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________________ पञ्चमं पर्व जगत्यस्मिन् महावंशाश्चत्वारः प्रथिता नृप । एषां रहस्यसंयुक्ताः प्रभेदा बहुधोदिताः ||१|| इक्ष्वाकुः प्रथमस्तेषामुन्नतो लोकभूषणः । ऋषिवंशो द्वितीयस्तु शशाङ्ककरनिर्मलः ॥ २ ॥ विद्याभृतां तृतीयस्तु वंशोऽत्यन्तमनोहरः । हरिवंशो जगरख्यातश्चतुर्थः परिकीर्तितः ॥ ३ ॥ तस्यादित्ययशाः पुत्रो भरतस्योदपद्यत । ततः सितयशा जातो वलाङ्कस्तस्य चाभवत् ||४|| जज्ञे च सुबलस्तस्मात्ततश्चापि महाबलः । तस्मादतिबलो जातस्ततश्चामृतशब्दितः ||५|| सुभद्रः सागरो भद्रो रवितेजास्तथा शशी । प्रभूततेजास्तेजस्वी तपनोऽथ प्रतापवान् ॥६॥ अतिवीर्यः सुवीर्यश्च तथोदितपराक्रमः । महेन्द्रविक्रमः सूर्य इन्द्रद्युम्नो महेन्द्रजित् ||७|| प्रभुर्विभुरविध्वंसी वीतभीरृषभध्वजः । गरुडाको मृगाङ्कश्च तथान्ये पृथिवीभृतः ||८|| राज्यं सुतेषु निक्षिप्य संसारार्णव भीरवः । शरीरेष्वपि निःसंगा निर्मन्थव्रतमाश्रिताः ||९|| अयमादित्यवंशस्ते कथितः क्रमतो नृपे । उत्पत्तिः सोमवंशस्य साम्प्रतं परिकीर्त्यते ॥१०॥ ऋषभस्याभवत् पुत्रो नाम्ना बाहुबलीति यः । ततः सोमयशा नाम सौम्यः सूनुरजायत ||११|| ततो महाबलो जातस्ततोऽस्य सुबलोऽभवत् । स्मृतो भुजबली तस्यादेवमाद्या नृपाधिपाः ॥ १२ ॥ " शशिवंशे समुत्पन्नाः क्रमेण सितचेष्टिताः । श्रामण्यमनुभूयाशु संप्राप्ताः परमं पदम् ||१३|| । अथानन्तर, गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! इस संसारमें चार महावंश प्रसिद्ध हैं और इन महावंशों के अनेक अवान्तर भेद कहे गये हैं । ये सभी भेद अनेक प्रकार के रहस्योंसे युक्त हैं ॥ १ ॥ उन चार महावंशों में पहला इक्ष्वाकुवंश है जो अत्यन्त उत्कृष्ट तथा लोकका आभूषणस्वरूप है । दूसरा ऋषिवंश अथवा चन्द्रवंश है जो चन्द्रमाकी किरणोंके समान निर्मल है || २ || तीसरा विद्याधरोंका वंश है जो अत्यन्त मनोहर है और चौथा हरिवंश है जो संसारमें प्रसिद्ध कहा गया है || ३ || इक्ष्वाकुवंशमें भगवान् ऋषभदेव उत्पन्न हुए, उनके भरत हुए और उनके अकंकीर्ति महाप्रतापी पुत्र हुए। अर्क नाम सूर्यका है इसलिए इनका वंश सूर्यवंश कहलाने लगा । अर्ककीर्तिके सितयशा नामा पुत्र हुए, उनके बलांक, बलांकके सुबल, सुबलके महाबल, महाबलके अतिबल, अतिबलके अमृत, अमृतके सुभद्र, सुभद्रके सागर, सागर के भद्र, भद्रके रवितेज, रवितेजके शशी, शशीके प्रभूततेज, प्रभूततेजके तेजस्वी, तेजस्वी के प्रतापी तपन, तपनके अतिवीर्यं, अतिवीर्यंके सुवार्य, सुवीर्यक उदितपराक्रम, उदितपराक्रमके महेन्द्रविक्रम, महेन्द्रविक्रमके सूर्य, सूर्यके इन्द्रद्युम्न, इन्द्रद्युम्नके महेन्द्रजित्, महेन्द्रजित् के प्रभु, प्रभुके विभु, विभु विध्वंस, अविध्वंस के वीतभी, वीतभीके वृषभध्वज, वृषभध्वजके गरुडांक और गरुडांकके मृगांक पुत्र हुए। इस प्रकार इस वंशमें अन्य अनेक राजा हुए। ये सभी संसारसे भयभीत थे अतः पुत्रोंके लिए राज्य सौंपकर शरीर से भी निःस्पृह हो निर्ग्रन्थ व्रतको प्राप्त हुए ||४ - ९ || हे राजन् ! मैंने क्रमसे तुझे सूर्यवंशका निरूपण किया है अब सोमवंश अथवा चन्द्रवंशकी उत्पत्ति कही जाती है ॥१०॥ भगवान् ऋषभदेवकी दूसरी रानीसे बाहुबली नामका पुत्र हुआ था, उसके सोमयश नामका सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ था । सोम नाम चन्द्रमाका है सो उसी सोमयशसे सोमवंश अथवा चन्द्रवंशकी परम्परा चली है । सोमयशके महाबल, महाबलके सुबल और सुबल के भुजबल इस १. नृपः म. । २. शशिवंशसमुत्पन्नाः ख., म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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