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________________ ११० पद्मपुराणे ततः प्रभृति ये जाताः कुले तस्य महाद्युतेः । तस्य भक्त्या रतिं तेऽपि चक्रुरेभिर्नरोत्तमाः ॥१८३॥ युष्माकं पूर्वजैर्यस्मादमी मङ्गलवस्तुषु । प्रकल्पिताः ततस्तेऽपि मङ्गले संनिधापिताः ॥१८॥ मङ्गलं यस्य यत्पूर्व पुरुषैः सेवित कुले । प्रत्यवायेन संबन्धे निरासे तस्य जायते ॥१८५॥ क्रियमाणं तु तद्भक्त्या करोति शुभसंपदम् । तस्मादासेव्यतामेतद्भवतापि सुचेतसा ॥१८॥ इत्युक्ते मन्त्रिभिः सान्त्वं प्रत्युवाचामरप्रेमः । त्यजन् क्षणेन कोपोत्थविकारं वदनार्पितम् ॥१८७॥ मङ्गल सेविताः पूर्वैर्यथस्माकममी ततः । किमित्यालिखिता भूमौ यस्यां पादादिसंगमः ॥१८॥ नमस्कृत्य वहाम्येतान् शिरसा गुरुगौरवात् । रत्नादिघटितान् कृत्वा लक्षणान्मौलिकोटिषु ॥१८९॥ ध्वजेषु गृहशृङ्गेषु तोरणानां च मूर्द्धसु । शिरस्सु चातपत्राणामेतानाशु प्रयच्छत ॥१९॥ ततस्तैस्तत्प्रतिज्ञाय तथा सर्वमनुष्ठितम् । यथा दिगीक्ष्यते या या तत्र तत्र प्लवङ्गमाः ॥१९॥ अर्थतस्य समं देश्या भुभानस्य परं सुखम् । विजयाईजिगीषायामकरोन्मानसं प्रतस्थे च ततो युक्तः सेनया चतुरङ्गया । कपिध्वजः कपिच्छत्रः कपिमौलिः कपिस्तुतः ॥१९३॥ श्रेणिद्वयं विजित्यासौ रणे सत्त्वविमर्दिनि । आस्थापय_शे राजा जग्राह न धनं तयोः ॥१९॥ अभिमानेन तुङ्गानां पुरुषाणामिदं व्रतम् । नमयन्त्येव यच्छ→ द्रविणे' विगताशयाः ॥१९५॥ ततोऽसौ पुनरागच्छत् पुरं किष्कु प्रकीर्तितम् । विजयाचप्रधानेन जनेनानुगतायनः ॥१९॥ आदिके द्वारा सुखी किया था ॥१८२॥ तदनन्तर महाकान्तिके धारक राजा श्रीकण्ठके वंशमें जो उत्तमोत्तम राजा हुए वे भी उसकी भक्तिके कारण इन वानरोंसे प्रेम करते रहे ॥१८३।। चूंकि आपके पूर्वजोंने इन्हें मांगलिक पदार्थों में निश्चित किया था अर्थात् इन्हें मंगलस्वरूप माना था इसलिए ये सब चित्रामरूपसे इस मंगलमय कार्यमें उपस्थित किये गये हैं ॥१८४॥ जिस कुलमें जिस पदार्थकी पहलेसे पुरुषोंके द्वारा मंगलरूपमें उपासना होती आ रही है यदि उसका तिरस्कार किया जाता है तो नियमसे विघ्न-बाधाएँ उपस्थित होती हैं ॥१८५।। यदि वही कार्य भक्तिपूर्वक किया जाता है तो वह शुभ सम्पदाओंको देता है। हे राजन् । आप उत्तम हृदयके धारक हैं-विचारशील हैं अतः आप भी इन वानरोंके चित्रामकी उपासना कीजिए॥१८६॥ मन्त्रियोंके ऐसा कहनेपर राजा अमरप्रभने बड़ी सान्त्वनासे उत्तर दिया। क्रोधके कारण उसके मुखपर जो विकार आ गया था उत्तर देते समय उसने उस विकारका त्याग कर दिया था ॥१८७।। उसने कहा कि यदि हमारे पूर्वजोंने इनकी मंगलरूपसे उपासना की है तो इन्हें इस तरह पृथिवीपर क्यों चित्रित किया गया है जहाँ कि पैर आदिका संगम होता है ।।१८८॥ गुरुजनोंके गौरवसे मैं इन्हें नमस्कार कर शिरपर धारण करूंगा। रत्न आदिके द्वारा वानरोंके चिह्न बनवाकर मुकुटोंके अग्रभागमें, ध्वजाओंमें, महलोंके शिखरोंमें, तोरणोंके अग्रभागमें तथा छत्रोंके ऊपर इन्हें शीघ्र ही धारण करो। इस प्रकार मन्त्रियोंको आज्ञा दी सो उन्होंने 'तथास्तु' कहकर राजाको आज्ञानुसार सब कुछ किया। जिस दिशामें देखो उसी दिशामें वानर ही वानर दिखाई देते थे ॥१८९-१९१॥ ___अथानन्तर रानीके साथ परम सुखका उपभोग करते हुए राजा अमरप्रभके मनमें विजया पर्वतको जीतनेकी इच्छा हुई सो चतुरंग सेनाके साथ उसने प्रस्थान किया। उस समय उसकी ध्वजामें वानरोंका चिह्न था और सब वानरवंशी उसकी स्तुति कर रहे थे॥१९२-१९३।। प्राणियोंका मान मर्दन करनेवाले युद्ध में दोनों श्रेणियोंको जीतकर उसने अपने वश किया पर उनका धन नहीं ग्रहण किया ॥१९४॥ सो ठीक ही है क्योंकि अभिमानी मनुष्योंका यह व्रत है कि वे शत्रुको नम्रीभूत ही करते हैं, उसके धनकी आकांक्षा नहीं करते ॥१९५।। तदनन्तर विजयाद्ध पर्वतके प्रधान पुरुष जिसके पोछे-पीछे आ रहे थे ऐसा राजा अमरप्रभ दिग्विजय कर किष्कु नगर वापस १. स्वान्तं ख. । २. -मरप्रभुः । ३. कपिस्मृतिः क., ख.। ४. -द्वशो म. । ५. विगताशया म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org -
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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