SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 166
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ११६ पपपुराणे अहो परममाहात्म्यं तपसो भुवनातिगम् । मुनेरेवंविधस्यापि यदन्यो विद्यते गुरुः ॥२६७॥ ततस्तस्योपकण्ठे ते साधुनाधिष्ठिता ययः । देवाश्च व्योमयानाश्च धर्मोत्कण्ठितचेतसः ॥२६८॥ गत्वा प्रदक्षिणीकृत्य प्रणम्यादरतो मुनिम् । नातिदूरे न चात्यन्तसमीपे स्थितिमाश्रिताः ॥२६९॥ ततस्ता परमां मूर्ति तपोराशिसमुत्थया । प्रज्वलन्ती मुनेर्दीप्त्या' दृष्ट्वा देवनभश्चराः ॥२७॥ चिन्तां कामपि संप्राप्ता धर्माचारसमुद्भवाम् । प्रफुल्लनयनाम्भोजा महाविनयसंगताः ॥२७॥ ततो देवनभोयानावञ्जलिं न्यस्य मस्तके । पप्रच्छतुर्मुनि धर्म फलं चास्य यथोचितम् ॥२७२।। ततो जन्तुहितासंगनित्यप्रस्थितमानसः । संसारकारणासंगदूरीकृतसमीहितः ॥२७३॥ सजलाम्भोदगम्भीरधीरया श्रमणो गिरा। जगाद परमं धर्म जगतोऽभ्युदयावहम् ॥२७४।। तस्मिन् गदति तद्देशे लतामण्डपसंश्रिताः। ननृतुः शिखिसंघाता मेघनादविशक्किनः ॥२७५॥ समाधाय मनो धर्मः श्रूयतां सुरखेचरौ । यथा जिनैः समुद्दिष्टो भुवनानन्दकारिभिः ॥२६॥ धर्मशब्दनमात्रेण बहवः प्राणिनोऽधमाः । अधर्ममेव सेवन्ते विचारजडचेतसः॥२७७॥ मार्गोऽयमिति यो गच्छेद् दिशमज्ञाय मोहवान् । द्राधीयसापि कालेन नेष्टं स्थानं स गच्छति ॥२७॥ कथाकल्पितधर्माख्यमधर्म मैन्दमानसाः । प्राणिघातादिभिर्जातं सेवन्ते विषयाश्रिताः ॥२७९॥ ते तं भावेन संसेव्य मिथ्यादर्शनदूषिताः । तिर्यग्नरकदुःखानां प्रपद्यन्ते निधानताम् ॥२८०॥ कुहेतुजालसंपूर्णग्रन्थार्थैर्गुरुदण्डकैः । धर्मोपलिप्सया मूढास्ताडयन्ति नमस्तलम् ॥२८॥ विचार किया कि अहो तपका कैसा लोकोत्तर माहात्म्य है कि ऐसे सर्वगुणसम्पन्न मुनिराजके भी अन्य गुरु विद्यमान हैं ॥२६६-२६७|| तदनन्तर धर्मके लिए जिनका चित्त उत्कण्ठित हो रहा था ऐसे देव और विद्याधर उक्त मुनिराजके साथ उनके गुरुके समीप गये ॥२६८॥ वहाँ जाकर उन्होंने बड़े आदरके साथ प्रदक्षिणा देकर गुरुको नमस्कार किया और नमस्कारके अनन्तर न तो अत्यन्त दूर और न अत्यन्त पास किन्तु कुछ दूर हट कर बैठ गये ।।२६९।। तदनन्तर तपकी राशिसे उत्पन्न दीप्तिसे देदीप्यमान मुनिराजकी उस उत्कृष्ट मुद्राको देखकर देव और विद्याधर धर्माचारसे समुद्भत किसी अद्भुत चिन्ताको प्राप्त हुए। उस समय हर्ष और आश्चर्यसे सबके नेत्र-कमल प्रफुल्लित हो रहे थे तथा सभी महाविनयसे युक्त थे ॥२७०-२७१॥ तत्पश्चात् देव और विद्याधर दोनोंने हाथ जोड़ मस्तकसे लगाकर मुनिराजसे धर्म तथा उसके यथायोग्य फलको पूछा ॥२७२॥ तदनन्तर जिनका मन सदा प्राणियोंके हितमें लगा रहता था तथा जिनकी समस्त चेष्टाएँ संसारके कारणोंके सम्पर्कसे सदा दूर रहती थीं ऐसे मुनिराज सजल मेघको गर्जनाके समान गम्भीर वाणीसे जगत्का कल्याण करनेवाले उत्कृष्ट धर्मका निरूपण करने लगे ।।२७३-२७४॥ जब मुनिराज बोल रहे थे तब लतामण्डपमें स्थित मयूरोंके समूह मेघ गर्जनाकी शंका कर हर्षसे नृत्य करने लगे थे ॥२७५।। मुनिराजने कहा कि हे देव और विद्याधरो! संसारका कल्याण करनेवाले जिनेन्द्र भगवान्ने धर्मका जैसा स्वरूप कहा है वैसा ही मैं कहता हूँ आपलोग मन स्थिर कर सुनो ॥२७६।। जिनका चित्त विचार करने में जड़ है ऐसे बहुत-से अधम प्राणी धर्मके नाम पर अधर्मका ही सेवन करते हैं ।।२७७॥ जो मोही प्राणी गन्तव्य दिशाको जाने बिना 'यही मार्ग है' ऐसा समझ विरुद्ध दिशामें जाता है वह दीर्घकाल बीत जाने पर भी इष्ट स्थान पर नहीं पहुंच सकता है ।।२७८॥ विचार करनेको क्षमतासे रहित विषयलम्पटी मनुष्य, कथा-कहानियों द्वारा जिसे धर्म संज्ञा दी गई है ऐसे जीवघात आदिसे उत्पन्न अधर्मका ही सेवन करते हैं ॥२७९।। मिथ्यादर्शनसे दूषित मनुष्य ऐसे अधर्मका अभिप्रायपूर्वक सेवनकर तिर्यंच तथा नरकगतिके दुःखोंके पात्र होते हैं ॥२८०॥ कुयुक्तियोंके जालसे परिपूर्ण ग्रन्थोंके अर्थसे मोहित १. दीप्ता म. । २. विशङ्किताः म. । ३. मदमानसाः म. । ४. ते ते म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy