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________________ षष्ठं पर्व ११५ ततस्तं विनयोपेतं दृष्ट्वा खेचरपुङ्गवम् । महोदधिकुमारेण वाक्यमेतदुदाहृतम् ॥२५३॥ तिर्यग्जातिस्वभावेन नितान्तं चपलस्त्वया। अपराद्धः स्वजायायां हतो योऽसौ प्लवङ्गमः ॥२५४॥ सोऽहं साधुप्रसादेन संप्राप्तो देवतामिमाम् । महाशक्तिसमायुक्तां यथेच्छावाप्तसंपदाम् ॥२५५॥ विभूतिं मम पश्य त्वमिति चोक्त्वा परां श्रियम् । स तस्मै प्रकटीचक्रे महोदधिसुरोचिताम् ॥२५६॥ ततोऽसौ वेपथु प्राप्तो भयात् सर्वशरीरगम् । विदीर्णहृदयो दृष्टरोमा विभ्रान्तलोचनः ॥२५७॥ महोदधिकुमारेण मा भैषीरिति चोदितः । जगाद गद्गदं वाक्यं किं करोमीति दुःखितः ॥२५८॥ ततस्तेन सुरेणासौ गुर्वन्तिकमुपाहृतः । ताभ्यां प्रदक्षिणीकृत्य कृतं तस्यांघ्रिवन्दनम् ॥२५९।। वानरेण सता प्रासं मया देवत्वमीदृशम् । गुरुं भवन्तमासाद्य वत्सलं सर्वदेहिनाम् ॥२६०।। देवेनेत्यभिधायासौ स्तुतो वाग्भिः पुनः पुनः । अर्चितश्च महात्रग्भिः पादयोः प्रणतस्तथा ॥२६॥ तदाश्चर्य ततो दृष्ट्वा खेचरेण तपोधनः । संपृष्टः किं करोमीति जगाद वचनं हितम् ॥२६२॥ चतुर्ज्ञानोपगूढात्मा ममास्त्यत्र समीपगः । गुरुस्तस्यान्तिकं याम एष धर्मः सनातनः ॥२६३॥ आचार्य ध्रियमाणे यस्तिष्ठत्यन्तिकगोचरे। करोत्याचार्यकं मूढः शिष्यतां दूरमृत्सृजन् ॥२६॥ नासौ शिष्यो न चाचार्यों निर्धर्मः स कुमार्गगः । सर्वतो भ्रंशमायातः स्वाचारात् साधुनिन्दितः ॥२६५॥ इत्युक्ते विस्मयोपेतौ जातौ देवनभश्चरौ । चक्रतुश्चेतसीदं च परिवारसमन्वितौ ॥२६६॥ पड़ती ॥२५२॥ तदनन्तर विद्याधरोंके राजा विद्युत्केशको विनयावनत देखकर महोदधिकुमारने यह वचन कहे ॥२५३॥ कि पशुजातिके स्वभावसे जो अत्यन्त चपल था तथा इसी चपलताके कारण जिसने तुम्हारी स्त्रीका अपराध किया था ऐसे जिस वानरको तूने मारा था वह मैं ही हूँ। साधुओंके प्रसादसे इस देवत्व पर्यायको प्राप्त हुआ हूँ। यह पर्याय महाशक्तिसे युक्त है तथा इच्छानुसार इसमें संपदाएँ प्राप्त होती हैं ।।२५४-२५५।। तुम मेरी विभूतिको देखो यह कह कर उसने मनोदधि कुमारदेवके योग्य अपनी उत्कृष्ट लक्ष्मी उसके सामने प्रकट कर दी ॥२५६।। यह देख भयसे विद्युत्केशका सर्व शरीर काँपने लगा, उसका हृदय विदोणं हो गया, रोमांच निकल आये और आँखे घूमने लगीं ॥२५७।। तब महोदधिकुमारने कहा कि डरो मत । देवकी वाणी सुन, दुःखी होते हुए विद्युत्केशने गद्गद वाणीमें कहा कि मैं क्या करूं? जो आप आज्ञा करो सो करूं ॥२५८|| तदनन्तर वह देव राजा विद्युत्केशको जिन्होंने पंच नमस्कार मन्त्र दिया था उन गुरुके पास ले गया । वहाँ जाकर देव तथा राजा विद्युत्केश दोनोंने प्रदक्षिणा देकर गुरुके चरणोंमें नमस्कार दिया ॥२५९॥ महोदधिकुमार देवने मुनिराजको यह कहकर बार-बार स्तुति की कि मैं यद्यपि वानर था तो भी समस्त प्राणियोंसे स्नेह रखनेवाले आप ऐसे गुरुको पाकर मैंने यह देव पर्याय प्राप्त की है। यह कहकर उसने महामालाओं से मुनिराज की पूजा की तथा चरणोंमें नमस्कार किया॥२६०-२६१।। यह आश्चर्य देखकर विद्याधर विद्युत्केशने मुनिराजसे पूछा कि हे देव ! मैं क्या करूँ? मेरा क्या कर्तव्य है ? इसके उत्तरमें मुनिराजने निम्नांकित हितकारी वचन कहे कि चार ज्ञानके धारी हमारे गुरु पास ही विद्यमान हैं सो हम लोग उन्हींके समीप चलें, यही सनातन धर्म है ॥२६२-२६३।। आचार्यके समीप रहने पर भी जो उनके पास नहीं जाता है और स्वयं उपदेशादि देकर आचार्यका काम करता है वह मूर्ख शिष्य, शिष्यपनाको दूरसे ही छोड़ देता है । वह न तो शिष्य रहता है और न आचार्य ही कहलता है, वह धर्मरहित है, कुमार्गगामी है, अपने समस्त आचारसे भ्रष्ट है और साधुजनोंके द्वारा निन्दनीय है ।।२६४-२६५।। मुनिराजके ऐसा कहनेपर देव और विद्याघर दोनों ही परम आश्चर्यको प्राप्त हुए। अपने-अपने परिवारके साथ उन्होंने मनमें १. अपराधः म., ख. । २. महोदधिः सुरो-म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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