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________________ पद्मपुराणे ततो मयि गते मोक्षमुत्पत्स्यन्ते जिनाधिपाः। द्वाविंशतिः क्रमादन्ये त्रिलोकोद्योतकारिणः ॥२०॥ ते च मत्सदृशाः सर्वे कान्तिवीर्यादिभूषिताः । त्रैलोक्यपूजनप्राप्तेनिदर्शनरूपतः ॥२०९॥ चक्राहितां श्रियं भुक्त्वा तेषां मध्ये यो जिनाः । प्राप्स्यन्ति ज्ञानसाम्राज्यमनन्तसुखकारणम् ॥२१०॥ तेषां नामानि सर्वेषां मङ्गलानि जगत्त्रये । महात्मनामहं वक्ष्ये मनःशुद्धिकराणि ते ॥२११॥ ऋषभो वृषभः पुंसामतीतः प्रथमो जिनः । वर्तमानोऽजितश्चाहं परिशेषास्तु माविनः ॥२१२॥ संभवः संभवो मुक्तर्मव्यनंन्यामिनन्दनः । सुमतिः पद्मतेजाश्च सुपाश्र्वश्चन्द्रसंनिमः ॥२१३॥ पुष्पदन्तोऽष्टकर्मान्तः शीतलः शीलसागरः । श्रेयान् श्रेयान् सुचेष्टासु वासुपूज्योऽर्चितः सताम् ॥२१४।। विमलानन्तधर्माश्च शान्तिकुन्थ्वरकीर्तिताः । मल्लिसुव्रतनामानौ नमिनेमी च विश्रुतौ ॥२१५॥ पाश्चों वीरजिनेन्द्रश्च जिनशैलीधुरंधरः । देवाधिदेवता एते जीवस्वात्म्यव्यवस्थिताः ॥२१६।। जन्मावतारः सर्वेषां रत्नवृष्टय मिनन्दितः । मेरौ जन्माभिषेकश्च सुरैः क्षीरोदवारिणा ॥२१७॥ उपमानविविर्मक्तं तेजोरूपं सखं बलम् । सर्वे जन्मरिपोर्लोके विध्वंसनविधायिनः ॥२१८॥ अस्तं याते महावीरजिनतिग्मांशुमालिनि । लोके पाखण्डखद्योतास्तेजः प्राप्स्यन्ति भूरयः ।।२१९॥ चतुर्गतिकसंसारकूपे ते पतिताः स्वयम् । पातयिष्यन्ति मोहान्धानन्यानप्यसुधारिणः ॥२२०॥ एकस्त्वत्सदृशोऽतीतश्चक्रचिह्नः श्रियः पतिः । मवानेको महावीर्यो जनिष्यन्ति दशापरे ॥२२१॥ संसारके प्राणी उत्कृष्ट बन्धुस्वरूप समीचीन धर्मको पुनः प्राप्त कर मोक्षमार्गको प्राप्त होते हैं और मोक्ष स्थानकी ओर गमन करने लगते हैं अर्थात् विच्छिन्न मोक्षमागं फिरसे चालू हो जाता है ।।२०७।। तदनन्तर जब मैं मोक्ष चला जाऊंगा तब क्रमसे तीनों लोकोंका उद्योत करनेवाले बाईस तीर्थंकर और उत्पन्न होंगे ।।२०८।। वे सभी तीर्थकर मेरे ही समान कान्ति, वीर्य आदिसे विभूषित होंगे, मेरे ही समान तीन लोकके जीवोंसे पूजाको प्राप्त होंगे और मेरे ही समान ज्ञानदर्शनके धारक होंगे ॥२०९|| उन तीर्थंकरोंमें तीन तीर्थकर (शान्ति, कुन्थ, अर ) चक्रवर्तीकी लक्ष्मीका उपभोग कर अनन्त सुखका कारण ज्ञानका साम्राज्य प्राप्त करेंगे ॥२१०॥ अब मैं उन सभी महापुरुषोंके नाम कहता है। उनके ये नाम तीनों जगत्में मंगलस्वरूप हैं तथा हे राजन् सगर ! तेरे मनकी शुद्धता करनेवाले हैं ॥२११॥ पुरुषोंमें श्रेष्ठ ऋषभनाथ प्रथम तीर्थंकर थे जो हो चुके हैं, मैं अजितनाथ वर्तमान तीर्थंकर हूँ और बाकी बाईस तीर्थंकर भविष्यत् तीर्थंकर हैं ॥२१२।। मुक्तिके कारण सम्भवनाथ, भव्य जीवोंको आनन्दित करनेवाले अभिनन्दननाथ, सुमतिनाथ, पद्मप्रभ, सुपार्श्वनाथ, चन्द्रप्रभ, अष्टकर्मोको नष्ट करनेवाले पुष्पदन्त, शीलके सागरस्वरूप शीतलनाथ, उत्तम चेष्टाओंके द्वारा कल्याण करनेवाले श्रेयोनाथ. सत्परुषोंके द्वारा पजित वासपज्य. विमलना अनन्तनाथ, धर्मनाथ, शान्तिनाथ, कुन्थुनाथ, अरनाथ, मल्लिनाथ, सुव्रतनाथ, नमिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ और जिनमार्गके धुरन्धर वीरनाथ। ये इस अवसर्पिणी युगके चौबीस तीर्थंकर हैं। ये सभी देवाधिदेव और जीवोंका कल्याण करनेवाले होंगे ॥२१३-२१६।। इन सभीका जन्मावतरण रत्नोंकी वर्षासे अभिनन्दित होगा तथा देव लोग क्षीरसागरके जलसे सुमेरु पर्वतपर सबका जन्माभिषेक करेंगे ॥२१७।। इन सभीका तेज, रूप, सुख और बल उपमासे रहित होगा और सभी इस संसारमें जन्मरूपी शत्रुका विध्वंस करनेवाले होंगे अर्थात् मोक्षगामी होंगे ॥२१८॥ जब भगवान् महावीररूपी सूर्य अस्त हो जायेगा तब इस संसारमें बहुत-से पाखण्डरूपी जुगनू तेजको प्राप्त करेंगे ॥२१९|| वे पाखण्ड पूरुष इस चतूगाँतरूप संसार कपमें स्वयं गिरेंगे तथा मोहसे अन्धे अन्य प्राणियोंको भी गिरावेंगे ॥२२०।। तुम्हारे समान चक्रांकित लक्ष्मीका अधिपति एक चक्रवर्ती तो हो १. द्वाविंशति म.। २. भूतयः क., ख.। ३. ज्ञात म.। ४. भव्यानन्धभि-म, । ५. वृष्ट यभिवन्दितः क. । ६. चिह्नश्रियः म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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