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________________ पपपुराणे ये च ते प्रथमं भग्ना नृपा नाथानुगामिनः । व्रतान्तरममी चक्रुः स्वबुद्धिपरिकल्पितम् ॥१२॥ तेषां शिष्याः प्रशिष्याश्च मोहयन्तः कुहेतुमिः । जगद् गर्वपरायत्ताः कुशास्त्राणि प्रचक्रिरे ॥१२५॥ भृगुरङ्गिशिरा वह्निः कपिलोऽत्रिर्विदस्तथा । अन्ये च बहवोऽज्ञानाजाता वल्कलतापसाः ॥१२६।। स्वियं दृष्ट्वा कुचित्तास्ते पुंलिङ्ग प्राप्तविक्रियम् । पिदधुर्मोहसंछमाः कौपीनेन नराधमाः ॥१२७॥ सूत्रकण्ठा पुरा तेन ये सृष्टाश्चक्रवर्तिना। बीजवत्प्रसृतास्तेऽत्र संतानेन महीतले ॥२८॥ प्रस्तावगतमेतत्ते कथितं द्विजकल्पनम् । इदानीं प्रकृतं वक्ष्ये राजन् शृणु समाहितः ।।१२९॥ अथासौ लोकमुत्तार्य प्रभूतं भवसागरात् । कैलासशिखरे प्राप निर्वृतिं नामिनन्दनः ॥१३०॥ ततो भरतराजोऽपि प्रव्रज्या प्रतिपन्नवान् । साम्राज्यं तृणवत् त्यक्त्वा लोकविस्मयकारणम् ॥१३१।। आर्याच्छन्दः स्थित्यधिकारोऽयं ते श्रेणिक गदितः समासतस्त्वेनम् । वंशाधिकारमधुना पुरुषरवे विद्धि सादरं वच्मि ॥१३२॥ इत्याचे रविषेणाचार्यप्रोक्त पद्मचरिते ऋषभमाहात्म्याभिधानं नाम चतुर्थ पर्व ॥४॥ त्राता अर्थात् रक्षक कहकर उनकी बहुत भारी स्तुति की थी ॥१२३॥ दीक्षाके समय भगवान् ऋषभदेवका अनुकरण करनेवाले जो राजा पहले ही च्युत हो गये थे उन्होंने अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार दूसरे-दूसरे व्रत चलाये थे ॥१२४॥ उन्हींके शिष्य-प्रशिष्योंने अहंकारसे चूर होकर खोटीखोटी युक्तियोंसे जगत्को मोहित करते हुए अनेक खोटे शास्त्रोंकी रचना की ॥१२५॥ भृगु, अंगिशिरस, वह्नि, कपिल, अत्रि तथा विद आदि अनेक साधु अज्ञानवश वल्कलोंको धारण करनेवाले तापसी हुए ॥१२६॥ स्त्रीको देखकर उनका चित्त दूषित हो जाता था और जननेन्द्रियमें विकार दिखने लगता था इसलिए उन अधम मोही जीवोंने जननेन्द्रियको लंगोटसे आच्छादित कर लिया ॥१२७|| कण्ठमें सूत्र अर्थात् यज्ञोपवीतको धारण करनेवाले जिन ब्राह्मणोंको चक्रवर्ती भरतने पहले बीजके समान थोड़ी ही रचना की थी वे अब सन्ततिरूपसे बढ़ते हुए समस्त पृथ्वी तलपर फैल गये ॥१२८।। गौतम गणधर राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! यह ब्राह्मणोंकी रचना प्रकरणवश मैंने तुझसे कही है। अब सावधान होकर प्रकृत बात कहता हूँ सो सुन ॥१२९।। भगवान् ऋषभदेव संसार-सागरसे अनेक प्राणियोंका उद्धार कर कैलास पर्वतकी शिखरसे मोक्षको प्राप्त हुए ॥१३०॥ तदनन्तर चक्रवर्ती भरत भी लोगोंको आश्चर्यमें डालनेवाले साम्राज्यको तृणके समान छोड़कर दीक्षाको प्राप्त हुए ॥१३१॥ हे श्रेणिक ! यह स्थिति नामका अधिकार मैंने संक्षेपसे तुझे कहा है, हे श्रेष्ठ पुरुष ! अब वंशाधिकारको कहता हूँ सो आदरसे श्रवण कर ॥१३२॥ इस प्रकार आर्षनामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्य प्रणीत पद्मचरितमें ऋषभदेवका माहात्म्य वर्णन करनेवाला चतुर्थ पर्व पूर्ण हुआ ॥४॥ १. नराधिपाः ख. । २. -मुत्तीर्य क. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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