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________________ चतुर्थ पर्व अथासौ भगवान् ध्यानी 'शातकुम्भप्रभः प्रभुः । हिताय जगते कर्तुं दानधर्मं समुद्यतः ॥ १ ॥ निःशेषदोषनिर्मुक्तो मौनमाश्रित्य नैष्ठिकम् । संहृत्य प्रतिमां धीरो बभ्राम धरणीतलम् ॥२॥ ददृशुस्तं प्रजा देवं भ्राम्यन्तं तुङ्गविग्रहम् । देहप्रभापरिच्छन्नं द्वितीयमिव मास्करम् ॥३॥ यत्र यत्र पदन्यासमकरोत् स जिनेश्वरः । तस्मिन् विकचपद्मानि भवन्तीव महीतले ॥४॥ मेरुकूटसमाकारमासुरांसः समाहितः । स रेजे भगवान् दीर्घजटाजालहृतांशुमान् ॥५॥ अन्यदा हास्तिनपुरं विहरन् स समागतः । अविशच्च दिनस्यार्थे गते मेरुरिव श्रिया ॥ ६ ॥ मध्याह्नरविसंकाशं दृष्ट्वा तं पुरुषोत्तमम् । सर्वे नराश्च नार्यश्च मुमूर्च्छरतिविस्मयात् ॥७॥ नानावर्णानि वखाणि रत्नानि विविधानि च । हस्त्यश्वरथयानानि तस्मै ढौकितवान् जनः ॥ ८ ॥ मुग्धाः पूर्णेन्दुवदनाः कन्यास्तामरसेक्षणाः । उपनिन्युर्नराः केचिद् विनीताकारधारिणः ॥९॥ तस्मै न रुचिताः सत्यः स्वस्याप्यप्रियतां गताः । कन्यास्ता निरलंकारा ध्यायन्त्यस्तं व्यवस्थिताः ॥ १० ॥ अथ प्रासादशिखरे स्थितः श्रेयान् महीपतिः । दृष्ट्वैनं स्निग्धया दृष्ट्या पूर्वजन्म समस्मरत् ॥ ११ ॥ अथानन्तर सुवर्णके समान प्रभाके धारक ध्यानी भगवान् ऋषभदेव प्रभु जगत् के कल्याणके निमित्त दान धर्मकी प्रवृत्ति करनेके लिए उद्यत हुए ||१|| धीर-वीर भगवान् ने छह माहके बाद प्रतिमा योग समाप्त कर पृथिवी तलपर भ्रमण करना प्रारम्भ किया । भगवान् समस्त दोषोंसे रहित थे और मौन धारण कर ही विहार करते थे ||२|| जिनका शरीर बहुत ही ऊँचा था तथा जो अपने शरीरकी प्रभासे आस-पासके भूमण्डलको आलोकित कर रहे थे ऐसे भ्रमण करनेवाले भगवान् के दर्शन कर प्रजा यह समझती थी मानो दूसरा सूर्य ही भ्रमण कर रहा है || ३ || वे जिनराज पृथिवीतलपर जहाँ-जहाँ चरण रखते थे वहाँ ऐसा जान पड़ता था मानो कमल ही खिल उठे हों ॥४॥ उनके कन्धे मेरुपर्वतके शिखरके समान ऊँचे तथा देदीप्यमान थे, उनपर बड़ी-बड़ी जाएँ किरणोंकी भाँति सुशोभित हो रही थीं और भगवान् स्वयं बड़ी सावधानी से -- ईर्यासमितिसे नीचे देखते हुए विहार करते थे ||५|| जो शोभासे मेरु पर्वत के समान जान पड़ते थे ऐसे भगवान् ऋषभदेव किसी दिन विहार करते-करते मध्याह्नके समय हस्तिनापुर नगर में प्रविष्ट हुए || ६ || मध्याह्न के सूर्यके समान देदीप्यमान उन पुरुषोत्तम के दर्शन कर हस्तिनापुरके समस्त स्त्री-पुरुष बड़े आश्चर्यसे मोहको प्राप्त हो गये अर्थात् किसीको यह ध्यान नहीं रहा कि यह आहारकी वेला है इसलिए भगवान्को आहार देना चाहिए ||७|| वहाँके लोग नाना वर्णोंके वस्त्र, अनेक प्रकारके रत्न और हाथी, घोड़े, रथ तथा अन्य प्रकारके वाहन ला लाकर उन्हें समर्पित करने लगे ||८|| विनीत वेषको धारण करनेवाले कितने ही लोग पूर्णचन्द्रमाके समान मुखवाली तथा कमलोंके समान नेत्रोंसे सुशोभित सुन्दर-सुन्दर कन्याएँ उनके पास ले आये ||९|| जब वे पतिव्रता कन्याएँ भगवान् के लिए रुचिकर नहीं हुईं तब वे निराश होकर स्वयं अपने आपसे ही द्वेष करने लगीं और आभूषण दूर फेंक भगवान्का ध्यान करती हुई खड़ी रह गयीं ॥१०॥ अथानन्तर—महलके शिखरपर खड़े हुए राजा श्रेयांसने उन्हें स्नेहपूर्ण दृष्टिसे देखा और १. शातकौम्भप्रभः म. क. । २. जगाम म. । ३. परिच्छिन्नं ख. । ४. भासुरांशः म । ८ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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