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________________ चतुर्थ पर्व अलक्षयत् सरत्नेन सूत्रचिह्वेन चारुणा। चामोकरमयेनासौ प्रावेशयदथो गृहम् ॥११॥ मिथ्यादृशोऽपि तृष्णार्ताश्चिन्तया व्याकुलीकृताः । जल्पन्तो दीनवाक्यानि प्रविष्टा दुःखसागरम् ॥११॥ ततो यथेप्सितं दानं श्रावकेन्यो ददौ नृपः । पूजितानां च चिन्तेयं तेषां जाता दरात्मनाम ॥११॥ वयं केऽपि महापूता जगते हितकारिणः । पूजिता यन्नरेन्द्रण श्रद्धयाऽत्यन्ततङ्गया ॥११३॥ ततस्ते तेन गर्वेण समस्ते धरणीतले । प्रवृत्ता याचितुं लोकं दृष्ट्वा द्रव्यसमन्वितम् ॥११४॥ ततो मतिसमुद्रेण भरताय निवेदितम् । यथायेति मया जैने वचनं सदसि श्रुतम् ॥११५|| वर्द्धमानजिनस्यान्ते मविष्यन्ति कलौ युगे । एते ये भवता सृष्टाः पाखण्डिनो महोद्धताः ॥११६॥ प्राणिनो मारयिष्यन्ति धर्मबुन्या विमोहिताः। महाकषायसंयुक्ताः सदा पापक्रियोद्यताः ॥११७॥ कुग्रन्थं वेदसंशं च हिंसामाषणतत्परम् । वक्ष्यन्ति कर्तृनिर्मुक्तं मोहयन्तोऽखिलाः प्रजाः ॥११८॥ महारम्भेषु संसक्ताः प्रतिग्रहपरायणाः । करिष्यन्ति सदा निन्दां जिनभाषितशासने ।।११९।। निर्ग्रन्थमग्रतो दृष्ट्वा क्रोधं यास्यन्ति पापिनः । उपद्रवाय लोकस्य विषवृक्षाङ्कुरा इव ॥१२०॥ तच्छुत्वा भरतः क्रुद्धः तान् सर्वान् हन्तुमुद्यतः । ब्रासितास्ते ततस्तेन नाभेयं शरणं गताः ॥१२१॥ यस्मान्मा हननं पुत्र कार्षीरिति 'निवारितम् । ऋषभेण ततो याता 'माहना' इति ते श्रुतिम् ।। १२२।। रक्षितास्ते यतस्तेन जिनेन शरणागताः । वातारमिन्द्रमित्युच्चैस्ततस्तं विबुधा जगुः ।।१२३॥ समस्त सम्यग्दृष्टि पुरुषोंकी छाँट अलग कर ली तथा उन्हें जिसमें रत्न पिरोया गया था ऐसे सुवर्णमय सुन्दर सूत्रके चिह्नसे चिह्नित कर भवनके भीतर प्रविष्ट करा लिया ॥१०९-११०॥ तृष्णासे पीड़ित मिथ्यादृष्टि लोग भी चिन्तासे व्याकुल हो दोन वचन कहते हुए दुःखरूपी सागरमें प्रविष्ट हुर ॥१११॥ तदनन्तर-राजा भरतने उन श्रावकोंके लिए इच्छानुसार दान दिया। भरतके द्वारा सम्मान पाकर उनके हृदयमें दुर्भावना उत्पन्न हुई और वे इस प्रकार विचार करने लगे ॥११२॥ कि हम लोग वास्तवमें महापवित्र तथा जगत्का हित करनेवाले कोई अनुपम पुरुष हैं इसीलिए तो राजाधिराज भरतने बड़ी श्रद्धाके साथ हम लोगोंकी पूजा की है ॥११३॥ तदनन्तर वे इसी गर्वसे समस्त पृथिवीतलपर फैल गये और किसी धन-सम्पन्न व्यक्तिको देखकर याचना करने लगे ॥११४|| तत्पश्चात् किसी दिन मतिसमुद्र नामक मन्त्रीने राजाधिराज भरतसे कहा कि आज मैंने भगवान्के समवसरणमें निम्नांकित वचन सुना है ।।११५।। वहाँ कहा गया है कि भरतने जो इन ब्राह्मणोंकी रचना की है सो वे वर्द्धमान तीर्थंकरके बाद कलियुग नामक पंचम काल आनेपर पाखण्डी एवं अत्यन्त उद्धत हो जायेंगे ॥११६॥ धर्म बुद्धिसे मोहित होकर अर्थात् धर्म समझकर प्राणियोंको मारेंगे, बहुत भारी कषायसे युक्त होंगे और पाप कार्यके करने में तत्पर होंगे ॥११७॥ जो हिंसाका उपदेश देने में तत्पर रहेगा ऐसे वेद नामक खोटे शास्त्रको कर्तासे रहित अर्थात् ईश्वर प्रणीत बतलावेंगे और समस्त प्रजाको मोहित करते फिरेंगे ॥११८॥ बड़े-बड़े आरम्भोंमें लीन रहेंगे, दक्षिणा ग्रहण करेंगे और जिनशासनकी सदा निन्दा करेंगे ॥११९|| निर्ग्रन्थ मुनिको आगे देखकर क्रोधको प्राप्त होंगे और जिस प्रकार विषवृक्षके अंकुर जगत्के उपद्रव अर्थात् अपकारके लिए हैं उसी प्रकार ये पापी भी जगत्के उपद्रवके लिए होंगे-जगत्में सदा अनर्थ उत्पन्न करते रहेंगे ॥१२०।। मतिसमुद्र मन्त्रीके वचन सुनकर भरत कुपित हो उन सब विप्रोंको मारनेके लिए उद्यत हुआ। तदनन्तर वे भयभीत होकर भगवान् ऋषभदेवकी शरण में गये ।।१२१!! भगवान् ऋषभदेवने 'हे पुत्र ! इनका ( मा हननं कार्षीः ) हनन मत करो' यह शब्द कहकर इनकी रक्षा की थी इसलिए ये आगे चलकर 'माहन' इस प्रसिद्धिको प्राप्त हो गये अर्थात् 'माहन' कहलाने लगे ॥१२२।। चूंकि इन शरणागत ब्राह्मणोंकी ऋषभ जिनेन्द्रने रक्षा को थी इसलिए देवों अथवा विद्वानोंने भगवान्को १. निवारितः म.. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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