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________________ १२६ पद्मपुराणे शक्ता यस्य न संग्रामे दृष्टिं संमुखमागताम् । प्रतिपत्तुं कुतो बाणान् शत्रवो मयदारिताः ॥ ४१० ॥ संभावयामि देवानां नाथोऽप्यस्माद् व्रजेद् भयम् । अभग्नप्रसरो ह्यस्य प्रतापो भ्रमति क्षितिम् ॥ ४११ ॥ उन्नतं चरणेनास्य शिरस्ताडय सुस्वने । प्रस्तावे प्रेमयुक्तेषु कलहेषु नितम्बिनि ॥ ४१२ ॥ असावपि ततस्तस्या न लेभे मानसे पदम् । चित्रा हि चेतसो वृत्तिः प्रजानां कर्महेतुका ॥४१३॥ अमापयदिमां बालां ततोऽन्यं व्योमचारिणम् । धात्री मदःसरस्यब्जं हंसीमुत्कलिका यथा ॥ ४१४ ॥ उवाच च सुते पश्य नृपमेतं महाबलम् । मनोजवेन वेगिन्यां संभूतं वायुरंहसम् ॥ ४१५ ॥ नाकार्द्धसंज्ञकस्यायं पुरस्य परिरक्षिता । अतिक्रम्य स्थिता यस्य गणनां विमला गुणाः ॥ ४१६ ॥ समुत्क्षेपमात्रेण सर्वं यः क्षितिमण्डलम् । भ्राम्यति स्वाङ्गवेगोत्थवातपातितभूधरः ॥४१७॥ विद्याबलेन यः कुर्याद् भूमिं गगनमध्यगाम् । दर्शयेद्वा ग्रहान् सर्वान् धरणीतलचारिणः ॥४१८॥ तुरीयं वा सृजेल्लोकं सूर्यं वा चन्द्रशीतलम् । चूर्णयेद्वा घराशीशं स्थापयेद्वानिलं स्थिरम् ॥४१९॥ शोषयेद् वाम्भसां नाथं मूर्तं कुर्वीत वा नभः । भाषितेनोरुणा किं वा भवेद्यस्य यत्रेप्सितम् ॥४२०॥ तत्रापि न मनस्तस्याश्चक्रे स्थानमयुक्तिकम् । वदत्येपेति चाज्ञासीत् सर्वशास्त्रकृतश्रमा ॥ ४२१|| अन्यानपि बहूनेवं धात्रीदर्शित संपदः । विद्याबलसमायुक्तान् कन्या तत्याज खेचरान् ॥ ४२२॥ ततोऽसौ चन्द्रलेखेव व्यतीता यान्नभश्चरान् । पर्वता इव ते प्राप्ताः श्यामतां लोकवाहिनः ॥४२३॥ है || ४०९ || युद्ध में भय से पीड़ित शत्रु इसकी सम्मुखागत दृष्टिको सहन करने में असमर्थ रहते हैं फिर ariat तो बात ही अलग है ॥ ४१० ॥ मुझे तो लगता है कि देवोंका अधिपति इन्द्र भी इससे भयभीत हो सकता है, वास्तव में इसका अखण्डित प्रताप समस्त पृथ्वीमें भ्रमण करता है ||४११|| हे सुन्दर शब्दोंवाली नितम्बिनि ! प्रेमपूर्ण कलह के समय तूं इसके उन्नत मस्तकको अपने चरण से ताडित कर ||४१२|| राजा पुरन्दर भी उसके हृदय में स्थान नहीं पा सका सो ठीक ही है क्योंकि अपने-अपने कर्मोंके कारण लोगोंकी चित्तवृत्ति विचित्र प्रकारकी होती है || ४१३|| जिस प्रकार सरोवर में तरंग हंसी को दूसरे कमलके पास ले जाती है उसी प्रकार धाय उस कन्याको सभारूपी सरोवर में किसी दूसरे विद्याधरके पास ले जाकर बोली कि हे पुत्रि ! इस राजा महाबलको देख । यह राजा मनोजवके द्वारा वेगिनी नामक रानीसे उत्पन्न हुआ है । वायुके समान इसका वेग है ||४१४ - ४१५ ।। नाकापुरका स्वामी है, इसके निर्मल गुण गणना से परे हैं ||४१६ || अपने शरीर के वेगसे उत्पन्न वायुके द्वारा पर्वतों को गिरा देनेवाला यह राजा भौंह उठाते ही समस्त पृथिवीमें चक्कर लगा देता है ||४१७ || यह विद्या से पृथिवीको आकाशगामिनी बना सकता है और समस्त ग्रहों को पृथिवी - तलचारी दिखा सकता है || ४१८ ।। अथवा तीन लोकके सिवाय चतुर्थं लोककी रचना कर सकता है, सूर्यको चन्द्रमाके समान शीतल बना सकता है, सुमेरु पर्वतका चूर्ण कर सकता है, वायुको स्थिर बना सकता है, समुद्रको सुखा सकता है और आकाशको मूर्तिक बना सकता है । अथवा अधिक कहने से क्या ? इसकी जो इच्छा होती है वैसा ही कार्य हो जाता है ||४१९-४२० ॥ धाने यह सब कहा सही, पर कन्याका मन उसमें स्थान नहीं पा सका । कन्या सर्वशास्त्रोंको जानने वाली थी इसलिए उसने जान लिया कि यह धाय अत्युक्तियुक्त कह रही है - इसके कहने में सत्यता नहीं है || ४२१ || इस तरह धायके द्वारा जिनके वैभवका वर्णन किया गया था ऐसे बहुत-से विद्याबलधारी विद्याधरोंका परित्याग कर कन्या आगे बढ़ गयी ||४२२|| तदनन्तर जिस प्रकार चन्द्रलेखा जिन पर्वतोंको छोड़कर आगे बढ़ जाती है वे पर्वत अन्धकारसे मलिन हो जाते हैं उसी प्रकार कन्या श्रीमाली जिन विद्याधरोंको छोड़कर आगे बढ़ गयी थी वे शोकको १. मानसंपदाम् क. । २. गणतां म. । ३. व्यतीयाय नभश्चरान् म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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