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________________ प्रस्तावना करनेवाले अहेलिका नाम आता है और इसके बाद माघनन्दि, एरसेन पुष्पदन्त और भूतबलिका उल्लेख करने के बाद आचार्य परम्परा में कुन्दकुन्दका नाम आता है। यह तो निश्चित है कि आचार्यद्धपिछ आचार्य कुन्दकुन्दके बाद हुए हैं। इसलिए यदि इस हिसाब से विचार दिया जाय और श्रुतधर आचार्यों के 683 वर्षमें आयेके आचार्योंका लगभग 100 वर्ष मानकर जोड़ा जाय तो वीर नि० सं० से 783 वर्ष के आसपास पिच्छ हुए यह कहा जा सकता है। आचार्य 2. श्रवणबेलगोल के शिलालेख नं० 105 में भो घर आनायकी परम्परका निर्देश कर और उसके बाद कुम्भ, विनीत, हलधर वसुदेव, अचल, मेरुधीर, सर्वश, सर्वगुप्त, महिधर, धनपाल, महावीर और वीर इन नामका उल्लेख कर कुन्दकुन्द और तत्त्वार्थसूत्र के कर्ता दिन्छ उमास्वातिका नाम आता है। किन्तु इसमें एक तो भूतधर आचार्योंकी परम्पराका काल निर्देश नहीं किया है। दूसरे श्रुतधर व दूसरे आचार्यकि कमिक नामनिर्देशका भी ख्याल नहीं रखा है। अतः इस आधार मे आचार्य पिच्छके समय सम्बन्ध में कुछ भी अनुमान नहीं किया जा सकता। 75 3. श्रुतधर आचार्योंकी परम्पराका निर्देश धरना, आदिपुराण, नन्दिसंघकी प्राकृत पट्टावली और त्रिलोकप्रज्ञप्ति आदि में भी किया है। किन्तु वे 683 वर्ष की परम्पराका निर्देश करने तक ही सीमित हैं । अतः इनके आधारसे किसी एक निष्कर्ष पर पहुँचना कठिन है। इन आधारोंके बल पर यह भी तो नहीं कहा जा सकता कि आचार्य गृच्छिके समय सम्बन्ध में इन आचायोका क्या अभिमत है और हम इस सम्बन्ध में इनके अभिनतको जाने बिना केवल इन्द्रनन्दि श्रुतावतारके आधारसे श्रुतधारियोंकी 683 वर्षकी परम्परा के बाद आचार्यद्धपिच्छकी अवस्थितिको दन आचार्योंके मतसे मानने के लिए प्रस्तुत नहीं हैं। इस प्रकार पूर्वोक्त विवेचनसे हमारे सामने मुख्य तीन मत आते हैं जिनसे हमें आचार्य सच्छिके समवकी सूचना मिलती है। प्रथम नन्दिसंघकी पट्टावलिके अनुसार उनका समय विक्रम ( 571-470 ) 101 ठहरता है। दूसरे विद्वज्जन बोधक उद्धृत श्लोकके अनुसार वह विक्रम ( 770-470 ) 300 ठहरता है और तीसरे दन्द्रनन्दिके थुतावतारके अनुसार वि० सं०] (783-470 ) 313 अनुमानित किया जा सकता है। श्रवणबेलगोलके शिलालेखों में आचार्य वृद्धपिच्छके विश्वका नाम आचार्य बलाकपिच्छ आता है और तो यह समाधान हो आसीन हुए और जिला सिंधी पट्टावली में बलाक पिच्छ के स्थान में लोहाचार्यका नाम जाता है किन्तु सकता है कि पट्टी में उन आचार्य के नामोंका उल्लेख है जो उनके बाद पट्ट पर लेखों में इसका विचार न कर उनका नामोल्लेख किया है जो उनके प्रमुख शिष्य थे और इस आधार से यहाँ तककी पट्टावलीको ठीक भी मान लिया जाय तब भी इनके समय के सम्बन्ध में पट्टावलीके कालका दूसरे उल्लेखों में निर्दिष्ट कालके साथ जो इतना अन्तर दिखाई देता है उसका हल कैसे किया जाय यह विचारणीय विषय हो जाता है । यहाँ हम अन्य पौर्वात्य व पाश्चात्य विद्वानोंके मतोंका विशेष ऊहापोह नहीं करेंगे, क्योंकि उन विद्वानोंने अधिकतर तस्वार्थसूत्र और तस्वार्थभाष्य इनको एकक मान कर अपने-अपने मतका निर्देश किया है। किन्तु सुविचारित मटके रूपमें डॉ० ए० एन० उपाध्येके मतको अवश्य ही उपस्थित करना चाहेंगे। खपि उहापोहके बाद उन्होंने अपना यह मत आचार्य कुन्दकुन्दके समय के सम्बन्धमें निर्दिष्ट किया है किन्तु नन्दिसं पट्टावली व दूसरे प्रमाणोंक अनुसार आचार्य गुढपिन्छ आचार्य कुन्दकुन्द के शिष्य होने के कारण उससे इनके 1. देखो माणिकचन्द्र ग्रन्थमालासे प्रकाशित जैन शिलालेखसंग्रह भाग 1, पृ० 195 आदि । 2. देखो धवला पु० 9, पृ० 130 3. देखो आदिपुराण, पर्व 2, श्ला० 137 से। 4. देखो जैन सिद्धान्तभास्कर किरण 4, पृ० 71 5. देखो त्रिलोकप्रज्ञप्ति महाधिकार 4 गाथा 1490, 1491 | 6. देखी भा० प्र०म० प्रकाशित जैन शिलालेख संग्रह भाग 1, शिलालेख नं० 40, 42 और 50 आदि । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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