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________________ १२० पद्मपुराणे ततः कापिष्ठगमनं मुनिना यदुपार्जितम् । तदस्य क्रोधसंभारात् भैणाद् भ्रंशमुपागतम् ॥३२॥ ततोऽसौ कालधर्मेण युक्तो ज्योतिःसुरोऽभवत् । ततः प्रच्युस्य जातस्त्वं विद्युत्केशो नमश्चरः ॥३२५॥ व्याधोऽपि सुचिरं भ्रान्त्वा भवद्गुममहावने । लङ्कायां प्रमदोद्याने शाखामृगगतिं गतः ॥३२६॥ ततोऽसौ निहतः स्त्यर्थ स्वया बाणेन चापलात् । प्राप्य पञ्चनमस्कारं जातोऽयं सागरामरः ॥३२७॥ एवं ज्ञात्वा पुनर्वैरं मुञ्चतं देवखेचरौ । मा भूद् भूयोऽपि संसारे भवतोः परिहिण्डनम् ॥३२८॥ वोच्छतं नरमात्रेण शक्यं यन्न प्रशंसितुम् । सिद्धानां तत्सुखं भद्रौ भद्राचारपरायणौ ॥३२९॥ नमितं पणतं देवैराखण्डलपुरस्सरैः । भक्त्या परमया युक्ती मुनिसुव्रतमीश्वरम् ॥३३०॥ शरणं प्राप्य तं नार्थ निष्ठितात्मप्रतिक्रियम् । परकृत्यसमुद्युक्तं प्राप्स्यथः परमं सुखम् ॥३३॥ ततो मुनिमुखादित्यानिर्गतेन वोऽशुना । परं प्रबोधमानीतस्तडित्केशः सरोजवत् ॥३३२॥ सुकेशसंज्ञके पुत्रे संक्रमय्य निजं पदम् । शिष्यतामगमेद्धीरो मुनेरम्बरचारिणः ३३३॥ सम्यग्दर्शनसंज्ञानसच्चारित्रत्रयं ततः । समाराध्यगतः कालं बभूवामरसत्तमः ॥३३४॥ ततः किष्कुपुरस्वामी महोदधिरवाभिधः । कान्तामिः सहितस्तिष्ठन् विद्युत्सदृशदीप्तिभिः ॥३३५॥ चन्द्रपादाश्रये रम्ये महाप्रासादमूर्द्धनि । चारुगोष्ठीसुधास्वादं विन्दन् देवेन्द्रवत्सुखम् ।।३३६॥ वेगेन महतागत्य धवलाम्बरधारिणा । खेचरेणापतो भूत्वा कृत्वा प्रणतिमादरात् ॥३३७।। निवेदितस्तडिकेशः प्रव्रज्या कारणान्विताम् । प्राप्य भोगेषु निर्वेदं दीक्षणे मतिमादधे ॥३३८॥ मुनिने तपश्चरणके प्रभावसे कापिष्ठ स्वर्ग में जाने योग्य जो पुण्य उपार्जन किया था वह क्रोधके कारण क्षणभरमें नष्ट हो गया ॥३२४॥ तदनन्तर कुछ समताभावसे मरकर वह ज्यौतिषीदेव हुआ। वहाँसे आकर तू विद्युत्केश नामक विद्याधर हुआ है ॥३२५॥ और व्याधका जीव चिरकाल तक संसाररूपी अटवीमें भ्रमणकर लंकाके प्रमदवनमें वानर हुआ ॥३२६।। सो चपलता करनेके कारण स्त्रीके निमित्त तूने इसे बाणसे मारा। वही अन्तमें पंचनमस्कार मन्त्र प्राप्त कर महोदधि नामका देव हआ है॥३२७|| ऐसा विचारकर हे देव विद्याधरो ! तुम दोनों अब अपना वैर-भाव छोड़ दो जिससे फिर भी संसारमें भ्रमण नहीं करना पड़े ॥३२८|| हे भद्र-पुरुषो! तुम भद्र आचरण करने में तत्पर हो इसलिए सिद्धोंके उस सखकी अभिलाषा करो जिसकी मनुष्यमात्र प्रशंसा नहीं कर सकता ॥३२९॥ इन्द्र आदि देव जिन्हें नमस्कार करते हैं ऐसे मुनिसुव्रत भगवान्को परमभक्तिसे युक्त हो नमस्कार करो ॥३३०॥ वे भगवान् आत्महितका कार्य पूर्ण कर चुके हैं । अब परहितकारी कार्य करनेमें ही संलग्न हैं सो तुम दोनों उनको शरणमें जाकर परम सुखको प्राप्त करोगे ॥३३१॥ तदनन्तर मुनिराजके मुखरूपी सूर्यसे निर्गत वचनरूपी किरणोंसे विद्युत्केश कमलके समान परम प्रबोधको प्राप्त हुआ॥३३२।। फलस्वरूप वह धीर वीर, सुकेश नामक पुत्रके लिए अपना पद सौंपकर चारण ऋद्धि धारी मुनिराजका शिष्य हो गया अर्थात् उनके समीप उसने दीक्षा धारण कर ली ॥३३३।। तदनन्तर सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र इन तीनोंकी आराधना कर वह अन्तमें समाधिके प्रभावसे उत्तम देव हुआ ॥३३४॥ इधर किष्कपुरका स्वामी महोदधि, बिजलीके समान कान्तिको धारण करने वाली स्त्रियोंके साथ, जिस पर चन्द्रमाकी किरणें पड़ रही थीं ऐसे महामनोहर उत्तुंग भवनके शिखरपर सुन्दर गोष्ठी रूपी अमृतका स्वाद लेता हुआ इन्द्रके समान सुखसे बैठा था ॥३३५-३३६।। कि उसी समय शुक्ल वस्त्रको धारण करने वाले एक विद्याधरने बड़े वेगसे आकर तथा सामने खड़े होकर आदर पूर्वक प्रणाम किया और तदनन्तर विद्युत्केश विद्याधरके दीक्षा लेनेका समाचार कहा। समाचार सुनते ही महोदधिने भोगोंसे विरक्त होकर दीक्षा लेनेका विचार किया ॥३३७-३३८॥ १. क्षणाद्भस्ममुपागतम् म० । २. वांछितं खः । ३. -द्वीरो म० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org,
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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