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________________ पपुराणे अथ किन्नरगीताख्ये पुरे रतिमयूखतः । अनुमत्यां समुत्पन्ना 'सुप्रमा नाम कन्यकाम् ॥१७९॥ चक्षुर्मानसयोश्चौरी वसतिं पुष्पधन्वनः । कौमुदी श्रीकुमुद्वत्या लावण्यजलदीर्घिकाम् ॥१८॥ संपदा परयोवाह भूषणानां विभूषणीम् । हृषीकाणामशेषाणां प्रमोदस्य विधायिकाम् ॥१८१॥(विशेषकम्) ततः खेचरलोकेन मस्तकोपात्तशासनः । पुरन्दर इव स्वर्गे तत्रासाववसच्चिरम् ॥१८२॥ अथ तस्याभवत् पुत्रः पुत्रजन्मामिकाक्षिणः । महारक्ष इति ख्याति यो गतः कौलदेवतीम् ॥१८३॥ वन्दनायान्यदा यातोऽजितं तोयदवाहनः । वन्दित्वा च निजस्थाने स्थितो विनयसंनतः ॥१८४॥ तावदन्यकथाच्छेदे प्रणम्य सगरोऽजितम् । पृच्छतीदं शिरः कृत्वा पाणिपङ्कजदन्तुरम् ॥१८५॥ भगवन्नवसर्पिण्यां भवद्विधजिनेश्वराः । स्वामिनो धर्मचक्रस्य भविष्यन्त्यपरे कति ॥१८६॥ कति वा समतिक्रान्ता जगत्त्रयसुखप्रदोः । मवद्विधनरोत्पत्तिराश्चर्य भुवनत्रये ॥१८॥ कति वा रत्नचक्राङ्कलक्ष्मीमाजः प्रकीर्तिताः । हलिनो वासुदेवाश्च कियन्तस्तद्विषस्तथा ॥१८॥ एवं पृष्टो जिनो वाक्यमुवाच सुरदुन्दुभेः । तिरस्कुर्वन्महाध्वानं जनितश्रवणोत्सवम् ॥१८९॥ भाषाऽर्द्धमागधी तस्य भाषमाणस्य नाधरौ । चकार स्पन्दसंयुक्तावहो चित्रमिदं परम् ॥१९॥ उत्सर्पिण्यवसर्पिण्योधर्मतीर्थप्रवर्तिनः । चतुर्विंशतिसंख्यानाः प्रत्येकं सगरोदिताः ॥१९॥ मोहान्धध्वान्तसंछन्नं कृत्स्नमासीदिदं जगत् । धर्मसंचेतनामुक्तं निष्पाखण्डमराजकम् ॥१९२॥ वापिका अथानन्तर-किन्नरगीत नामा नगरमें राजा रतिमयूख और अनुमति नामक रानीके सुप्रभा नामक कन्या थी। वह कन्या नेत्र और मनको चुरानेवाली थी, कामकी वसतिका थी, लक्ष्मीरूपी कुमुदिनीको विकसित करनेके लिए चाँदनीके समान थी, लावण्यरूपी जलकी का थी. आभषणोंकी आभषण थी. और समस्त इन्टियोंको हर्ष उत्पन्न करनेवाली थी। राजा मेघवाहनने बड़े वैभवसे उसके साथ विवाह किया ॥१७९-१८१ ॥ तदनन्तर समस्त विद्याधर लोग जिसकी आज्ञाको सिरपर धारण करते थे ऐसा मेघवाहन लंकापुरीमें चिर काल तक इस प्रकार रहता रहा जिस प्रकार कि इन्द्र स्वर्गमें रहता है ॥ १८२ ॥ कुछ समय बाद पुत्रजन्मकी इच्छा करनेवाले राजा मेघवाहनके पुत्र उत्पन्न हुआ। वह पुत्र कुल-परम्पराके अनुसार महारक्ष इस नामको प्राप्त हुआ ॥ १८३ ।। किसी एक दिन राजा मेघवाहन वन्दनाके लिए अजितनाथ भगवान्के समवसरणमें गया। वहाँ वन्दना कर बड़ी विनवसे अपने योग्य स्थानपर बैठ गया ॥१८४॥ वहाँ जब चलती हुई अन्य कथा पूर्ण हो चुकी तब सगर चक्रवर्तीने हाथ मस्तकसे लगा नमस्कार कर अजितनाथ जिनेन्द्रसे पूछा ॥१८५॥ कि हे भगवन् ! इस अवसर्पिणी कालमें आगे चलकर आपके समान धर्मचक्रके स्वामी अन्य कितने तीर्थंकर होंगे? ॥ १८६ ॥ और तीनों जगत्के जीवोको सुख देनेवाले कितने तीर्थंकर पहले हो चुके हैं ? यथार्थमें आप जैसे मनुष्योंको उत्पत्ति तीनों लोकोंमें आश्चर्य उत्पन्न करनेवाली है ॥१८७।। चौदह रत्न और सुदर्शन चक्रसे चिह्नित लक्ष्मीके धारक चक्रवर्ती कितने होंगे? इसी तरह बलभद्र, नारायण और प्रतिनारायण भी कितने होंगे ॥ १८८ ॥ इस प्रकार सगर चक्रवर्तीके पूछनेपर भगवान् अजितनाथ निम्नांकित वचन बोले । उसके वे वचन देव-दुन्दुभिके गम्भीर शब्दका तिरस्कार कर रहे थे तथा कानोंके लिए परम आनन्द उत्पन्न करनेवाले थे ॥१८९।। भगवान्को भाषा अर्धमागधी भाषा थी और बोलते समय उनके ओठोंको चंचल नहीं कर रही थी। यह बड़े आश्चर्य की बात थी॥१९०॥ उन्होंने कहा कि हे सगर! प्रत्येक उत्सर्पिणी और अवसर्पिणीमें धर्मतीर्थकी प्रवृत्ति करनेवाले चौबीस-चौबीस तीर्थंकर होते हैं ॥१९१॥ जिस समय यह समस्त संसार मोहरूपी गाढ़ अन्धकारसे व्याप्त था, धर्मकी चेतनासे शून्य था, समस्त पाखण्डोंका घर और राजासे रहित था उस समय १. सुप्रभा नाम म. । ३. प्रदा म.। ३. चक्राका लक्ष्मी -म.। ४. संख्याकाः ख. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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