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________________ षष्ठं पर्व ११७ यद्यपि स्यात् क्वचित्किञ्चि धर्म प्रेति कुशासने । हिंसादिरहिताचारे शरीरश्रमदेशिनि ॥२८२॥ सम्यग्दर्शनहीनत्वान्मूलच्छिन्नं तथापि तत्। 'नाज्ञानं क्षुद्रचारित्रं तेषां भवति मुक्तये ॥२८३॥ पार्थिवो लोष्टलेशोऽपि वैडूर्यमपि पार्थिवम् । न पार्थिवत्वसामान्यात्तयोस्तुल्यं गुणादिकम् ॥३८४॥ लोष्टुलेशसमो धर्मो मिथ्यादृग्भिः प्रकीर्तितः । वैडूर्यसदृशो जैनो धर्मसंज्ञा तु सर्वगा ॥२८५।। धर्मस्य हि दया मूलं तस्या मूलमहिंसनम् । परिग्रहवतां पुंसा हिंसनं सततोद्भवम् ॥२८६॥ तथा सत्यवचो धर्मस्तच्च यन्न परासुखम् । अदत्तादानमुक्तिश्च परनार्याश्च वर्जनम् ।।२८७॥ द्रविणाप्तिषु संतोषो हृषीकाणां निवारणम् । तनूकृतिः कषायाणां विनयो ज्ञानसेविनाम् ॥२८८॥ व्रतमेतद् गृहस्थानां सम्यग्दर्शनचारिणाम् । आगाररहितानां तु शृणु धर्म यथाविधि ॥२८९।। पञ्चोदारव्रतोत्तुङ्गमातङ्गस्कन्धवर्तिनः । त्रिगुप्तिदृढनीरन्ध्रकङ्कटच्छन्नविग्रहाः ॥२९०॥ पादातेन समायुक्ताः समित्या पञ्चभेदया । नानातपोमहातीक्ष्णशस्त्रयुक्तमनस्कराः ॥२९॥ वृत्तं कषायसामन्तैर्मोहवारणवर्तिनम् । भवारातिं विनिघ्नन्ति निरम्बरमहानृपाः ॥२९२॥ सर्वारम्भपरित्यागे सम्यग्दर्शनसंगते । धर्मः स्थितोऽनगाराणामेष धर्मः समासतः ॥२९३॥ त्रिलोकश्रीपरि प्राप्तधर्मोऽयं हेतुतां गतः । एष एव परं प्रोक्तो मङ्गलं पुरुषोत्तमैः ॥२९४॥ अन्यः कस्तस्य कथ्येत धर्मस्य परमो गुणः । त्रिलोकशिखरं येन प्राप्यते सुमहासुखम् ॥२९५॥ प्राणी धर्म प्राप्त करनेकी इच्छासे बड़े-बड़े दण्डोंके द्वारा आकाशको ताडित करते हैं अर्थात् जिन कार्यों में धर्मकी गन्ध भी नहीं उन्हें धर्म समझकर करते हैं ।।२८१॥ जिसमें प्रतिपादित आचार, हिंसादि पापोंसे रहित है तथा जिसमें शरीर-श्रम-कायक्लेशका उपदेश दिया गया है ऐसे किसी मिथ्याशासनमें भी यद्यपि थोड़ा धर्मका अंश होता है तो भी सम्यग्दर्शनसे रहित होनेके कारण वह निर्मूल ही है। ऐसे जीवोंका ज्ञानरहित क्षुद्र चारित्र मुक्तिका कारण नहीं है ।।२८२-२८३॥ मिट्टीका ढेला भी पार्थिव है और वैडूर्य मणि भी पार्थिव है सो पार्थिवत्व सामान्यकी अपेक्षा दोनोंके गुण आदिक एक समान नहीं हो जाते ॥२८४।। मिथ्यादृष्टियोंके द्वारा निरूपित धर्म मिट्टीके ढेलेके समान है और जिनेन्द्र भगवान्के द्वारा निरूपित धर्म वैदूर्य मणिके समान है जब कि धर्म संज्ञा दोनोंमें ही समान है ।।२८५॥ धर्मका मूल दया है और दयाका मूल अहिंसा रूप परिणाम है। परिग्रही मनुष्योंके हिंसा निरन्तर होती रहती है ।।२८६॥ दयाके सिवाय सत्य वचन भी धर्म है परन्तु सत्य वचन वह कहलाता है कि जिससे दूसरेको दुःख न हो। अदत्तादानका त्याग करना, परस्त्रीका छोड़ना, धनादिकमें सन्तोष रखना, इन्द्रियोंका निवारण करना, कषायोंको कृश करना और ज्ञानी मनुष्योंकी विनय करना, यह सम्यग्दृष्टि गृहस्थोंका व्रत अर्थात् धर्मका विधिपूर्वक निरूपण करता हूँ सो सुनो ॥२८७-२८९।। जो पंच महाव्रत रूपी उन्नत हाथीके स्कन्धपर सवार हैं, तीन गुप्ति रूपी मजबूत तथा निश्छिद्र कवचसे जिनका शरीर आच्छादित है, जो पंच समितिरूपी पैदल सिपाहियोंसे युक्त है, और जो नाना तपरूपी महातीक्ष्ण शस्त्रोंके समूहसे सहित हैं ऐसे दिगम्बर यति रूपी महाराजा, कषाय रूपी सामन्तोंसे परिवृत तथा मोह रूपी हाथीपर सवार संसार रूपी शत्रुको नष्ट करते हैं ।।२९०-२९२।। जब सब प्रकारके आरम्भका त्याग किया जाता है और सम्यग्दर्शन धारण किया जाता है तभी मुनियोंका धर्म प्राप्त होता है। यह संक्षेपमें धर्मका स्वरूप समझो ॥२९३॥ यह धर्म ही त्रिलोक सम्बन्धी लक्ष्मीकी प्राप्तिका कारण है। उत्तम पुरुषोंने इस धर्मको ही उत्कृष्ट मंगलस्वरूप कहा है ।।२९४॥ जिस धर्मके द्वारा महासुखदायी त्रिलोकका १. धर्मस्य लेश: धर्म प्रति (अव्ययीभावसमासः)। २. देशिने म., ख.। ३. च म.। ४. न ज्ञानं म. । ५. स तदोद्भवम् म.। ६. त्रिगुप्त म. । ७. पदातीनां समूहः पादातं तेन । ८. महीतीक्ष्ण म.। ९. धर्मस्थिता. नगाराणा -म, । १०. प्राप्ते धर्मोऽयं म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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