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________________ षष्ठं पर्व वज्रायुधस्य पुत्रोऽयं वज्रशीलाङ्गसंभवः । वज्रपञ्जरनामानमधितिष्ठति पत्तनम् ॥ ३९६ ॥ अस्य बाहुद्वये लक्ष्मीर्दिनेशकरभासुरे । चञ्चलापि स्वभावेन संयतेवावतिष्ठते ॥ ३९७॥ सत्यमन्येऽपि विद्यन्ते नाममात्रेण खेचराः । तेषां खद्योततुल्यानामयं भास्करतां गतः ॥३९८॥ मानेन तुङ्गतामस्य प्राप्तस्य शिरसः पराम् । संप्राप्तं पुनरुत्कर्ष मुकुटं स्फुटरत्नकम् ॥३९९॥ रूपे प्रतिपद्यस्व पतिं विद्याभृतामिमम् । विषयांश्चेत्समान् शच्या मोक्तुं धीस्तव विद्यते ॥१००॥ ततः खेचरभानुं तं दृष्ट्वा कन्या कुमुद्वती । संकोचं परमं याता धात्र्येति गदिता पुनः ॥४०१ ॥ चित्राम्बरस्य पुत्रोऽयं पद्मश्रीकुक्षिसंभवः । नित्यं चन्द्रपुराधीशो नाम्ना चन्द्राननो नृपः ॥ ४०२ ॥ पश्य वक्षोऽस्य विस्तीर्ण चारुचन्दनचर्चितम् । चन्द्ररश्मिपरिष्वक्तं कैलासतटसंनिभम् ॥१०३॥ उच्छलत्करभारोऽस्य हारो वक्षसि राजते । उत्सर्पस्सीकरो दूरं कैलास इव निर्झरः ॥ ४०४ ॥ नामाक्षरकरैरस्य मनः श्लिष्टमरेरपि । प्रयाति परमं ह्लादं दुःखतापविवर्जितम् ॥४०५॥ याति चेदिह ते चेतः प्रसादं सौम्यदर्शने । रजनीव शशाङ्केन लभस्वेतेन संगमम् ॥४०६॥ ततस्तस्मिन्नपि प्रीतिं न मनोऽस्याः समागतम् । कमलिन्या यथा चन्द्रे नयनानन्दकारिणि ॥ ४०७ || पुनराह ततो धात्री कन्ये पश्य पुरन्दरम् । अवतीर्णं महीमेतं भवतीसंगलालसम् ॥४०८॥ सुतोऽयं मेरुकान्तस्य श्रीरम्भागर्भसंभवः । स्वामी मन्दरकुञ्जस्य पुरस्याम्भोधरध्वनिः ॥ ४०९ ॥ राजाके पास ले जाकर बोली || ३९५ ॥ कि यह राजा वज्रायुध और रानी वज्रशीलाका पुत्र खेचरभानु वज्रपंजर नामक नगर में रहता है ॥ ३९६ ॥ | लक्ष्मी यद्यपि स्वभावसे चंचल है तो भी सूर्यकी किरणोंके समान देदीप्यमान इसकी दोनों भुजाओंपर बँधी हुई के समान सदा स्थिर रहती है ||३९७|| १२५ यह सच है कि नाममात्रके अन्य विद्याधर भी हैं परन्तु वे सब जुगनूके समान हैं और यह उनके बीच सूर्यके समान देदीप्यमान है ॥ ३९८ ॥ यद्यपि इसका मस्तक स्वाभाविक प्रमाणसे ही परम ऊँचाईको प्राप्त है फिर भी इसपर जो जगमगाते रत्नोंसे सुशोभित मुकुट बाँधा गया है सो केवल उत्कर्षं प्राप्त करनेके लिए ही बांधा गया है ॥ ३९९ ॥ हे सुन्दरि ! यदि इन्द्राणीके समान समस्त भोग भोगी तेरी इच्छा है तो इस विद्याधरोंके अधिपतिको स्वीकृत कर ॥४००॥ तदनन्तर उस खेचरभानुरूपी सूर्यको देखकर कन्यारूपी कुमुदिनी परम संकोचको प्राप्त हो गयी । यह देख सुमंगला धायने कुछ आगे बढ़कर कहा ||४०१ || कि यह राजा चित्राम्बर और रानी पद्मश्रीका पुत्र चन्द्रानन है, चन्द्रपुर नगरका स्वामी है। देखो, सुन्दर चन्दनसे चर्चित इसका वक्षःस्थल कितना चौड़ा है ? यह चन्द्रमाकी किरणोंसे आलिंगित कैलास पर्वतके तटके समान कितना भला मालूम होता है ? ||४०२-४०३ || छलकती हुई किरणोंसे सुशोभित हार इसके वक्षःस्थलपर ऐसा सुशोभित हो रहा है जैसा कि उठते हुए जलकणोंसे सुशोभित निर्झर कैलासके तटपर सुशोभित होता है ||४०४।। इसके नामके अक्षररूपी किरणोंसे आलिंगित शत्रुका भी मन परम हर्षको प्राप्त होता है तथा उसका सब दुःखरूपी सन्ताप छूट जाता है ॥ ४०५ || हे सौम्यदर्शने ! यदि तेरा चित्त इसपर प्रसन्नताको प्राप्त है तो चन्द्रमाके साथ रात्रिके समान तू इसके साथ समागमको प्राप्त हो || ४०६ || तदनन्तर नेत्रोंको आनन्दित करनेवाले चन्द्रमापर जिस प्रकार कमलिनीका मन प्रीतिको प्राप्त नहीं होता उसी प्रकार राजा चन्द्राननपर श्रीमालाका मन प्रीतिको प्राप्त नहीं हुआ || ४०७ || तब धाय बोली कि हे कन्ये ! इस राजा पुरन्दरको देखो। यह पुरन्दर क्या है मानो तुम्हारे संगमकी लालसासे पृथिवीपर अवतीर्णं हुआ साक्षात् पुरन्दर अर्थात् इन्द्र ही है ||४०८|| यह राजा मेरुकान्त और रानी श्रीरम्भाका पुत्र है, मन्दरकुंज नगरका स्वामी है, मेघके समान इसकी जोरदार आवाज १. स्वरूपे म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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