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________________ चौथा अध्याय ] [ ४१ है । इसलिये स्मरण आदि कुछ अंशोंके निश्चयसे इसके ज्ञान, दर्शन, सुख, वीर्य आदि समस्त स्वरूपका निश्चय हो जाता है; क्योंकि स्मृति आदि अंश सिवा इसके दूसरे किसी पदार्थ में नहीं रहते ।। ४-५ ।। द्रव्यं क्षेत्रं च कालं च भावमिच्छेत् सुधीः शुभं । शुद्धचिद्रपसंप्राप्ति हेतुभूतं निरंतरं ॥ ६ ॥ न द्रव्येन न कालेन न क्षेत्रेण प्रयोजनं । केनचिन्नैव भावेन लब्धे शुद्धचिदात्मके ॥ ७ ॥ अर्थः – जो महानुभाव शुद्धचिद्रूपकी प्राप्तिके अभिलाषी हैं उन्हें चाहिये कि वे उसकी प्राप्तिके अनुपम कारण शुद्ध द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावका सदा आश्रय करें; परन्तु जिससमय शुद्धचिद्रूपकी प्राप्ति हो जाय उस समय द्रव्य, काल, भावके आश्रय करनेकी कोई आवश्यकता नहीं । भावार्थ : - कोलाहलपूर्ण और अशुभ द्रव्य, क्षेत्र, काल व भावके आश्रयसे कभी भी शुद्धचिद्रूपकी प्राप्ति नहीं हो सकती, इसलिये उसके इच्छुक विद्वानोंको चाहिये कि वे शुद्धचिद्रूपकी प्राप्ति के लिये शुभ किन्तु अनुकूल द्रव्य, क्षेत्र, काल व भावका आश्रय करें । हाँ जब शुद्धचिद्रूपकी प्राप्ति हो जाय, तब शुभ द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावके आश्रय करनेकी कोई आवश्यकता नहीं ।। ६-७ ।। परमात्मा परंब्रह्म चिदात्मा सर्वहकू शिवः । नामानीमान्यहो शुद्धचिद्रूपस्यैव केवलं ॥ ८ ॥ अर्थ :- परमात्मा, परब्रह्म, चिदात्मा, सर्वहृष्टा और शिव, अहो ! ये समस्त नाम उसी शुद्धचिद्रूपके हैं । त. ६ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001638
Book TitleTattvagyan Tarangini
Original Sutra AuthorGyanbhushan Maharaj
AuthorGajadharlal Jain
PublisherDigambar Jain Swadhyay Mandir Trust
Publication Year
Total Pages184
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Spiritual
File Size9 MB
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