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________________ पञ्चमं पर्व प्रथमो भरतोऽतीतस्सगरस्त्वं च वर्तसे । चक्रलान्छितमोगेशा भविष्यन्ति परे नृपाः ॥२२२॥ सनत्कुमारविख्यातिर्मघवा नामतोऽपरः । शान्तिकुन्थ्वरनामानः सुभूमध्वनिकीर्तितः ॥२२३॥ महापद्मः प्रसिद्धश्च हरिषेणध्वनिस्तथा । जयसेननृपश्चान्यो ब्रह्मदत्तो भविष्यति ॥२२४॥ वासुदेवा भविष्यन्ति नव साधं प्रतीश्वरैः । बलदेवाश्च तावन्तो धर्मविन्यस्तचेतसः ॥२२५॥ प्रोक्ता एतेऽवसर्पिण्यां जिनप्रभृतयस्तथा । तथैवोत्सर्पिणीकाले भरतैरावताख्ययोः ॥२२६॥ एवं कर्मवशं श्रुत्वा जीवानां भवसंकटम् । महापुरुषभूतिं च कालस्य च विवर्तनम् ॥२२७॥ अष्टकर्मविमुक्तानां सुखं चोपमयोज्झितम् । जीमूतवाहनश्चक्रे चेतसीदं विचक्षणः ॥२२८॥ कष्टं यैरेव जीवोऽयं कर्मभिः परितप्यते । तान्येवोत्सहते कतु' मोहितः कर्ममायया ॥२२९॥ आपातमात्ररम्येषु विषवद् दुःखदायिषु । विषयेषु रतिः का वा दुःखोत्पादनवृत्तिषु ॥२३०॥ कृत्वापि हि चिरं सङ्गं धने कान्तासु बन्धुषु । एकाकिनैव कर्तव्यं संसारे परिवर्तनम् ॥२३१॥ तावदेव जनः सर्वः 'प्रियत्वेनानुवर्तते । दानेन गृह्यते यावत्सारमेयशिशुर्यथा ॥२३२॥ इयता चापि कालेन को गतः सह बन्धुभिः । परलोकं कलत्रैर्वा सुहृद्भिर्बान्धवेन वा ॥२३३॥ नागभोगोपमा मोगा भीमा नरकपातिनः । तेषु कुर्यानरः सङ्ग को वा यः स्यात्सचेतनः ॥२३४॥ अहो परमिदं चिः सद्भावेन यदाश्रितान् । लक्ष्मीः प्रतारयत्येव दुष्टत्वं किमतः परम् ॥२३५॥ चुका है, अत्यन्त शक्तिशाली द्वितीय चक्रवर्ती तुम हो और तुम दो के सिवाय दस चक्रवर्ती और होंगे ॥२२१|| चक्रवर्तियोंमें प्रथम चक्रवर्ती भरत हो चुके हैं, द्वितीय चक्रवर्ती सगर तुम विद्यमान ही हो और तुम दोके सिवाय चक्रचिह्नित भोगोंके स्वामी निम्नांकित दस चक्रवर्ती राजा और भी होंगे ॥२२२।। ३ सनत्कुमार, ४ मघवा, ५ शान्ति, ६ कुन्थु, ७ अर, ८ सुभूम, ९ महापद्म, १० हरिषेण, ११ जयसेन और १२ ब्रह्मदत्त ॥२२३।। नौ प्रतिनारायणोंके साथ नौ नारायण होंगे और धर्ममें जिनका चित्त लग रहा है ऐसे बलभद भी नौ होंगे ॥२२४-२२५॥ हे राजन! जिस प्रकार हमने अवसर्पिणी कालमें होनेवाले तीर्थंकर, चक्रवर्ती आदिका वर्णन किया है उसी प्रकारके तीर्थंकर आदि उत्सर्पिणी कालमें भी भरत तथा ऐरावत क्षेत्रमें होंगे ॥२२६।। इस प्रकार कर्मोंके वश होनेवाला जीवोंका संसारभ्रमण, महापुरुषोंकी उत्पत्ति, कालचक्रका परिवर्तन और आठ कर्मोसे रहित जीवोंको होनेवाला अनुपम सुख इन सबका विचारकर बुद्धिमान् मेघवाहनने अपने मनमें निम्न विचार किया ।।२२७-२२८॥ हाय हाय, बड़े दुःखकी बात है कि जिन कर्मोके द्वारा यह जीव आतापको प्राप्त होता है कमरूपी मदिरासे उन्मत्त हुआ यह उन्हीं कर्मोको करनेके लिए उत्साहित होता है ॥२२९॥ जो प्रारम्भमें ही मनोहर दिखते हैं और अन्तमें विषके समान दुःख देते हैं अथवा दुःख उत्पन्न करना ही जिनका स्वभाव है। ऐसे विषयोंमें क्या प्रेम करना है ? ॥२३०॥ यह जीव धन, स्त्रियों तथा भाई-बन्धुओंका चिरकाल तक संग करता है तो भी संसारमें इसे अकेले ही भ्रमण करना पड़ता है ।।२३१।। जिस प्रकार कुत्ताके पिल्लेको जबतक रोटीका टुकड़ा देते रहते हैं तभी तक वह प्रेम करता हुआ पीछे लगा रहता है इसी प्रकार इन संसारके सभी प्राणियोंको जब तक कुछ मिलता रहता है तभी तक ये प्रेमी बनकर अपने पीछे लगे रहते हैं ॥२३२।। इतना भारी काल बीत गया पर इसमें कौन मनुष्य ऐसा है जो भाई-बन्धुओं, स्त्रियों, मित्रों तथा अन्य इष्ट जनोंके साथ परलोकको गया हो ॥२३३।। ये पंचेन्द्रियोंके भोग साँपके शरीरके समान भयंकर एवं नरकमें गिरानेवाले हैं। ऐसा कौन सचेतन-विचारक पुरुष है जो कि इन विषयोंमें आसक्ति करता हो ? ॥२३४॥ अहो, सबसे बड़ा आश्चर्य तो इस बातका है कि जो मनुष्य लक्ष्मीका १. वर्तते म. । २. प्रियत्वे मानुवर्तते क. । ३. पदाश्रितान् म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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