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________________ सर्वार्थसिद्धि लिखा हो। यदि यह अनुमान ठीक हो तो शान्त्यष्टक उनकी वह कृति मानी जा सकती है जो सम्भवतः सब कृतियों के अन्त में लिखी गयी होगी। 9. सारसंग्रह- आचार्य पूज्यपादने एक 'सारसंग्रह' नामक ग्रन्थका भी निर्माण किया था ऐसा धवलाके एक उल्लेखसे ज्ञात होता है । यथा सारसंग्रहेऽप्यक्तं पूज्यपा-अनन्तपर्यायात्मकस्य वस्तुनोऽन्यतमपर्यायाधिगमे कर्तव्ये जात्य हेत्वपेक्षो निरवद्यप्रयोगो नय इति ।' सर्वार्थसिद्धि में आचार्य पूज्यपादने जो नयका लक्षण दिया है इससे इस लक्षणमें बहुत कुछ साम्य है, इसलिए यह माननेका पर्याप्त कारण है कि यह ग्रन्थ आचार्य पूज्यपादकी ही कृति होनी चाहिए। 10. चिकित्साशास्त्र- इस बातको सिद्ध करनेवाले. भी कई प्रमाण मिलते हैं कि आचार्य पूज्यपादने वैद्यक विषय पर भी कोई अनुपम ग्रन्थ लिखा था। यथा--- 1. आचार्य शुभचन्द्र द्वारा रचित ज्ञानार्णवके एक श्लोकका उल्लेख हम पहले कर आये हैं। उसमें उनके वचनों को वचनमल और चित्तमलके समान कायमलको दूर करनेवाला कहा गया है। 2. आचार्य उग्रादित्यने अपने कल्याणकारक नामक ग्रन्थ में आचार्य पूज्यपादके वैद्यक विषयक ग्रन्थका उल्लेख 'पूज्यपादेन भाषितः, शालाक्यं पूज्यपादप्रकटितमधिकम्' इत्यादि शब्दसन्दर्भ द्वारा किया है। 3. हम पहले शिमोगा जिले के नगर ताल्लुकेके 46 नं० के एक शिलालेखका उल्लेख कर आये हैं उसमें भी उन्हें मनुष्य समाजका हित करनेवाला वैद्यक शास्त्रका रचयिता कहा गया है । 4. विक्रमकी पन्द्रहवीं शताब्दीके विद्वान् मंगराजने अपने कनडी भाषा में लिखे गये खगेन्द्रमणिदर्पण में भी आचार्यपूज्यपादके एक चिकित्साग्रन्यका उल्लेख किया है। ___इन सब प्रमाणोंसे विदित होता है कि सम्भवतः आचार्यपूज्यपादने चिकित्सा सम्बन्धी कोई ग्रन्थ लिखा था। 11. नाभिषेक-श्रवणबेल्गोलके शक सं0 1085 के शिलालेख नं0 40 से यह भी विदित होता है कि इन्होंने एक जैन अभिषेक पाठ की भी रचना की थी। उद्धरण इस प्रकार है 'जैनेन्द्र निजशब्दभोगमतलं सर्वार्थसिद्धिः परा सिद्धान्ते निपुणत्वमुद्घकविता जैनाभिषेकः स्वकः । छन्दस्सूक्ष्मधियं समाषिशतकस्वास्थ्यं यदीयं विदाम् आख्यातीह स पूज्यपावमुनिपः पूज्यो मुनीनां गणैः ॥' इसमें कहा गया है कि विद्वानोंके समक्ष जिनका जैनेन्द्र व्याकरण अतुल निज शब्द सम्पत्तिको, सर्वार्थसिद्धि सिद्धान्त में निपुणताको, जैन अभिषेक कविताकी श्रेष्ठताको और आत्मस्वास्थ्यकर समाधिशतक छन्दःशास्त्रकी सूक्ष्मताको सूचित करता है वे आचार्य पूज्यपाद मुनिगणोंसे सतत पूजनीय हैं। पहले हम चन्द्रय्य कविके पूज्यपादचरिते' के आधारसे आचार्य पूज्यपादकी संक्षिप्त जीवनी दे आये हैं। उसमें आचार्य पूज्यपादको जैनेन्द्र व्याकरण और वैद्यकके समान अर्हत्प्रतिष्ठालक्षण और ज्योतिषका भी लेखक बतलाया गया है। कह नहीं सकते कि यह उल्लेख कहाँ तक ठीक है। यदि यह साधार हो तो कहना होगा कि आचार्य पूज्यपादने अर्हत्प्रतिष्ठा और ज्योतिष विषय पर भी रचना की थी। 6. समय-विचार-आचार्य पूज्यपाद कब हुए यह प्रश्न विशेष विवादास्पद नहीं है। पांचवीं शताब्दी के मध्यकाल से लेकर प्रायः जितने साहित्यकार हैं उन्होंने किसी न किसी रूप में या तो उनका या उनके साहित्यका उल्लेख किया है या उनके साहित्यका अनुवर्तन किया है । इस दृष्टिसे हमारे सामने मुख्य रूपसे जिनभद्र गणि क्षमाश्रमणका विशेषावश्यकभाष्य और अकलंकदेवका तत्त्वार्थवातिक उपस्थित हैं । भट्ट अकलंकदेवके सामने तत्त्वार्थवातिक लिखते समय सर्वार्थ सिद्धि और जैनेन्द्रव्याकरण उपस्थित था यह उसके Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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