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________________ षष्ठं पर्व ११९ विलीनत्रिपुसीसादिपानदायिषु केषुचित् । तीच्णतुण्डस्फुरस्करमक्षिकादिषु केषुचित् ॥३०९।। कृमिप्रकारसंमिश्ररक्तपङ्केषु केषुचित् । परस्परसमुद्भूतबाधाहेतुषु केषुचित् ॥३१०॥ एवं विधेषु जीवानां सदा दुःखविधायिषु । दुःखं यन्नरकेषु स्यात् कः शक्तस्तप्रकीर्तितुम् ॥३११॥ यतो यथा पुरा भ्रान्तौ युवां दुःखासु योनिषु । तथा पर्यटनं भूयः प्राप्स्यतो धर्मवर्जितौ ॥३१२॥ इत्युक्ताभ्यां परिपृष्टस्ताभ्यां श्रमणसत्तमः । कथं कुयोनिषु भ्रान्तावावामिति मुने वद ॥३१॥ जन्मान्तरं ततोऽवोचत्तयोः संयममण्डनः । मनो निधीयतां वत्सावित्युक्त्वा मधुरं वचः ॥३१४॥ पर्यटन्तौ युवामत्र संसारे दुःखदायिनि । परस्परस्य कुर्वाणौ वधं मोहपरायणौ ॥३१५॥ मानुष्यमावमायातौ कथंचित् कर्मयोगतः । अयं हि दुर्बलो लोके धर्मोपादानकारणम् ॥३१६॥ व्याधस्तयोरभूदेको विषये काशिनामनि । श्रावस्त्यामपरोऽमात्यपदे स्थैर्यमुपागतः ॥३५७।। सुयशोदत्तनामासौ प्रवृज्यामाश्रितः क्षितौ । चचार तपसा युक्तो महतात्यन्तरूपवान् ॥३१८॥ ततस्तं सुस्थितं देशे काश्यां प्राणविवर्जिते । पूजनार्थ समायाताः सम्यग्दृष्टिकुलाङ्गनाः ॥३१९।। स्त्रीभिस्ततः परीतं तं व्याधोऽसौ वीक्ष्य योगिनम् । अतक्ष्णोद्वाभिरुग्राभिः शस्त्रैः कुर्वन् विभीतिकाम् ॥३२० निर्लजो वस्त्रमुक्तोऽयं स्नानवर्जितविग्रहः । मृगयायां प्रवृत्तस्य जातो मेऽमङ्गलं महत् ॥३२१॥ वदत्येवं ततो व्याधे धनुर्भीषणकारिणि । मुनेः कलुषतां प्राप्तं ध्यानं दुःखेन संभृतम् ॥३२२।। इति वाचिन्तयत् क्रोधान्मुष्टिघातेन पापिनम् । कणशश्चूर्णयाम्येनं व्याधं रूक्षवचोमुचम् ॥३२३॥ करनेवाले वृक्षोंसे युक्त हैं। कितने ही ऐसे हैं जिनमें पिघलाया हुआ रांगा, सीसा आदि पिलाया जाता है। कितने ही ऐसे हैं जिनमें तीक्ष्णमखवाली दष्ट मक्खियाँ आदि विद्यमान हैं। कितने ही ऐसे हैं जिनमें रक्तकी कीचमें कृमिके समान अनेक छोटे-छोटे जीव बिलबिलाते रहते हैं और कितने ही ऐसे हैं जिनमें परस्पर-एक दूसरेके द्वारा दुःखके कारण उत्पन्न होते रहते हैं ॥३०६-३१०॥ इस प्रकारके सदा दुःखदायी नरकोंमें जीवोंको जो दुःख प्राप्त होता है उसे कहनेके लिए कोन समर्थ है ? ॥३११॥ जिस प्रकार तुम दोनोंने पहले दुःख देनेवाली अनेक कुयोनियोंमें भ्रमण किया था यदि अब भी तुम धर्मसे वंचित रहते हो तो पुनः अनेक कुयोनियोंमें भ्रमण करना पड़ेगा ॥३१२।। मुनिराजके यह कहनेपर देव तथा विद्याधरने उनसे पूछा कि हे भगवन् ! हम दोनोंने किस कारण कुयोनियोंमें भ्रमण किया है ? सो कहिए ॥३१३।। तदनन्तर-'हे वत्सो! मन स्थिर करो' इस प्रकारके मधुर वचन कहकर संयमरूपी आभूषणसे विभूषित मुनिराज उन दोनोंके भवान्तर कहने लगे ॥३१४।। इस दुःखदायी संसारमें मोहसे उन्मत्त हो तुम दोनों एक दूसरेका वध करते हुए चिरकाल तक भ्रमण करते रहे ॥३१५।। तदनन्तर किसी प्रकार कर्मयोगसे मनुष्य भवको प्राप्त हुए। निश्चयसे संसारमें धर्मप्राप्तिका कारणभूत मनुष्यभवका मिलना अत्यन्त कठिन है ।।३१६।। उनमें से एक तो काशी देशमें श्रावस्ती नगरीमें राजाका सुयशोदत्तनामा मन्त्री हुआ। सुयशोदत्त अत्यन्त रूपवान् था, कारण पाकर उसने दीक्षा ले ली और महातपश्चरणसे युक्त हो पृथ्वीपर विहार करने लगा ॥३१७॥ विहार करते हुए सुयशोदत्तमुनि काशी देशमें आकर किसी निर्जन्तु स्थानमें विराजमान हो गये। उनकी पूजाके लिए अनेक सम्यग्दृष्टि स्त्रियाँ आयी थीं सो पापी व्याध, स्त्रियोंसे घिरे उन मुनिको देख तीक्ष्ण वचनरूपी शस्त्रोंसे भय उत्पन्न करता हुआ बेधने लगा ॥३१८-३२०॥ यह निर्लज्ज नग्न, तथा स्नानरहित मलिन शरीरका धारक, शिकारके लिए प्रवृत्त हुए मुझको महा अमंगलरूप हुआ है ॥३२१॥ धनुषसे भय उत्पन्न करनेवाला व्याध जब उक्त प्रकारके वचन कह रहा था तब दुःखके कारण मुनिका ध्यान कुछ कलुषताको प्राप्त हो गया ॥३२२।। क्रोधवश वे विचारने लगे कि रुक्ष वचन कहनेवाले इस पापी व्याधको मैं एक मुट्ठीके प्रहारसे कण-कण कर चूर्ण कर डालता हूँ ॥३२३।। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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