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________________ षष्ठं पर्व १११ आधिपत्यं समस्तानां प्राप्य विद्याभृतामसौ। निश्चला बुभुजे लक्ष्मी निगडैरिव संयुताम् ॥१९७॥ ततस्तस्य सुतो जातः कपिकेतुरभिख्यया । श्रीप्रभा कामिनी यस्य बभूव गुणधारिणी ॥१९८॥ ततो विक्रमसंपलं स तं वीक्ष्य शरीरजम् । राज्यलक्ष्म्यां समायोज्य निरगाद् गृहबन्धनात् ॥१९९॥ दत्त्वा प्रतिबलाख्याय लक्ष्मीं सोऽपि विनिर्ययो । प्रायशो विषवल्लीव दृष्टा पूर्व पद्युतिः ॥२०॥ पूर्वोपार्जितपुण्यानां पुरुषाणां प्रयत्नतः । संजातासु न लक्ष्मीषु भावः संजायते महान् ॥२०॥ यथैव ताः समुत्पन्नास्तेषामल्पप्रयत्नतः । तथैव त्यजतामेषां पीडा तासु न जायते ॥२०२॥ तथा कथंचिदासाथ सन्तो विषयजं सुखम् । तेषु निर्वेदमागत्य वाञ्छन्ति परमं पदम् ॥२०३॥ यन्नोपकरणः साध्यमात्मायत्तं निरन्तरम् । महदन्तेव निर्मुक्तं सुखं तत् को न वाञ्छति ॥२०४॥ सुतः प्रतिबलस्यापि गगनानन्दसंज्ञितः । तस्यापि खेचरानन्दस्तस्यापि गिरिनन्दनः ॥२०५।। एवं वानरकेतूनां वंशे संख्या विवर्जिताः । आत्मीयः कर्ममिः प्राप्ताः स्वर्ग मोक्षं च मानवाः ॥२०६।। वंशानुसरणच्छाया मात्रमेतत्प्रकीय॑ते । नामान्येषां समस्तानां शक्तः कः परिकीर्तितुम् ॥२.७॥ लक्षणं यस्य यल्लोके स तेन परिकीर्त्यते । सेवकः सेवया युक्तः कर्षकः कर्षणात्तथा ॥२०॥ धानुष्को धनुषो योगाद् धार्मिको धर्मसेवनात् । क्षत्रियः क्षततस्त्राणाद् ब्राह्मणो ब्रह्मचर्यतः ॥२०९।। इक्ष्वाकवो यथा चैते नमेश्च विनमेस्तथा । कुले विद्याधरा जाता विद्याधरणयोगतः ॥२१०॥ आया ॥१९६|| इस प्रकार समस्त विद्याधरोंका आधिपत्य पाकर उसने चिरकाल तक लक्ष्मीका उपभोग किया । लक्ष्मी चंचल थी सो उसने बेड़ी डालकर ही मानो उसे निश्चल बना दिया था ॥१९७॥ तदनन्तर राजा अमरप्रभके कपिकेतु नामका पुत्र हुआ। उसके अनेक गुणोंको धरनेवाली श्रीप्रभा नामकी रानी थी ।।१९८।। पुत्रको पराक्रमी देख राजा अमरप्रभ उसे राज्यलक्ष्मी सौंपकर गृहरूपी बन्धनसे बाहर निकला ॥१९९॥ तदनन्तर कपिकेतु भी प्रतिबल नामक पुत्रके लिए राज्यलक्ष्मी देकर घरसे चला गया सो ठीक ही है क्योंकि पूर्व पुरुष राज्यलक्ष्मीको प्रायः विषकी वेलके समान देखते थे ।।२००।। जिन्होंने पूर्व पर्यायमें पुण्य उपार्जित किया है ऐसे पुरुषोंका प्रयत्नोपार्जित लक्ष्मीमें बड़ा अनुराग नहीं होता ॥२०१॥ पुण्यात्मा मनुष्योंको चूंकि लक्ष्मी थोड़े ही प्रयत्नसे अनायास ही प्राप्त हो जाती है इसलिए उसका त्याग करते हुए उन्हें पीड़ा नहीं होती ॥२०२।। सत्पुरुष, विषय सम्बन्धी सुखको किसी तरह प्राप्त करते भी हैं तो उससे शीघ्र ही विरक्त हो परम पद-मोक्षकी इच्छा करने लगते हैं ॥२०३॥ जो सुख उपकरणोंके द्वारा साध्यं न होकर आत्माके आधीन है, अन्तररहित है, महान् है तथा अन्तसे रहित है उस सुखकी भला कौन नहीं इच्छा करेगा ॥२०४।। प्रतिबलके गगनानन्द नामका पुत्र हुआ, गगनानन्दके खेचरानन्द और खेचरानन्दके गिरिनन्दन पुत्र हुआ ।।२०५।। इस प्रकार ध्वजामें वानरोंका चिह्न धारण करनेवाले वानरवंशियोंके वंशमें संख्यातीत राजा हुए सो उनमें अपने-अपने कर्मानुसार कितने ही स्वर्गको प्राप्त हुए और कितने ही मोक्ष गये ।।२०६।। गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि राजन् ! यह तो वंशमें उत्पन्न हए परुषोंका छाया मात्रका निरूपण है। इन सब पुरुषोंका नामोल्लेख करनेके लिए कोन समथं है ? ॥२०७।। लोकमें जिसका जो लक्षण होता है उसका उसी लक्षणसे उल्लेख होता है । जैसे सेवा करनेवाला सेवक, खेती करनेवाला किसान, धनुष धारण करनेवाला धानुष्क, धर्म सेवन करनेवाला धार्मिक, दुःखी जीवोंकी रक्षा करनेवाला क्षत्रिय और ब्रह्मचर्य धारण करनेवाला ब्राह्मण कहा जाता है। जिस प्रकार इक्ष्वाकु वंशमें उत्पन्न हुए पुरुष इक्ष्वाकु कहलाते हैं और नमि-विनमिके वंशमें उत्पन्न हुए पुरुष विद्या धारण करनेके कारण विद्याधर १. यत्नोप -म.। २. महदं तेन म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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