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________________ (ल०-) एतन्निरासायाह 'पुरुषवरगन्धहस्तिभ्यः' इति । पुरुषाः पूर्ववदेव, ते वरगन्धहस्तिन इव गजेन्द्रा इव क्षुद्रगजनिराकरणादिना धर्मसाम्येन पुरुषवरगन्धहस्तिनः । यथा गन्धहस्तिनां गन्धेनैव तद्देशविहारिणः क्षुद्रगजा भज्यन्ते, तद्वदेतेऽपि परचक्रदुर्भिक्षमारिप्रभृतयः सर्व एवोपद्रवगजा अचिन्त्यपुण्यानुभावतो भगवद्विहारपवनगन्धादेव भज्यन्त इति । मतका खण्डनः परमात्मा श्रेष्ठ गन्धहस्ती समान किस प्रकार:-- __ हीन गुण की उपमा अधिक गुण की उपमा के बाद न दी जा सके इस मत के निवारणार्थ कहते हैं 'पुरिसवरगन्धहत्थीणं' । प्रभु को पहले केवलज्ञान गुण से पुण्डरीक की उपमा दी है अब उपद्रवनिवारण के गुण से गन्धहस्ती की उपमा दी जाती है। इस प्रकार हीन गुण उपमा बाद में भी कैसे दी जा सकती है, उसकी युक्ति आगे बताते हैं। पहले यहां पद का अर्थ दिखलाया जाता है। 'पुरुष' पद का अर्थ, पहले कहे मुताबिक, शरीरधारी होता है। परमात्मा ऐसे पुरुष है जो कि वर यानी श्रेष्ठ गन्धहस्ती समान है। क्यों कि क्षुद्र हत्थियों को दूर हटना इत्यादि जो गन्धहस्ती के धर्म हैं उनकी यहां समानता है। जिस प्रकार गन्धहत्थियों के मद की गन्ध से ही उस देश में विचरते क्षुद्र हत्थी भाग जाते हैं, इस प्रकार ये सब परराज्य के सैन्य का उपद्रव, दुष्काल, महामारी वगैरह उपद्रव स्वरूप हत्थी भी तीर्थंकर भगवान के विहाररूप पवन की गन्ध से ही भाग जाते हैं, दूर हो जाते हैं। यह तीर्थंकर नामकर्म स्वरूप पुण्यकर्म के प्रभाव से होता हैं। अर्हत्प्रभु के ४ मुख्य अतिशय : हम पहले कह आये कि ३४ अतिशयों की भीतर यह एक अतिशय है कि जहां जहां श्री अर्हत् प्रभु विचरते हैं वहां वहां १२५ योजन तक परसैन्य, दुष्काल, इत्यादि उपद्रव दूर हो जाते हैं। इस अतिशय का नाम अपायापगम अतिशय है। अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय; और साधु, -इन पंच परमेष्ठियों के १०८ गुण गिने जाते हैं, उनमें अरिहंत प्रभु के १२ गुण होते हैं - अशोक वृक्षादि अष्ट प्रातिहार्य के ८; और ज्ञानातिशय, वचनातिशय, पूजातिशय, एवं अपायापगम-अतिशय ये ४ । ज्ञानातिशय है लोकालोक-प्रकाशक केवलज्ञान; वचनातिशय है ३५ अतिशययुक्त वाणी; पूजातिशय है इन्द्रादि द्वारा की जाती पूजा (सत्कार सन्मानादि); और अपायापगम अतिशय में परसैन्य प्रमुख उपद्रव रूप अपायों का अपगम होना, माने दूर होना । पूर्व के तीसरे भव में प्रभुने अरिहंत आदि वीस या कम स्थानकों की उपासना एवं समस्त विश्व के जीवों को तारने की उत्कृष्ट करुणा भावना की है; उनकी वजह से ऐसा तीर्थंकर-नामकर्म नामक पुण्य कर्म उपार्जित हुआ है कि जिसकी अचिन्त्य महिमा से यह बनना सहज है। उत्कृष्ट पुण्यवाले पुरुषों के आगमन पर वातावरण का शान्त हो जाना असंभवित नहीं है। अब, हीन गुणवाली उपमा को बाद में भी दे सकते हैं; क्यों कि वचन में विविध क्रमवाले प्रतिपादक स्वभाव, और वस्तु में विविध क्रमवाले प्रतिपाद्य स्वभाव होते हैं, इसकी अब चर्चा करते हैं। शब्द में क्रम नहीं है ऐसा नहीं : प्र०- यदि वस्तु एकानेकस्वभाव वाली हैं, अर्थात् वह आधारभूत द्रव्य रूप से एकस्वभाव है, एवं आधेय (रहने वाले) पर्यायों के रूप से अनेकस्वभाव है, और इसी से अधिक गुण की उपमा देने के बाद भी हीन गुण की उपमा दे सकते हैं, तो ऐसी परिस्थिति में तो वाचक शब्दो का अर्थात् प्रतिपादन का भी क्रम नष्ट हो Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001721
Book TitleLalit Vistara
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBhuvanbhanusuri
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages410
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Religion
File Size11 MB
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