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________________ सप्तमं पवं बालक्रीडापि भीमाभूद्दशग्रीवस्य भास्वतः । कनीयसोस्तु 'सानन्दं विदधे विद्विषामपि ॥ २२७॥ शुशुभे भ्रातृमध्ये सा कन्या सुन्दरविग्रहा । दिवसार्कशशाङ्कानां मध्ये संध्येव सत्क्रिया ॥२२८॥ मातुरङ्के स्थितोऽथासौ घृतचूडः कुमारकः । दशाननो दशाशानां कुर्वन् ज्योत्स्नां द्विजत्विषा ॥२२९॥ नमसा प्रस्थितं क्वापि द्योतयन्तं दिशस्त्विषा । युक्तं खेचरचक्रेण विभूतिबलशालिना ॥२३०|| कक्षा विद्युत्कृतोद्यतैर्मदधाराविसर्जिमिः । वेष्टितं दन्तिजीमूतैः कर्णशङ्ख बलाहकैः ॥२३१॥ महता सूर्यनादेन श्रुतिवाधिर्यकारिणा । कुर्वाणं मुखरं चक्रं दिशामुरुपराक्रमम् ॥ २३२॥ ग्रसित्वेव विमुञ्चन्तं बलेन पुरतो नभः । धीरो वैश्रवणं वीक्षांचक्रे दृष्ट्या प्रगल्मया ॥२३३॥ महिमानं च दृष्ट्वास्य पप्रच्छेति स मातरम् । निघ्नश्चपलभावस्य बालभावेन सस्मितः ||२३४|| अम्ब कोऽयमितो याति मन्यमानो निजौजसा । जगन्तृणमिवाशेषं बलेन महता वृतः ॥ २३५॥ ततः साकथयत्तस्य मातृष्वसीय एष ते । सिद्धविद्यः श्रिया युक्तो महत्या लोककीर्तितः ॥ २३६॥ शत्रूणां जनयन् कम्पं पर्यटत्येष विष्टपम् । महाविभवसंपन्नो द्वितीय इव भास्करः ||२३७॥ भवस्कुलमायातां तवोद्वास्य पितामहम् । अयं पाति पुरीं लङ्कां दत्तामिन्द्रेण वैरिणा ॥ २३८ ॥ मनोरथशतानेष जनकस्तव चिन्तयन् । तदर्थं न दिवा निद्रां न च नक्तमवाप्नुते ||२३९ || अहमप्यनया पुत्र चिन्तया शोषभागता । अवाप्तं मरणं पुंसां स्वस्थानभ्रंशतो वरम् || २४० ॥ १५५ हो । उसके गुणोंसे उत्पन्न उसको निर्मल कीर्ति आज भी संसार में सर्वत्र छायी हुई है || २२६ || तेजस्वी दशाननकी बालक्रीड़ा भी भयंकर होती थी जबकि उसके दोनों छोटे भाइयोंकी बालक्रीड़ा शत्रुओं को भी आनन्द पहुँचाती थी ||२२७|| भाइयोंके बीच सुन्दर शरीरको धारण करनेवाली कन्या चन्द्रनखा, ऐसी सुशोभित होती थी मानो दिन सूर्य और चन्द्रमाके बीच उत्तम क्रियाओंसे युक्त सन्ध्या ही हो || २२८ ॥ अथानन्तर चोटीको धारण करनेवाला दशानन एक दिन माताकी गोद में बैठा हुआ अपने दाँतोंकी किरणोंसे मानो दशों दिशाओं में चांदनी फैला रहा था, उसी समय वैश्रवण आकाश मार्ग से कहीं जा रहा था । वह अपनी कान्तिसे दिशाओंको प्रकाशमान कर रहा था, वैभव और पराक्रम से सुशोभित विद्याधरोंके समूहसे युक्त था तथा उन हाथीरूपी मेघोंसे घिरा था जो कि मालारूपी बिजली के द्वारा प्रकाश कर रहे थे, मदरूपी जलकी धाराको छोड़ रहे थे, और जिनके कानोंमें लटकते हुए शंख वलाकाओं के समान जान पड़ते थे । वैश्रवण कानोंको बहरा करनेवाले तुरही के विशाल शब्दसे दिशाओंके समूहको शब्दायमान कर रहा था । विशाल पराक्रमका धारक था और अपनी बड़ी भारी सेनासे ऐसा जान पड़ता था मानो सामनेके आकाशको ग्रसकर छोड़ ही रहा हो । दशाननने उसे बड़ी गम्भीर दृष्टिसे देखा || २२९ - २३३ || दशानन लड़कपनके कारण चंचल तो था ही अतः उसने वैश्रवणकी महिमा देख हँसते-हँसते माता से पूछा कि हे मा ! अपने प्रतापसे समस्त संसारको तृणके समान समझता हुआ, बड़ी भारी सेनासे घिरा यह कौन यहाँसे जा रहा है ||२३४२३५|| तब माता उससे कहने लगी कि यह तेरी मौसीका लड़का है । इसे अनेक विद्याएँ सिद्ध हुई हैं, यह बहुत भारी लक्ष्मी से युक्त है, लोकमें प्रसिद्ध है, महावैभव से सम्पन्न हुआ दूसरे सूर्य के समान शत्रुओंको कँपकँपी उत्पन्न करता हुआ संसारमें घूमता फिरता है ॥२३६- २३७।। इन्द्र विद्याधरने तेरे बाबाके भाई मालीको युद्धमें मारा और बाबाको तेरी कुल परम्परासे चली आयी लंकापुरीसे दूर हटाकर इसे दी सो उसी लंकाका पालन करता है || २३८ || इस लंकाके लिए तुम्हारे पिता सैकड़ों मनोरथोंका चिन्तवन करते हुए न दिनमें चैन लेते हैं न रात्रिमें नींद || २३९ || हे पुत्र ! १. सा क्रीडा । २. दिशां सुरपराक्रमम् म । ३. वीक्ष्याञ्चक्रे म । ४. चपलभावश्च म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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