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________________ पञ्चमं पर्व इत्युक्तो राक्षसेशाभ्यां प्राप पूर्णघनात्मजः । प्रमोदं परमं देवं प्रणनाम च सोऽजितम् ॥१६६॥ लब्ध्वा च राक्षसी विद्यामारुह्यप्सितगत्वरम् । विमानं कामगं नाम प्रस्थितस्तां पुरीमसौ ॥१६७॥ ज्ञात्वा लब्धवरं चैतं रक्षोभ्यां सर्वबान्धवाः । याता विकासमम्भोजसंघा इव दिवानने ॥१६८॥ विमलामलकान्ताद्या विद्यामाजस्तमृद्धिभिः। सुप्रीताः शीघ्रमायाता नन्दयन्तः सुभाषितेः ॥१६९॥ वेष्टितोऽसौ ततस्तुष्टैः पार्श्वतः पृष्टतोऽग्रतः । कैश्चिद् द्विरदपृष्ठस्थैः कैश्चित्तुरगयायिभिः ॥१७॥ जयशब्दकृतारावैः प्राप्तदुन्दुमिनिस्वनैः । श्वेतच्छत्रकृतच्छायैर्ध्वजमालाविभूषितैः ॥१७१॥ विद्याधराणां संघातैः कृताशीर्न मनक्रियः । गच्छन्नभस्तलेऽपश्यल्लवणार्णवमाकुलम् ॥१७२॥ आकाशमिव विस्तीर्ण पातालमिव निस्तलम् । तमालवनसंकाशमूर्मिमालासमाकुलम् ॥१७३॥ अयं जलगतः शैलो ग्राहोऽयं प्रकटो महान् । चलितोऽयं महामीनः समीपैरिति भाषितः ॥१७॥ त्रिकूटशिखराधस्तान्महाप्राकारगोपुराम् । सन्ध्यामिव "विलिम्पन्ती छाययारुणया नमः ॥१७५॥ कुन्दशुभैः समुत्तङ्वैजयन्त्युपशोभितैः । मण्डितां चैत्यसंघातैः सप्राकारैः सतोरणैः ॥१७६॥ प्रविष्टो नगरी लङ्कां प्रविश्य च जिनालयम् । वन्दित्वा स्वोचितागारमध्युवास समङ्गलम् ॥१७७॥ इतरेऽपि यथा सद्म निविष्टास्तस्य बान्धवाः । रत्नशोभासमाकृष्टमनोनयनपतयः ॥१७८॥ और सुभीमने पूर्णघनके पुत्र मेघवाहनसे कहा जिसे सुनकर वह परम हर्षको प्राप्त हुआ। वह अजितनाथ भगवान्को नमस्कार कर उठा ॥१६६।। राक्षसोंके इन्द्र भीमने उसे राक्षसी विद्या दी। उसे लेकर इच्छानुसार चलनेवाले कामग नामक विमानपर आरूढ़ हो वह लंकापुरीकी ओर चला ॥ १६७ ।। 'राक्षसोंके इन्द्रने इसे वरदानस्वरूप लंका नगरी दी है' यह जानकर मेघवाहनके समस्त भाई बान्धव इस प्रकार हर्षको प्राप्त हुए जिस प्रकार कि प्रातःकालके समय कमलोंके समूह विकास भावको प्राप्त होते हैं ।। १६८ ॥ विमल, अमल, कान्त आदि अनेक विद्याधर परम प्रसन्न वैभवके साथ शीघ्र ही उसके समीप आये और अनेक प्रकारके मीठे-मीठे शब्दोंसे उसका अभिनन्दन करने लगे ॥१६९॥ सन्तोषसे भरे भाई-बन्धुओंसे वेष्टित होकर मेघवाहनने लंकाकी ओर प्रस्थान किया। उस समय कितने ही विद्याधर उसकी बगलमें चल रहे थे कितने ही पीछे चल रहे थे, कितने ही आगे जा रहे थे, कितने ही हाथियोंकी पीठपर सवार होकर चल रहे थे, कितने ही घोड़ोंपर आरूढ़ होकर चल रहे थे, कितने ही जय-जय शब्द कर रहे थे, कितने ही दुन्दुभियोंका मधुर शब्द कर रहे थे, कितने ही लोगोंपर सफेद छत्रोंसे छाया हो रही थी तथा कितने ही ध्वजाओं और मालाओंसे सुशोभित थे। पूर्वोक्त विद्याधरोंमें कोई तो मेघवाहनको आशीर्वाद दे रहे थे और कोई नमस्कार कर रहे थे। उन सबके साथ आकाशमें चलते हुए मेघवाहनने लवणसमुद्र देखा ॥ १७०-१७२ ॥ वह लवणसमुद्र आकाशके समान विस्तृत था, पातालके समान गहरा था, तमालवनके समान श्याम था और लहरोंके समूहसे व्याप्त था ॥ १७३ ॥ मेघवाहनके समीप चलनेवाले लोग कह रहे थे कि देखो यह जलके बीच पर्वत दीख रहा है, यह बड़ा भारी मकर छलांग भर रहा है और इधर यह बहदाकार मच्छ चल रहा है॥ १७४ ॥ इस प्रकार समुद्रको शोभा देखते हुए मेघवाहनने त्रिकूटाचलके शिखरके नीचे स्थित लंकापुरीमें प्रवेश किया। वह लंका बहुत भारी प्राकार और गोपुरोंसे सुशोभित थी, अपनी लाल-कान्तिके द्वारा सन्ध्याके समान आकाशको लिप्त कर रही थी, कुन्दके समान सफेद, ऊँचे पताकाओंसे सुशोभित, कोट और तोरणोंसे युक्त जिनमन्दिरोंसे मण्डित थी। लंकानगरीमें प्रविष्ट हो सर्वप्रथम उसने जिनमन्दिरमें जाकर जिनेन्द्रदेवकी वन्दना की और तदनन्तर मंगलोपकरणोंसे युक्त अपने योग्य महलमें निवास किया ।। १७५-१७७ ॥ रत्नोंकी शोभासे जिनके नेत्र और नेत्रोंके पंक्तियाँ आकर्षित हो रही थीं ऐसे अन्य भाई-बन्धु भी यथायोग्य महलोंमें ठहर गये ॥१७८॥ १. कान्त्याद्या म.। २. निध्वनैः क.। ३. -ऽपश्यंल्लव-म.। ४. विलपन्ती (?) म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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