसंगेन किमर्थ प्रापितौ व्यथाम ॥२७४॥ अहो हसीयसी बुद्धिर्युष्माकं रूपशालिनाम् । भोगोचितस्य देहस्य यत्कृतं दुःखयोजनम् ॥२७५॥ उत्तिष्ठत गृहं यामः किमद्यापि गतं बुधाः । सहास्माभिर्महाभोगान् प्राप्नुत प्रियदर्शनान् ॥२७६॥ ताभिरित्युदितं तेषां न चक्रे मानसे पदम् । यथा सरोजिनीपत्रे पयसो बिन्दुजालकम् ॥२७७॥ एवमूचुस्ततश्चान्याः सख्यः काष्ठमया इमे । निश्चलत्वं तथा ह्येषां सर्वेष्वङ्गेषु दृश्यते ॥२७८॥ अभिधायेति संक्रुध्य रभसादुपसृत्य च । विशाले हृदये चक्रुरवतंसेन ताडनम् ॥२७९॥ तथापि ते गताः प्रवणचेतसः । यतः कापुरुषा एव स्खलन्ति प्रस्तुताशयात् ॥२८॥ देवीनिवेदनाद् 'जम्बूद्वीपेशिना ततः । कृत्वा च स्मितमित्युक्ताः प्राप्तविस्मयचेतसा ॥२८१॥ भो भोः सुपुरुषाः कस्मात्तपश्चरत दुष्करम् । आराधयत वा देवं कतरं वदताचिरात् ॥२८२॥ तदनन्तर कौतुकसे जिनका चित्त आकुल हो रहा था ऐसी देवियाँ शीघ्र ही उनके पास इस प्रकार आयीं मानो उनके सौन्दर्यने चोटी पकड़कर ही उन्हें खींच लिया हो ॥२६९।। उन देवियोंमें कुछ देवियाँ धुंघराले बालोंसे सुशोभित मुखसे भ्रमरसहित कमलकी शोभा धारण कर रही थीं। उन्होंने कहा कि जिनके शरीर अत्यन्त सुकुमार हैं, जिनकी कान्ति और तेज सब ओर फैल रहा है तथा वस्त्रका जिन्होंने त्याग नहीं किया है ऐसे आप लोग किस लिए तपश्चरण कर रहे हैं ।।२७०२७१।। शरीरोंकी ऐसी कान्ति भोगोंके बिना नहीं हो सकती। तथा आपके ऐसे शरीर हैं कि जिससे आपको किसी अन्यसे भय भी उत्पन्न नहीं हो सकता ॥२७२॥ कहाँ तो यह जटारूप मुकुटोंका भार और कहाँ यह प्रथम तारुण्य अवस्था ? निश्चित ही आप लोग विरुद्ध पदार्थों का समागम सृजनेके लिए ही उत्पन्न हुए हैं ॥२७३।। स्थूल स्तन-तटोंके आस्फालनसे उत्पन्न सुखकी प्राप्तिके योग्य अपने इन हाथोंको आप लोग शिला आदि कर्कश पदार्थोंके समागमसे पीड़ा क्यों पहुँचा रहे हैं ॥२७४।। अहो आश्चर्य है कि रूपसे सुशोभित आप लोगोंकी बुद्धि बड़ी हलकी है कि जिससे भोगोंके योग्य शरीरको आप लोग इस तरह दुःख दे रहे हैं ।।२७५।। उठो घर चलें, हे विज्ञ पुरुषो ! अब भी क्या गया है ? प्रिय पदार्थोंका अवलोकन कर हम लोगोंके साथ महाभोग प्राप्त करो ॥२७६।। उन देवियोंने यह सब कहा अवश्य, पर उनके चित्तमें ठीक उस तरह स्थान नहीं पा सका कि जिस तरह कमलिनीके पत्रपर पानीके बूंदोंका समूह स्थान नहीं पाता है ॥२७७।। तदनन्तर कुछ दूसरी देवियाँ परस्परमें इस प्रकार कहने लगी कि हे सखियो! निश्चय ही ये काष्ठमय हैं-लकड़ीके पुतले हैं इसीलिए तो इनके समस्त अंगोंमें निश्चलता दिखाई देती है ॥२७८॥ ऐसा कहकर तथा कुछ कुपित हो पासमें जाकर उन देवियोंने उनके विशाल हृदयमें अपने कर्णफूलोंसे चोट पहुँचायी ।।२७९।। फिर भी निपुण चित्तको धारण करनेवाले तीनों भाई क्षोभको प्राप्त नहीं हुए सो ठीक ही है क्योंकि कायर पुरुष ही अपने प्रकृत लक्ष्यसे भ्रष्ट होते हैं ।।२८०॥ तदनन्तर देवियोंके कहनेसे जिसके चित्तमें आश्चर्य उत्पन्न हो रहा था ऐसे जम्बूद्वीपाधिपति अनावृत यक्षने भी हर्षित हो उन तीनों भाइयोंसे मुसकराते हुए कहा ।।२८१॥ कि हे सत्पुरुषो! आप लोग किस प्रयोजनसे कठिन तपश्चरण कर रहे हो ? अथवा किस देवकी आराधना कर रहे हो ? सो शीघ्र ही कहो १. पीतस्तन -म. । २. नैवं म.। ३. नाद् दृष्टा म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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