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________________ पञ्चमं पर्व तस्य लोष्टुमिरन्यैश्च हन्यमानस्य योगिनः । बभूव समचित्तस्य संक्लेशो न मनागपि ॥२८॥ ततोऽस्य सहमानस्य संजयन्तस्य दुःसहम् । उपसर्ग समुत्पन्नं केवलं सर्वभासनम् ॥२९॥ धरणेन ततो विद्या हृता विद्युदृढस्थिताः । ततोऽसौ हृतविद्यः सन् ययावुपशमं परम् ॥३०॥ ततोऽनया पुनर्लब्धा विद्यानेन व्यवस्थया । प्रणतेनाञ्जलिं कृत्वा संजयन्तस्य पादयोः ॥३१॥ तपःक्लेशेन भवतां विद्याः सेत्स्यन्ति भूरिणा । सिद्धा अपि तथा सत्यश्छेदं यास्यन्ति दुष्कृतात् ॥३२॥ अर्हद्विम्बसनाथस्य चैत्यस्योपरि गच्छताम् । साधूनां च प्रमादेऽपि विद्या नंक्ष्यन्ति वः क्षणात् ॥३३॥ धरणेन तत: पृष्टः संजयन्तः कुतूहलात् । विद्युदृढेन भगवन् कस्मादेवं विचेष्टितम् ।।३४॥ उवाच भगवानेवं संसारेऽस्मिन् चतुर्गतौ । भ्राम्यन्नहं समुत्पन्नो ग्रामे शकटनामनि ॥३५॥ वणिग्धितकरो नाम्ना प्रियवादी दयान्वितः । स्वभावार्जवसंपन्नः साधुसेवापरायणः ॥३६॥ कालधर्म ततः कृत्वा राजा श्रीवर्द्धनाह्वयः । अभवत् कुमुदावत्यां व्यवस्थापालनोद्यतः ॥३७।। ग्रामे तत्रैव विप्रोऽभत् स कृत्वा कुत्सितं तपः । कुदेवोऽत्र ततश्च्युत्या राज्ञः श्रीवर्द्धनस्य तु ॥३८॥ ख्यातो वह्निशिखो नाम्ना सत्यवादीति विश्रुतः । अभूत् पुरोहितो रौद्रो गुप्ताकार्यकरो महान् ॥३९।। वणिनियमदत्तस्य सं च द्रव्यमपात । राश्या द्यूतं ततः कृत्वा निर्जितः सोऽङ्गुलीयकम् ॥४०॥ 'इनका वध करो' इस प्रकार विद्याधरोंको प्रेरित किया ।।२७।। राजाकी प्रेरणा पाकर विद्याधरोंने उन्हें पत्थर तथा अन्य साधनोंसे मारना शुरू किया परन्तु वे तो सम चित्तके धारी थे अतः उन्हें थोड़ा भी संक्लेश उत्पन्न नहीं हुआ ॥२८॥ तदनन्तर दुःसह उपसर्गको सहन करते हुए उन संजयन्त मुनिराजको समस्त पदार्थों को प्रकाशित करनेवाला केवलज्ञान उत्पन्न हो गया ।।२९॥ उसी समय मुनिराजका पूर्व भवका भाई धरणेन्द्र आया। उसने विद्युदृढ़की सब विद्याएँ हर ली जिससे वह विद्यारहित होकर अत्यन्त शान्त भावको प्राप्त हुआ ॥३०॥ विद्याओंके अभावमें बहुत दुःखी होकर उसने हाथ जोड़कर नम्र भावसे धरणेन्द्रसे पूछा कि अब हमें किसी तरह विद्याएँ सिद्ध हो सकती हैं या नहीं ? तब धरणेन्द्रने कहा कि तुम्हें इन्हीं संजयन्त मुनिराजके चरणोंमें तपश्वरण सम्बन्धी क्लेश उठानेसे फिर भी विद्याएँ सिद्ध हो सकती हैं परन्तु खोटा कार्य करनेसे वे विद्याएँ सिद्ध होनेपर भी पुनः नष्ट हो जायेंगी। जिनप्रतिमासे युक्त मन्दिर और मुनियोंका उल्लंघन कर प्रमादवश यदि ऊपर गमन करोगे तो तुम्हारी विद्याएँ तत्काल नष्ट हो जायेंगी। धरणेन्द्रके द्वारा बतायी हुई व्यवस्थाके अनुसार विद्युदृढ़ने संजयन्त मुनिराजके पादमूलमें तपश्चरण कर फिर भी विद्या प्राप्त कर ली ।।३१-३३।। यह सब होने के बाद धरणेन्द्रने कुतूहलवश संजयन्त मुनिराजसे पूछा कि हे भगवन् ! विद्युदृढ़ने आपके प्रति ऐसी चेष्टा क्यों की है ? वह किस कारण आपको हर कर लाया और किस कारण विद्याधरोंसे उसने उपसर्ग कराया ? ॥३४॥ धरणेन्द्रका प्रश्न सुनकर भगवान् संजयन्त केवली इस प्रकार कहने लगे-इस चतुर्गतिरूप संसारमें भ्रमण करता हुआ मैं एक बार शकट नामक गाँवमें हितकर नामक वैश्य हुआ था। मैं अत्यन्त मधुरभाषी, दयालु, स्वभावसम्बन्धी सरलतासे युक्त तथा साधुओंकी सेवामें तत्पर रहता था ।।३५-३६।। तदनन्तर मैं कुमुदावती नामकी नगरीमें मर्यादाके पालन करने में उद्यत श्रीवद्धंन नामका राजा हुआ ॥३७।। उसी ग्राममें एक ब्राह्मण रहता था जो खोटा तप कर कुदेव हुआ था और वहाँसे च्युत होकर मुझ श्रीवर्द्धन राजाका वह्निशिख नामका पुरोहित हुआ था। वह पुरोहित यद्यपि सत्यवादी रूपसे प्रसिद्ध था परन्तु अत्यन्त दुष्टपरिणामी था और छिपकर खोटे कार्य करता था ||३८-३९|| उस पुरोहितने एक बार १. चैतस्योपरि म. । २. स्वं च ख., स्वयं क. । ३. राज्ञा म., क.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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