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________________ (ल०) (जैनदर्शनवैशिष्ट्यम् :-) एतदङ्गीकरणमप्यनात्मज्ञानां संसारसरिच्छ्रोतसि कुशकाशावलम्बनमिति परिभावनीयं; सर्वथा निरुपणीयं प्रवचनगाम्भीर्य; विलोकनीया तन्त्रान्तरस्थितिः; दर्शनीयं ततोऽस्याधिकत्वम्, अपेक्षितव्यो व्याप्तीतरविभागः; यतितव्यमुत्तमनिदर्शनेष्विति श्रेयोमार्गः । __ (पं०-) 'एतदङ्गीकरणमपि'ति, 'एतस्य' = क्षुद्रसत्त्वविजृम्भितस्य, अपवादतया 'अङ्गीकरणमपि' = आदरणमपि, किं पुनरनङ्गीकरणमवलम्बनं न भवतीति 'अपि' शब्दार्थः । 'कुशकाशावलम्बनमि'ति, कुशाश्च = कशाश्च 'कुशमशाः,' तेषा'मवलम्बनं' आश्रयणम्, अनालम्बनमेव, अपुष्टालम्बनत्वादिति । 'दर्शनीयं ततोऽस्याधिकत्वमि'ति, 'दर्शनीयं' = दर्शयितव्यं, परेषां स्वयं वादृष्टव्यं, 'ततः' = तन्त्रान्तरस्थितेः, 'अस्य' = प्रकृततन्त्रस्य, 'अधिकत्वं' = अधिकभावः, कषादिशुद्धजीवादितत्त्वाभिधायकत्वात् । 'व्याप्तीतरविभाग' इति, 'व्याप्तिश्च' = सर्वतन्त्रानुगमो, अस्य सर्वनयमतानुरोधित्वात्, ‘इतरा = अव्याप्तिः', तन्त्रान्तराणामेकनयरुपत्वाद्, 'व्याप्तीतरे,' तयोः 'विभागो' = विशेषः । इह चेतराशब्दस्य पुंवन्दावो 'वृत्तिमात्रे सर्वादीनां पुंवभ्दाव:' इतिवचनात् । 'उत्तमनिदर्शनेषु' इति = आज्ञानुसारप्रवृत्तमहापुरुषदृष्टान्तेषु । छ: कर्तव्य- (१) क्षुद्र जीवोंकी ऐसी प्रवृत्तिको अपवाद रूपसे भी आदर करना, यह अपनी आत्माको नहीं पहचाननेवाले जीवोंके लिये इस संसार-प्रवाहमें तृणका आलम्बन लेने जैसा है; अर्थात् वह आलम्बन रूप ही नहीं है, क्योंकि ऐसा आलम्बन जिन भगवान द्वारा प्ररुपित सम्यग्दर्शन, सम्यग् ज्ञान, एवं सम्यक् चारित्र, इन तीनोंमेंसे किसीका भी पोषक नहीं है। इससे यह स्पष्ट होता है कि क्षुद्र जीवोंकी वैसी प्रवृत्तिको अपवाद रूपसे मान्य रखना तो क्या, न मानकर भी हितकारी गिनना किसी भी तरह आलम्बन रूप नहीं हो सकता। अत एव इस बात पर भली भाँति विचार एवं मनन करना आवश्यक है। (२) आर्हत् प्रवचनकी गम्भीरताका योग्य रूपसे अन्वेषण और उसका योग्य मूल्यांकन करना चाहिए । (३) अन्य दर्शनों की स्थितिका भी योग्य पर्यवेक्षण करना चाहिए। (४) उन इतर दर्शनोंकी अपेक्षा कष-छेद-ताप परीक्षामें उत्तीर्ण जैनदर्शनके वैशिष्ट्यका प्रतिपादन करना चाहिए। यह बात सतत ध्यानमें रखनी आवश्यक है कि जैनदर्शनका वैशिष्ट्य कष-छेद-ताप परीक्षा द्वारा शुद्ध प्रमाणसिद्ध जीवादि तत्त्वोंके प्रतिपादन पर निर्भर है। (५) जैनदर्शनमें अन्य सभी दर्शनोंका समावेश होता है, जबकि प्रमाणभूत सब नयोंके याने दृष्टियोंके समुच्चय रूप जो जैनदर्शन है, उसका अन्य दर्शनों में समावेश नहीं हो सकता है - जैनदर्शनका यह विशेषत्व खास लक्षमें लेने योग्य है। (६) जिनाज्ञानुसार प्रवृत्ति करनेवाले और उत्तम दृष्टान्तरुप महापुरुषोंके चरित्रको आदर्शके तौरपर सम्मुख रखकर प्रयत्नशील होना आवश्यक है। ऐसी प्रवृत्ति करनेवालेके मनमें ऐसी दृढ श्रद्धा नितान्त आवश्यक है कि कल्याणका उत्कृष्ट मार्ग जिनेश्वरदेवके आदेश शिरोधार्य करनेमें ही है। यहाँ 'व्याप्तीतरविभाग' इस सामासिक पदमें अव्याप्तिसूचक 'इतर' शब्द स्त्रीलिंगमें न रखकर पुल्लिंगमें रखनेका हेतु यह है कि समासमें स्त्रीलिंग सर्वनामोंका पुल्लिंग रूप हो जाता है। अब इस प्रतिपादनमें देखिए कि जैनदर्शनकी कितनी विशेषताएँ बतलाई हैं। २० Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001721
Book TitleLalit Vistara
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBhuvanbhanusuri
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages410
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Religion
File Size11 MB
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