SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 277
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ( २५८ ) अंतिम ( अन्तिक ) = अन्तिक, नजदीक, पास । चंड ( चण्ड) प्रचण्ड, क्रोधी। लहुअ, हलुअ ( लघुक )= लघु, हलका, छोटा । नाय ( ज्ञात ) = ज्ञात, प्रसिद्ध । अम्हारिस ( अस्मादृश) = हमारे जैसा । सचेलय ( सचेलक)= वस्त्र वाला, वस्त्रधारी । अचेलय, अएलय ( अचेलक ) = बिना वस्त्र का, नग्न, दिगम्बर । अव्यय सव्वत्थ ( सर्वत्र ) = सर्वत्र, सब स्थानों में । मज्झे ( मध्ये ) = मध्य में, बीच में, में। जं ( यत् ) = जो। सक्खं ( साक्षात् ) = साक्षात् , प्रत्यक्ष । सययं ( सततम् ) = सतत, निरन्तर । अह ( अथ )=प्रारम्भ सूचक अव्यय, शुरू । मणा, मणयं ( मनाक् ) = थोड़ा, इषत्, न्यूनता सूचक । सइ ( सदा ) = सदा, हमेशा । अभिक्खणं ( अभिक्षणम् ) = क्षण-क्षण, बारंबार । अहुणा ( अधुना ) = अब, अभी । घातुएँ मुंज् ( युञ्ज )=जोड़ना, संयुक्त करना, सम्बन्धित करना । सोह ( शोध् ) = सोधना, शुद्ध करना । सिव्व (सीव्य ) = सीना । हण ( हन् ) = मारना । मन्न् ( मन् ) = मानना, स्वीकार करना । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001702
Book TitlePrakritmargopadeshika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBechardas Doshi
PublisherMotilal Banarasidas
Publication Year1968
Total Pages508
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Grammar
File Size16 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy