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________________ पद्मपुराणे तेनामिज्ञानदानेन दास्या गत्वा तदालयम् । उपनीतानि रत्नानि वैणिजे दुःखवर्तिने ॥४॥ ततो गृहीतसर्वस्वः खलीकृत्य द्विजाधमः । पुरो निर्वासितो दीनस्तपः परममाचरत् ॥४२॥ मृत्वा कल्पं स माहेन्द्र प्राप्तस्तस्मात्परिच्युतः । खेचराणामधीशोऽयमद्विादृढध्वनिः ।।३।। श्रीवर्द्धनस्तपः कृत्वा मृत्वा कल्पमुपागतः । संजयन्तश्रुतिर्जातो 'विदेहेऽहं ततश्च्युतः ॥४४॥ तेन दोषानुबन्धेन दृष्ट्वा मां क्रोधमूर्च्छितः । उपसर्ग व्यधादेष कर्मणां वशतां गतः ॥४५॥ योऽसौ नियमदत्तोऽभूत् स कृत्वा तपसोऽर्जनम् । राजा नागकुमाराणां जातस्त्वं शुभमानसः ॥४६।। अथ विद्यु दृढस्याभन्नाम्ना दृढरथः सुतः । तत्र राज्यं स निक्षिप्य तपः कृत्वा गतो दिवम् ॥४७॥ अश्वधर्माऽभवत्तस्मादश्वायुरभवत्ततः । अश्वध्वजस्ततो जातस्ततो पद्मनिभोऽभवत् ॥४८॥ पद्ममाली ततो भूतोऽभवत् पारथस्ततः । सिंहयानो मृगोद्धर्मा मेघास्त्रः सिंहसप्रभुः ।।१९।। सिंहकेतुः शशाङ्कास्यश्चन्द्राह्वश्चन्द्रशेखरः । इन्द्रचन्द्ररथाभिख्यौ चक्रधर्मा तदायुधः ॥५०॥ चक्रध्वजो मणिग्रीवो मण्यको मणिभासुरः । मणिस्यन्दनमण्यास्यौ बिम्बोष्ठो लम्बिताधरः ॥५१॥ रक्तोष्ठो हरिचन्द्रश्च पूश्चन्द्रः पूर्णचन्द्रमाः। बालेन्दुश्चन्द्रमश्चूडो व्योमेन्दुरुडुपालनः ॥५२॥ एकचूडो द्विचूडश्च त्रिचूडश्च ततोऽभवत् । वज्रचूडस्ततस्तस्माद्भरिचूडार्कचूडकौ ॥५३॥ तस्माद्वह्निजटी जातो वह्नितेजास्ततोऽभवत् । बहवश्चैवमन्येऽपि कालेन क्षयमागताः ॥५४॥ नियमदत्त नामक वणिक्का धन छिपा लिया तब रानीने उसके साथ जुआ खेलकर उसकी अंगूठी जीत ली ॥४०॥ रानीकी दासी अंगठी लेकर पूरोहितके घर गयी और वहाँ उसकी स्त्रीको दिखाकर उससे रत्न ले आयो। रानीने वे रत्न नियमदत्त वणिक्को जो कि अत्यन्त दुःखी था वापस दे दिये । तदनन्तर मैंने उस दुष्ट ब्राह्मणका सब धन छीन लिया तथा उसे तिरस्कृत कर नगरसे बाहर निकाल दिया। उस दीन-हीन ब्राह्मणको सुबुद्धि उत्पन्न हुई जिससे उसने उत्कृष्ट तपश्चरण किया ॥४१-४२।। अन्तमें मरकर वह माहेन्द्र स्वर्गमें देव हुआ और वहाँसे च्युत होकर यह विद्युदृढ़ नामक विद्याधरोंका राजा हुआ है ।।४३।। मेरा जीव श्रीवर्द्धन भी तपश्चरण कर मरा और स्वर्गमें देव हुआ। वहाँसे च्युत होकर मैं विदेह क्षेत्रमें संजयन्त हुआ हूं ॥४४॥ उस पूर्वोक्त दोषके संस्कारसे हो यह विद्याधर मुझे देखकर क्रोधसे एकदम मच्छित हो गया और कर्मोंके वशीभूत होकर उसी संस्कारसे इसने यह उपसगं किया है ॥४५।। और जो वह नियमदत्त नामक वणिक् था वह तपश्चरण कर उसके फलस्वरूप उज्ज्वल हृदयका धारी तू नागकुमारोंका राजा धरणेन्द्र हुआ है ॥४६॥ अथानन्तर-विद्युदृढ़के दृढ रथ नामक पुत्र हुआ सो विद्युदृढ़ उसके लिए राज्य सौंपकर तथा तपश्चरण कर स्वगं गया ॥४७।। इधर दृढरथके अश्वधर्मा, अश्वधर्माके अश्वायु, अश्वायुके अश्वध्वज, अश्वध्वजके पद्मनिभ, पद्मनिभके पद्ममाली, पद्ममालोके पद्मरथ, पद्मरथके सिंहयान, सिंहयानके मृगोद्धर्मा, मृगोद्धक सिंहसप्रभु, सिंहसप्रभुके सिंहकेतु, सिंहकेतुके शशांकमुख, शशांकमुखके चन्द्र, चन्द्रके चन्द्रशेखर, चन्द्रशेखरके इन्द्र, इन्द्रके चन्द्ररथ, चन्द्ररथके चक्रधर्मा, चक्रधर्माके चक्रायुध, चक्रायुधके चक्रध्वज, चक्रध्वजके मणिग्रीव, मणिग्रीवके मण्यंक, मण्यंकके मणिभासुर, मणिभासुरके मणिस्यन्दन, मणिस्यन्दनके मण्यास्य, मण्यास्यके बिम्बोष्ठ, बिम्बोष्ठके लम्बिताधर, लम्बिताधरके रक्तोष्ठ, रक्तोष्ठके हरिचन्द्र, हरिचन्द्रके पूश्चन्द्र, पूश्चन्द्रके पूर्णचन्द्र, पूर्णचन्द्रके बालेन्दु, बालेन्दुके चन्द्रचूड, चन्द्रचूडके व्योमेन्दु, व्योमेन्दुके उडुपालन, उडुपालनके एकचूड, एकचूडके द्विचूड, द्विचूडके त्रिचूड, त्रिचूडके वनचूड, वज्रचूडके भूरिचूड, भूरिचूडके अर्कचूड, अकंचूडके वह्निजटी, वह्निजटोके वह्नितेज नामका पुत्र हुआ। इसी प्रकार और भी बहुत-से १. वाणिजे म., क. । २. -माचरन् म. । ३. जाता म., ख. । ४. पद्मनभो म. । ५. मृगद्वर्मा म.। मृगाधर्मान् ख. । ६. लविताधरः म., ख. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org,
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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