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________________ १५४ पद्मपुराणे अथ मेरुगुहाकारे तस्मिन् सूतिगृहोदरे । शयने सस्मितस्तिष्ठन् रक्तपादतलश्चलः ॥२१३॥ उत्तानः कम्पयन् भूमि लीलया शयनान्तिकाम् । सद्यः समुत्थितादित्यमण्डलोपमदर्शनः ॥२१४॥ दत्तं राक्षसनाथेन मेघवाहनरूढये । पुरा नागसहस्रेण रक्षितं प्रस्फुरस्करम् ॥२१५॥ पिनद्धं रक्षसां भीत्या न केनचिदिहान्तरे। आदरेण विना हारं करेणाकर्षदर्भकः ॥२१६॥ हारमुष्टिं ततो बालं दृष्ट्वा माता ससंभ्रमा । चकाराङ्के महास्नेहात् समाजघौ च मूर्धनि ॥२१७॥ दृष्ट्वा पिता च तं बालं सहारं परमादभुतम् । महानेष नरः कोऽपि भवितेति व्यचिन्तयत् ॥२१८॥ नागेन्द्रकृतरक्षेण हारेण रमतेऽमुना। कोऽन्यथा यस्य नो शक्तिर्भविष्यति जनातिगा ॥२१९॥ चारणेन समादिष्टं साधुना यद्वचः पुरा । इदं तद्वितथं नैव जायते यतिभाषितम् ॥२२०॥ दृष्टाश्चर्य स हारोऽस्य जनन्या भीतिमुक्तया । पिनद्धो मासयन्नाशा दश जालेन रोचिषाम् ॥२२१॥ स्थूलस्वच्छेषु रत्नेषु नवान्यानि मुखानि यत् । हारे दृष्टानि यातोऽसौ तद्दशाननसंज्ञिताम् ॥२२२॥ भानुकर्णस्ततो जातः कालेऽतीते कियत्यपि । यस्य भानुरिव न्यस्तः कर्णयोर्गण्डशोभया ॥२२३॥ ततश्चन्द्रनखा जाता पूर्णचन्द्रसमानना । उद्यदर्द्धशशाङ्काभनखभासितदिङमुखा ॥२२४॥ ततो विभीषणो जातः कृतं येन विभीषणम् । जातमात्रेण पापानां सौम्याकारेण साधुना ॥२२५॥ देहवत्त्वं जगामासौ साक्षाद्धर्म इवोत्तमः । अद्यापि गुणजा यस्य कीर्तिर्जगति निर्मला ॥२२६॥ अपनी इच्छाके अनुसार विभिन्न प्रकारके कार्य करती थी ॥२१२॥ अथानन्तर जिसके पैरके तलुए लाल-लाल थे ऐसा वह बालक मेरुपर्वतकी गुहाके समान आकारवाले प्रसूतिकागृहमें शय्याके ऊपर मन्द-मन्द हँसता हुआ पड़ा था। हाथ-पैर हिलानेसे चंचल था, चित्त अर्थात् ऊपरकी ओर मुख कर पड़ा था, अपनी लीलासे शय्याकी समीपवर्ती भूमिको कम्पित कर रहा था, और तत्काल उदित हुए सूर्यमण्डलके समान देदीप्यमान था ॥२१३--२१४।। बहुत पहले मेघवाहनके लिए राक्षसोंके इन्द्र भीमने जो हार दिया था, हजार नागकुमार जिसकी रक्षा करते थे, जिसकी किरणें सब ओर फैल रही थीं और राक्षसोंके भयसे इस अन्तरालमें जिसे किसीने नहीं पहना था ऐसे हारको उस बालकने अनायास ही हाथसे खींच लिया ॥२१५-२१६।। बालकको मुट्ठी में हार लिये देख माता घबड़ा गयी। उसने बड़े स्नेहसे उसे उठाकर गोदमें ले लिया और शीघ्र ही उसका मस्तक संघ लिया ॥२१७|| पिताने भी उस बालकको हार लिये बड़े आश्चर्यसे देखा और विचार किया कि यह अवश्य ही कोई महापुरुष होगा ॥२१८॥ जिसकी शक्ति लोकोत्तर नहीं होगी ऐसा कौन पुरुष नागेन्द्रोंके द्वारा सुरक्षित इस हारके साथ क्रीड़ा कर सकता है ।।२१९|| चारणऋद्धिधारी मुनिराजने पहले जो वचन कहे थे वे यही थे क्योंकि मुनियोंका भाषण कदापि मिथ्या नहीं होता ॥२२०।। यह आश्चर्य देख माताने निर्भय होकर वह हार उस बालकको पहना दिया। उस समय वह हार अपनी किरणोंके समूहसे दसों दिशाओंको प्रकाशमान कर रहा था ॥२२१।। उस हारमें जो बड़े-बड़े स्वच्छ रत्न लगे हुए थे उनमें असली मुखके सिवाय नौ मुख और भी प्रतिबिम्बित हो रहे थे इसलिए उस बालकका दशानन नाम रखा गया ॥२२२॥ दशाननके बाद कितना ही समय बीत जानेपर भानुकर्ण उत्पन्न हुआ। भानुकर्णके कपोल इतने सुन्दर थे कि उनसे ऐसा जान पड़ता था मानो उसके कानोंमें भानु अर्थात् सूर्य ही पहना रखा हो ॥२२३।। भानुकर्णके बाद चन्द्रनखा नामा पुत्री उत्पन्न हुई। उसका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान था और उगते हुए अर्धचन्द्रमाके समान सुन्दर नखोंकी कान्तिसे उसने समस्त दिशाओं को प्रकाशित कर दिया था ॥२२४॥ चन्द्रनखाके बाद विभीषण हुआ। उसका आकार सौम्य था तथा वह साधु प्रकृतिका था। उसने उत्पन्न होते ही पापी लोगोंमें भय उत्पन्न कर दिया था ॥२२५॥ विभीषण ऐसा जान पड़ता था मानो साक्षात् उत्कृष्ट धर्म ही शरीरवत्ताको प्राप्त हुआ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org .
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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