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________________ १५६ पद्मपुराणे पुत्र लक्ष्मी कदा तु त्वं प्राप्स्यसि स्वकुलोचिताम् । विशल्यमिव यां दृष्ट्वा भविष्यत्यावयोर्मनः ॥२४१॥ कदा नु भ्रातरावेतौ विभूत्या तव संगतौ । द्रक्ष्यामि विहितच्छन्दौ विष्टपे वीतकण्टके ॥२४२॥ मातुर्दीनवचः श्रुत्वा कृत्वा गर्वस्मितं ततः । विभीषणो बभाणेदमुद्यत्क्रोधविषाङ्कुरः ।।२४३।। धनदो वा भवत्येष देवो वा कोऽस्य वीक्षितः । प्रभावो येन मातस्त्वं करोषि परिदेवनम् ॥२४४।। वीरप्रसविनी वीरा विज्ञातजनचेष्टिता । एवंविधा सती कस्माद् वदसि त्वं यथेतरा ॥२४५।। श्रीवत्समण्डितोरस्को 'ध्यायताततविग्रहः । अद्भुतैकरेसासक्तनित्यचेष्टो महाबलः ॥२४६।। भस्मच्छन्नाग्निवद्मस्मीकतु शक्तोऽखिलं जगत् । न मनोगोचरं प्राप्तो दशग्रीवः किमम्ब ते ॥२४७।। गत्या जयेदयं चित्तमनादरसमुत्थया । तटानि गिरिराजस्य पाटयेच्च चपेटया ॥२४८॥ राजमार्गों प्रतापस्य स्तम्भौ भुवनवेश्मनः । अङ्कुरौ दर्पवृक्षस्य न ज्ञातावस्य ते भुजौ ॥२४९।। एवंकृतस्तवोऽथासौ भ्रात्रा गुणकलाविदा । तेजोबहुतरं प्राप सर्पिषेव तनूनपात् ॥२५०॥ जगाद चेति किं मातरात्मनोऽतिविकत्थया। वदामि शृणु यत्सत्यं वाक्यमेतदनुत्तरम् ॥२५॥ गर्विता अपि विद्याभिः संभय मम खेचराः । एकस्यापि न पर्याप्ता भुजस्य रणमूर्द्धनि ॥२५॥ कुलोचितं तथापीदं विद्याराधनसंज्ञकम् । कर्म कर्तव्यमस्मामिस्तत्कुर्वाणर्न लङ्घयते ॥२५३।। कुर्वन्त्याराधनं यत्नात् साधवस्तपसो यथा। आराधनं तथा कृत्यं विद्यायाः खगगोत्रजैः ॥२५४॥ मैं भी इसी चिन्तासे सूख रही हूँ। अपने स्थानसे भ्रष्ट होनेकी अपेक्षा पुरुषोंका मरण हो जाना अच्छा है ॥२४०।। हे पुत्र ! तू अपने कुलके योग्य लक्ष्मीको कब प्राप्त करेगा ? जिसे देख हम दोनोंका मन शल्यरहित-सा हो सके ॥२४१।। मैं कब तेरे इन भाइयोंको विभूतिसे युक्त तथा निष्कण्टक विश्व में स्वच्छन्द विचरते हुए देखूगी ? ||२४२।। माताके दीन वचन सुनकर जिसके क्रोधरूपी विषके अंकुर उत्पन्न हो रहे थे ऐसा विभीषण गर्वसे मुसकराता हुआ बोला ॥२४३।। कि हे मा! यह धनद हो चाहे देव हो, तुमने इसका ऐसा कौन-सा प्रभाव देखा कि जिससे तुम इस प्रकार विलाप कर रही हो ॥२४४।। तुम तो वीरप्रसू हो, स्वयं वीर हो, और मनुष्योंकी समस्त चेष्टाओंको जाननेवाली हो । फिर ऐसी होकर भी अन्य स्त्रीकी तरह ऐसा क्यों कह रही हो ॥२४५॥ जरा ध्यान तो करो कि जिसका वक्षःस्थल श्रीवत्सके चिह्नसे चिह्नित है, विशाल शरीरको धारण करनेवाला है, जिसकी प्रतिदिनकी चेष्टाएँ एक आश्चर्य रससे ही सनी रहती हैं, जो महाबलवान् है और भस्मसे आच्छादित अग्निके समान समस्त संसारको भस्म करने में समर्थ है ऐसा दशानन क्या कभी तुम्हारे मनमें नहीं आया ? २४६-२४७|| यह अनादरसे ही उत्पन्न गतिके द्वारा मनको जीत सकता है और हाथकी चपेटासे सुमेरुके शिखर विदीर्ण कर सकता है ।।२४८।। तुम्हें पता नहीं कि इसकी भुजाएँ प्रतापकी पक्की सड़क हैं, संसाररूपी घरके खम्भे हैं, और अहंकार रूपी वृक्षके अंकुर हैं ॥२४९।। इस प्रकार गुण और कलाके जानकार विभीषण भाईके द्वारा जिसकी प्रशंसा की गयी थी ऐसा रावण, घीके द्वारा अग्निके समान बहुत अधिक प्रतापको प्राप्त हुआ ॥२५०।। उसने कहा कि माता ! अपनी बहुत प्रशंसा करनेसे क्या लाभ है ? परन्तु सच बात तुमसे कहता हूँ सो सुन ॥२५१॥ विद्याओंके अहंकारसे फूले यदि सबके सब विद्याधर मिलकर युद्धके मैदानमें आवें तो मेरी एक भुजाके लिए भी पर्याप्त नहीं हैं ।।२५२।। फिर भी विद्याओंकी आराधना करना यह हमारे कुलके योग्य कार्य है अतः उसे करते हुए हमें लज्जित नहीं होना चाहिए ॥२५३।। जिस प्रकार साधु बड़े प्रयत्नसे तपकी आराधना करते हैं उसी प्रकार विद्याधरोंके गोत्रज पुरुषोंको भी बड़े प्रयत्नसे विद्याकी आराधना १. ध्यायिता ततविग्रहम् म. । २. रसासिक्त म. । ३. सुमच्छया म. । ४. अग्निः । ५. लङ्घयते क., ख. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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