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________________ उवक्कमाणुयोगद्दारे अणुभागउदीरणा ( १८३ • मिच्छत्तस्स जहणिया उदीरणा कस्स? मिच्छाइद्विस्स सव्वविसुद्धस्स पुन्वुप्पण्णेण सम्मत्तेण से काले सम्मत्तं संजमं च पडिवज्जिहिदि ति ट्ठिदस्स जहण्णाणुभागउदीरणा। सम्मत्तस्स जहणिया उदीरणा कस्स? समयाहियावलिय अक्खीणदसणमोहणिज्जस्स। सम्मामिच्छत्तस्स जहणिया उदीरणा कस्स? से काले सम्मत्तं पडिवज्जिहिदि ति द्वियस्स सम्मामिच्छाइट्ठिस्स* । अणंताणुबंधीणं जहणिया उदीरणा कस्स? मिच्छाइट्ठिस्स सव्वविसुद्धस्स से काले सम्मत्तं संजमं च पडिवज्जिहिदि त्ति ट्ठियस्स। अपच्चक्खाणावरणचदुक्कस्स जहणिया उदीरणा कस्स? सम्माइट्ठिस्स सव्वविसुद्धस्स से काले संजमं पडिवज्जिहिदि त्ति ट्टियस्स । पच्चक्खाणावरणचदुक्कस्स जहणिया उदीरणा कस्स? उन दोनों प्रकृतियोंकी जघन्य अनुभागउदीरणा होती है । मिथ्यात्वकी जघन्य उदीरणा किसके होती है ? जो सर्वविशुद्धमिथ्यादृष्टि जीव पूर्वोत्पन्न सम्यक्त्वसे अनन्तर कालमें सम्यक्त्व व संयमको प्राप्त करेगा, इस प्रकारसे अवस्थित है उसके मिथ्यात्वकी जघन्य अनुभागउदीरणा होती है। सम्यक्त्व प्रकृतिकी जघन्य अनुभागउदीरणा किसके होती है ? जिसके दर्शनमोहनीयके अक्षीग रहने में एक समय अधिक आवली मात्र काल शेष रहा है उसके सम्यक्त्व प्रकृतिकी जघन्य अनुभागउदीरणा होती है। सम्यग्मिथ्यात्वकी जघन्य उदीरणा किसके होती है ? जो अनन्तर कालमें सम्यक्त्वको प्राप्त करेगा, इस अवस्थामें स्थित है ऐसे सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवके उसकी जघन्य अनुभागउदीरणा होती है। अनन्तानुबन्धी कषायोंकी जवन्य उदीरणा किसके होती है ? जो अनन्तर कालमें सम्यक्त्व व संयमको प्राप्त करेगा, इस प्रकारसे स्थित उस सर्वविशुद्ध मिथ्यादृष्टि जीवके उनकी जघन्य उदीरणा होती है। अप्रत्याख्यानावरणचतुष्ककी जघन्य उदीरणा किसके होती है? अन्तर कालमें संयमको प्राप्त करेगा, इस प्रकारसे स्थित सर्वविशुद्ध सम्यग्दृष्टि जीवके अप्रत्याख्यानावरणचतुष्ककी जघन्य उदीरणा होती है। प्रत्याख्यानावरणचतुष्ककी जघन्य उदीरणा किसके होती है ? जो अनन्तर कालमें संयमको प्राप्त ४ सेसाण पगइवेई मज्झिमपरिणामपरिणी होज्जा। क. प्र. ४, ७९. सेसाण ति- शेषाणां सातासातवेदनीय-गतिचतुष्टय-xxx चतुत्रिंशत्संख्यानां प्रकृतीनां तत्तप्रकृत्यये वर्नमाना: सर्वेऽपि जीवामध्यमपरिणामपरिणता जघन्यानुभागोदीरणास्वामिनो भवन्ति (मलय. टीका)। * से काले सम्मत्तं ससंजमं गिण्हओ य तेरसगं । क. प्र. ४, ७२. से त्ति- अनन्तरे काले द्वितीये यः सम्यक्त्वं ससंयम संयमसहितं गृहीष्यति तस्य त्रयोदशानां मिथ्यात्वनन्तानुबन्धिचष्तुयाप्रत्याख्यात-प्रत्याख्यानावरणप्ररूपाणां प्रकृतीनां जघन्यानुभागोदीरणा । अयमिह संप्रदाय:- योऽनन्तरसमये सम्यक्त्त्रं संयमसहितं गहीप्यति तस्य मिथ्यादृष्टेमिथ्यात्वानुबन्धिनां जघन्यानुभागोदीरणा । (म.टीका). . वेयगसम्यत्तस्स उ सगखवणोदीरणाचरिमे । क. प्र. ४, ७१. तथा क्षायिकसम्यक्त्वमत्पादयतो मिथ्यात्व-सम्यग्मिथ्यात्वयोः क्षपितयोर्वेदकसम्यक्त्वस्य क्षायोपशमिकस्य सम्पत्वस्य क्षग्णकाले चरमोदीरणायां ममयाधिकाबलिक शेषायां स्थितौ सत्यां प्रवर्तमानायां जघन्यानुभागोदीरणा भवति । सा च चतुगतिकानामन्यतस्य वेदितव्या ( म टीका)। सम्मत्तमेव मीसे xxx॥ क.प्र. ४, ७२. तथा 'सम्मत्तमेव मीसे' इति यः सम्बग्मिथ्यादष्टिरनन्तरसमये संयम प्रतिपत्स्यते तस्य सम्पम्मिथ्यात्वस्य जघन्यानुभागोदीरणा । सम्पग्मिथ्यादृष्टियुगपत् सम्यक्त्वं संयमं च न प्रतिप पद्यते, तथा विशुद्धेरभावात, किन्तु केवलं सम्यक्त्वमेवेति कृत्वा तदेव केवलमुक्तम् (म टीका)। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001814
Book TitleShatkhandagama Pustak 15
Original Sutra AuthorBhutbali
AuthorHiralal Jain, Fulchandra Jain Shastri, Balchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year1994
Total Pages488
LanguagePrakrit, Hindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & Karma
File Size12 MB
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