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________________ १४६ पद्मपुराणे ऐरावतं समारूढश्चामर निलवीजितः । सितच्छत्रकृतच्छायो नृत्यत्सुरपुरःसरः ॥१०१॥ रत्नांशुकध्वजन्यस्तशोभमुच्छ्रिततोरणम् । आगुल्फपुष्पविशिखं सिक्तं कुङ्कुमवारिणा ॥१०२॥ गवाक्षन्यस्तसन्नारीनयनालीनिरीक्षितः । युक्तः परमया भूत्या विवेश रथनूपुरम् ॥१०३।। पित्रीश्च विनयात् पादौ प्रणनाम कृताञ्जलिः । तौ च पस्पृशतुर्गात्रं कम्पिना तस्य पाणिना ॥१०४॥ शत्रनेवं स निर्जित्य परमानन्दमागतः । आस्वादयन् परं मोगं प्रजापालनतत्परः ।।१०५॥ सुतरां स ततो लोके प्रसिद्धिं शक्रतां गतः । प्राप्तः स्वर्गप्रसिद्धिं च विजयाईश्च भूधरः ॥१०६॥ उत्पत्तिं लोकपालानां तस्य वक्ष्यामि सांप्रतम् । एकाग्रं मानसं कृत्वा श्रेणिकैषां निबुध्यताम् ॥१०७।। स्वर्गलोकाच्च्युतो जातो मकरध्वजखेचरात् । संभूतो जठरेऽदित्या लोकपालोऽभवच्छशी ॥१०॥ कान्तिमानेष शक्रेण द्योतिःसङ्गे पुरोत्तमे । पूर्वस्यां ककुभि न्यस्तो मुमुदे परमर्द्धिकः ॥१०९॥ जातो मेघरथाभिख्यावरुणायां महाबलः । खेचरो वरुणो नाम संप्राप्तो लोकपालताम् ।।११०॥ पुरे मेघपुरे न्यस्तः पश्चिमायामसौ दिशि । पाशं प्रहरणं श्रत्वा यस्य बिभ्यति शत्रवः ॥१११॥ संभूतः कनकावल्यां किंसूर्येण महात्मना । कुबेराख्यो नमोगामी विभूत्या परयान्वितः ॥११२॥ काञ्चनाख्ये पुरे चायमुदीच्यां दिशि योजितः । संप्राप परमं भोगं प्रख्यातो जगति श्रिया ॥११३॥ संभतः श्रीप्रमागर्भ कालाग्निव्योमचारिणः । चण्डकर्मा यमो नाम तेजस्वी परमोऽभवत् ।।११४|| दक्षिणोदन्वतो द्वीपे किष्कुनाम्नि पुरोत्तमे । स्थापितोऽसौ स्वपुण्यानां प्राप्नुवन्नूजितं फलम् ॥११५।। तथा वन्दीजनोंके समूह जिसकी स्तुति कर रहे थे ऐसे इन्द्र विद्याधरने सन्तोषसे भरे लोकपालोंके साथ रथनूपुर नगरमें प्रवेश किया। वह ऐरावत हाथीपर सवार था, उसके दोनों ओर चमर ढोले जा रहे थे, सफेद छत्रकी उसपर छाया थी, नृत्य करते हुए देव उसके आगे-आगे चल रहे थे, तथा झरोखोंमें बैठी उत्तम स्त्रियाँ अपने नयनोंसे उसे देख रही थीं। उस समय रत्नमयी ध्वजाओंसे रथनूपुर नगरकी शोभा बढ़ रही थी, उसमें ऊँचे-ऊँचे तोरण खड़े किये गये थे, उसकी गलियोंमें घुटनों तक फूल बिछाये गये थे और केशरके जलसे समस्त नगर सींचा गया था। ऐसे रथनूपुर नगरमें उसने बड़ी विभूतिके साथ प्रवेश किया ॥१००-१०३|| राजमहल में पहुंचनेपर उसने हाथ जोड़कर माता-पिताके चरणोंमें नमस्कार किया और माता-पिताने भी कांपते हुए हाथसे उसके शरीरका स्पर्श किया ।।१०४। इस प्रकार शत्रुओंको जीतकर वह परम हर्षको प्राप्त हुआ और उत्कृष्ट भोग भोगता हुआ प्रजापालनमें तत्पर रहने लगा ॥१०५॥ तदनन्तर वह लोकमें इन्द्रकी प्रसिद्धिको प्राप्त हुआ और विजयार्द्ध पर्वत स्वर्ग कहलाने लगा ॥१०६।। गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! अब लोकपालोंकी उत्पत्ति कहता हूँ सो मनको एकाग्र कर सुनो ॥१०७।। स्वर्ग लोकसे च्युत होकर मकरध्वज विद्याधरकी अदिति नामा स्त्रीके उदरसे सोम नामका लोकपाल उत्पन्न हआ था। यह बहत ही कान्तिमान था। इन्द्रने इसे द्योतिःसंग नामक नगरकी पूर्व दिशामें लोकपाल स्थापित किया था। इस तरह यह परम ऋद्धिका धारी होता हुआ हर्षसे समय व्यतीत करता था।॥१०८-१०९|| मेघरथ नामा विद्याधरकी वरुणा नामा स्त्रीसे वरुण नामका लोकपाल विद्याधर उत्पन्न हुआ था। इन्द्रने इसे मेघपुर नगरकी पश्चिम दिशामें स्थापित किया था। इसका शस्त्र पाश था जिसे सुनकर शत्रु दूरसे ही भयभीत हो जाते थे ॥११०-१११।। महात्मा किसूर्य विद्याधरकी कनकावली स्त्रीसे कुबेर नामका लोकपाल विद्याधर उत्पन्न हुआ था। यह परम विभूतिसे युक्त था। इन्द्र ने इसे कांचनपुर नगरकी उत्तर दिशामें स्थापित किया था। यह संसारमें लक्ष्मी के कारण प्रसिद्ध था तथा उत्कृष्ट भोगोंको प्राप्त था ।।११२-११३।। कालाग्नि नामा विद्याधरकी श्रीप्रभा स्त्रीके गर्भसे यम नामका लोकपाल विद्याधर उत्पन्न हुआ था। यह रुद्रकर्मा तथा परम तेजस्वी था ।। ११४ ।। इन्द्रने इसे दक्षिण १. विजया?ऽस्य ख. । विजयाधस्स क.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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