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________________ प्रस्तावना प्रथम सूत्रके अनुसार पदान्त झय से पर रहते हुए 'ह' को पूर्वसवर्ण होता है। यथा-'सुवाग्दसति।' द्वितीय सत्रके अनुसार पदान्त झय से पर रहते हुए 'श' के स्थान में 'छ' होता है। यथा-'षट्छयामाः।' तृतीय सूत्र के अनुसार हल से पर यम्का यम् पर रहते लोप होता है। यथा-'जय्या' इस शब्दमें दो यकार हैं और इनके संयोगसे एक तीसरा यकार और प्राप्त हुआ। किन्तु इस सूत्रके नियमानुसार बीचके एक यकारका लोप होकर शय्या' यह प्रयोग ही शेष रहता है। चतुर्थ सूत्र के अनुसार हलसे पर झरका सवर्ण झर पर रहते हए लोप होता है। यथा-'भित्ताम' यहाँ एक तीसरे तकारका लोप हो गया है। इस प्रकार ये चार वैकल्पिक कार्य आचार्य समन्तभद्र के मतसे होते हैं । जब कि पाणिनि व्याकरण में ये कार्य अन्यतरके मतसे माने गये हैं। सिद्धसेन-आचार्य सिद्धसेनके मतका प्रतिपादन करनेवाला सूत्र है-वेत्तेः सिद्धसेनस्य । 5, 1, 71 विद् धातुसे पर झ् प्रत्ययके स्थान में आदेशभूत 'अत्' को सिद्धसेन के मतानुसार 'रुट' का आगम होता है यह इस सूत्रका भाव है। यथा-'संविद्रते।' संविदते प्रयोगमें दकारके बाद और अकारके पूर्व रुट' का आगम होकर यह वैकल्पिक प्रयोग बना है। इस सूत्रके स्थानमें पाणिनि व्याकरणका वेत्तेविभाषा।7,1,7।' सत्र उपलब्ध होता है। इस व्याकरणका सोमदेवसूरिकृत गाब्दार्णवचन्द्रिका में एक परिवर्तित रूप उपलब्ध होता है। किन्त वह उसका बादका परिष्कृत रूप है ऐसा अनेक प्रमाणोंके आधारसे प्रेमीजीने सिद्ध किया है। इसका असली पाठ वही है जो आचार्य अभयदेव कृत महावृत्तिमें उपलब्ध होता है। इस व्याकरणकी कुछ विशेषताओंका हमने उल्लेख किया ही है। और भी कई विशेषताएँ हैं जिनके कारण इसका अपना स्वतन्त्र स्थान है।। उल्लेखोंसे ज्ञात होता है कि आचार्य पूज्यपादने उक्त पाँच ग्रन्थोंके सिवा कई विषयों पर अन्य अनेक ग्रन्थ लिखे थे। विवरण इस प्रकार है 6.-7. जैनेन्द्र और शब्दावतार न्यास–शिमोगा जिले के नगर तहसीलके 46वें शिलालेख में इस बातका उल्लेख है कि आचार्य पूज्यपादने एक तो अपने व्याकरण पर जैनेन्द्र' नामक न्यास लिखा था और दूसरा पाणिनि व्याकरण पर 'शब्दावतार' नामक न्यास लिखा था । यथा 'न्यासं जैनेन्द्रसंज्ञं सकलबुधनुतं पाणिनीयस्य भूयो। न्यासं शब्दावतारं मनुजततिहितं वैद्यशास्त्रं च कृत्वा । यस्तत्त्वार्थस्य टीका व्यरचदिह तां भात्यसो पूज्यपाद स्वामी भूपालवन्द्यः स्वपरहितवचःपूर्णवृग्बोधवृत्तः ॥' ये दोनों अभी तक उपलब्ध नहीं हुए हैं। इसके लिए प्राचीन शास्त्रभाण्डारोंमें विशेष अनुसन्धानकी आवश्यकता है। 8. शान्त्यष्टक-हम पहले आचार्य पूज्यपादकी कथा दे आये हैं। उसके लेखकने इनके बनाये हुए एक शान्त्यष्टक' का उल्लेख किया है। एक शान्त्यष्टक क्रियाकलापमें भी संगृहीत है। इस पर पं० प्रभाचन्टकी संस्कृत टीका है। शान्त्यष्टकके प्रारम्भमें पं० प्रभाचन्द्रजीने जो उत्थानिका दी है उस में कथालेखक चन्द्रय्य कविके मतका समर्थन करते हुए कहते हैं कि श्री पादपूज्य स्वामीको चक्षुति मिरव्याधि हो गयी थी जिसे दर करने के लिए वे स्तुति करते हुए कहते हैं, 'न स्नेहात्'। इसके अन्त में जो श्लोक आता है उसमें विष्टि प्रसन्नां कुरु' इत्यादि पदद्वारा भी यही भाव व्यक्त होता है। इससे विदित होता है कि सम्भव है जीवन के अन्त में पूज्यपाद आचार्यकी दृष्टि तिमिराच्छन्न हो गयी हो और उसे दूर करने के लिए उन्होंने ही शान्त्यष्टक इस ग्रन्थकी टीका-टिप्पणी व परिवर्धन आदिका विशेष ज्ञान प्राप्त करनेके लिए प्रेमीजी द्वारा लिखित 'जैनसाहित्य और इतिहास' नामक ग्रन्थ देखिए। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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