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________________ सप्तमं पर्व १५७ इत्युक्त्वा धारयन्मानमनुजाभ्यां समन्वितः । पितृभ्यां चुम्बितो मूर्ध्नि कृतसिद्धनमस्कृतिः ॥२५५॥ प्राप्तमङ्गलसंस्कारो निश्चयस्थिरमानसः । निर्गत्य मुदितो गेहादुल्पपात नमस्तलम् ॥२५६॥ क्षणात् प्राप्तं प्रविष्टश्च भीमं नाम महावनम् । दंष्ट्राकरालवदनैः क्रूरसत्वैर्निनादितम् ॥२५७॥ सुप्ताजगरनिश्वासप्रेङ्कितोदारपादपम् । नृत्यद्व्यन्तरसंघातपादक्षोभितभूतलम् ॥२५॥ महागह्वरदेशस्य सूच्यभेदतमश्चयम् । कालेनैव स्वयं क्लप्तसंनिधानं सुभीषणम् ॥२५९॥ यस्योपरि न गच्छन्ति सुराश्चापि भयार्दिताः । यच्च भीमतया प्राप प्रसिद्धिं भुवनत्रये ॥२६॥ गिरयो दुर्गमा यत्र ध्वान्तव्याप्तगुहाननाः । साराश्च तरवो लोकं ग्रसितुं प्रोद्यता इव ॥२६१॥ अमिन्नचेतसस्तत्र गृहीत्वा शममुत्तमम् । दुराशादूरितात्मानो धवलाम्बरधारिणः ॥२६२॥ पूर्णेन्दुसौम्यवदनाः शिखामणिविराजिताः । तपश्चरितुमारब्धास्त्रयोऽपि भ्रातरो महत् ॥२६३॥ विद्या चाष्टाक्षरा नीता वर्शतां जपलक्षया । सर्वकामान्नदा नाम दिवसाढेन तैस्ततः ॥२६४॥ अन्नं यथेप्सितं तेभ्यः सोपनिन्ये यतस्ततः । क्षधाजनितमेतेषां संबभूव न पीडनम् ॥२६५॥ ततो जपितुमारब्धाः सुचित्ताः षोडशाक्षरम् । मन्त्रं कोटिसहस्राणि यस्यावृत्ति दशोदिता॥२६६॥ जम्बूद्वीपपतिर्यक्षस्तमथ स्त्रीभिरावृतः । अनावृत इति ख्यातः प्राप्तः क्रीडितुमिच्छया ॥२६७॥ अङ्गनानां ततस्तस्य क्रीडन्तीनां सुविभ्रमम् । ते तपोनिहितात्मानः स्थिता लोचनगोचरे ॥२६॥ करनी चाहिए ॥२५४॥ इस प्रकार कहकर मानको धारण करता हुआ रावण अपने दोनों छोटे भाइयोंके साथ विद्या सिद्ध करने के लिए घरसे निकलकर आकाशकी ओर चला गया। जाते समय माता-पिताने उसका मस्तक चूमा था, उसने सिद्ध भगवान्को नमस्कार किया था, मांगलिक संस्कार उसे प्राप्त हुए थे, उसका मन निश्चयसे स्थिर था तथा प्रसन्नतासे भरा था ॥२५५ - २५६।। क्षण-भरमें ही वह भीम नामक महावन में जा पहुंचा। जिनके मुख दाढ़ोंसे भयंकर थे ऐसे दुष्ट प्राणी उस वनमें शब्द कर रहे थे ॥२५७॥ सोते हुए अजगरोंके श्वासोच्छ्वाससे वहाँ बड़े-बड़े वृक्ष कम्पित हो रहे थे तथा नृत्य करते हुए व्यन्तरोंके चरण-निक्षेपसे वहाँका पृथिवीतल क्षोभित हो रहा था ॥२५८॥ वहाँ की बड़ी-बड़ी गुफाओंमें सूचीके द्वारा दुर्भेद्य सघन अन्धकारका समूह विद्यमान था। वह वन इतना भयंकर था कि मानो साक्षात् काल ही सदा उसमें विद्यमान रहता था॥२५९॥ देव भी भयसे पीड़ित होकर उसके ऊपर नहीं जाते थे, तथा अपनी भयंकरताके कारण तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध था ॥२६॥ जिनकी गफाओंके अग्रभाग अन्धकारसे व्याप्त थे ऐसे वहाँ के पर्वत अत्यन्त दुर्गम थे और वहाँ के सुदृढ़ वृक्ष ऐसे जान पड़ते थे मानो लोकको ग्रसने के लिए ही खड़े हों ॥२६१।। जिनके चित्तमें किसी प्रकारका भेदभाव नहीं था, जिनकी आत्माएँ खोटी आशाओंसे दूर थीं, जो शुक्ल वस्त्र धारण कर रहे थे, जिनके मुख पूर्णचन्द्रमाके समान सौम्य थे और जो चूड़ामणिसे सुशोभित थे ऐसे तीनों भाइयोंने उस भीम महावन में उत्तम शान्ति धारण कर महान् तपश्चरण करना प्रारम्भ किया ॥२६२-२६३॥ उन्होंने एक लाख जप कर सर्वकामान्नदा नामकी आठ अक्षरोंवाली विद्या आधे ही दिनमें सिद्ध कर ली ॥२६४|| यह विद्या उन्हें जहाँतहाँसे मनचाहा अन्न लाकर देती रहती थी जिससे उन्हें क्षुधा सम्बन्धी पीड़ा नहीं होती थी ॥२६५॥ तदनन्तर हृदयको स्वस्थ कर उन्होंने सोलह अक्षरवाला वह मन्त्र जपना शुरू किया कि जिसकी दस हजार करोड़ आवृत्तियाँ शास्त्रोंमें कही गयी हैं ॥२६६।। तदनन्तर जम्बूद्वीपका अधिपति अनावृत नामका यक्ष अपनी स्त्रियोंसे आवृत हो इच्छानुसार क्रीड़ा करनेके लिए उस वनमें आया ॥२६७।। जिनकी आत्मा तपश्चरंणमें लीन थी ऐसे तीनों भाई, हाव-भाव-पूर्वक क्रीड़ा करनेवाली उस यक्षकी स्त्रियोंके दृष्टिगोचर हुए ॥२६८|| १. विदारितम् म. । २. देशस्थं म. । ३. चाष्टाक्षरी म.। ४. वश्यतां म. । ५. -दिताः म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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