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________________ 10 सर्वार्थसिद्धि नहीं ठहरते, और हमारा ऐसा मानना अनुचित भी नहीं है, क्योंकि विक्रमकी आठवीं शताब्दीके पूर्व 6वीं शताब्दीके प्रारम्भ में या इसके कुछ काल पूर्व तत्त्वार्थसूत्र पर सर्वार्थसिद्धि टीका लिखी जा चुकी थी तथा अनेक टीका-टिप्पणियां प्रचलित हो चुकी थीं। यद्यपि धर्मसागर गणी, बलिस्सहके शिष्य स्वातिने तत्त्वार्थसूत्रकी रचना की, ऐसी शंका करते हैं, किन्तु यह उनका निश्चित मत नहीं है। केवल सम्भावना मात्र है। जैसा कि उनके इन शब्दोंसे 5 यथा-'तस्य बलिसहस्य शिष्यः स्वातिः तत्त्वार्थादयो प्रन्यास्तु तत्कृता एव संभाव्यन्ते । अतएव इसे विशेष महत्त्व नहीं दिया जा सकता। यही तक हमने पांच मतोंकी समीक्षा की। मात्र एक प्रमुख मत शेष रहता है जिस पर यहाँ तीन दृष्टियोंसे विचार करना है-नाम, परम्परा और समय । माम यह हम प्रारम्भ में ही उद्धरणों के साथ लिख आये हैं कि आचार्य वीरसेन, आचार्य विद्यानन्द । और आचार्य वादिराज तत्त्वार्थसूत्रके कर्ताका नाम आचार्य गृद्ध पिच्छ ही घोषित करते हैं और ये उल्लेख अपेक्षाकृत प्राचीन हैं। किन्तु इन उल्लेखों को छोड़कर दिगम्बर परम्परामें अन्य जितने भी उल्लेख मिलते हैं उनमें गद्धपिच्छको उपपद या दूसरा नाम मान कर नानारूपता दिखाई देती है। इन में से कुछ प्रमुख उल्लेखोंका निर्देश हम 'अन्य मत' शीर्षकके अन्तर्गत कर आये हैं। इसी तरहका एक प्रमुख मत नन्दिसंघकी पट्टावलीका है। नन्दिसंघकी दो पट्टावलियाँ उपलब्ध होती हैं—एक संस्कृत पट्टावली और दूसरी प्राकृत पट्टावली । इनमेंसे संस्कृत पट्टावलिमें आचार्य उमास्वातिको तत्त्वार्थसूत्रका कर्ता कहा गया है । __ यहाँ देखना यह है कि तत्त्वार्थसूत्रके कर्ताके नामके विषय में इतना मतभेद होनेका कारण क्या है और उनका ठीक नाम क्या है ? पहले हम श्रवणबेल्गोलमें पाये जानेवाले शिलालेख 105 और 108 के उद्धरण उपस्थित कर आये है। वे शिलालेख क्रमश: शक सं0 1320 और 1355 के अनुमानित किये गये हैं। शक सं0 1037 और 1085 के भी दो शिलालेख वहाँ उपलब्ध होते हैं जो जैन शिलालेख संग्रह भाग 1 में क्रमशः 47 और 40 नम्बर पर दर्ज हैं। 47 नं० के शिलालेख में कहा गया है श्री गौतम गणधरके अन्वयमें नन्दिसंघके प्रमुख आचार्य पद्मनन्दी हुए जिनका दूसरा नाम कोण्डकुन्द था। फिर उनके अन्वय में गद्धपिच्छ अपर नामवाले उमास्वाति आचार्य हुए। इनके शिष्य बलाकपिच्छ थे और बलाकपिच्छके शिष्य गुणनन्दि थे।' . नं0 40 के शिलालेखमें कहा गया है कि 'गौतम गणधरके बाद पांचवें श्रुतकेवली भद्रबाह और उनके शिष्य चन्द्रगुप्त हुए। इसके बाद उनके अन्वयमें पद्मनन्दी हुए। इनका दूसरा नाम कोण्डकुन्द था। फिर इनके अवन्यमें गद्धपिच्छ उमास्वाति आचार्य हुए। इनके शिष्य बलाकपिच्छ थे। इस प्रकार महान आचार्योंकी परम्परामें क्रमश: आचार्य समन्तभद्र हुए।' नं. 105 और 108 के शिलालेखों में, जिनका उल्लेख हम पहले कर आये हैं, लगभग यही बात कही गयी है। अन्तर केवल इतना ही है कि इन दोनों शिलालेखों में गद्धपिच्छ उमास्वातिको तत्त्वार्थसूत्रका रचयिता कहा गया है और शिलालेख नं0 47 व 40 में रचयिता के रूप में उनका उल्लेख नहीं किया है। यहाँ पर हम सर्वप्रथम दिगम्बर परम्पराके उक्त उल्लेखोंके आधारसे, तत्त्वार्थभाष्यके अन्त में पायी जानेवाली प्रशस्तिके आधारसे और धर्म सागरगणि कृत तपागच्छ पट्टावलीके आधारसे परम्परा दे देना चाहते हैं। यथा Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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