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________________ सर्वार्थसिद्धि सूत्रों का पाठ किया जाय तो यहाँ जाकर रुकना पड़ता है और मन में यह शंका बनी ही रहती है कि धर्मास्तिकाय न होनेसे आचार्य क्या बतलाना चाहते हैं सूत्रपाठी यह स्थिति वाचक उमास्वाति के ध्यान में आयी और उन्होंने इस स्थितिको साफ करने की दृष्टिसे ही उसे सूत्र न मानकर भाष्यका अंग बनाया है। यह क्रिया स्पष्टतः बादमें की गयी जान पड़ती है। इसी प्रकार इसी अध्याय के सर्वार्थसिद्धिमान्य दूसरे सूत्रको सीजिए। इसके पहले मोहनीय आदि कर्मोंके अभाव से केवलज्ञानकी उत्पत्तिका विधान किया गया है। किन्तु इनका अभाव क्यों होता है इसका समुचित उत्तर उस सूत्रसे नहीं मिलता और न ही सर्वार्थसिद्धिकार इस प्रश्नको स्पर्श करते हैं। किन्तु वाचक उमास्वातिको यह त्रुटि खटकती है। फलस्वरूप वे सर्वार्थसिद्धिमान्य पत् हेत्वभावनिर्जराभ्यां कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षो मोक्षः इस सूत्र के पूर्वार्धको स्वतन्त्र और उत्तरार्ध को स्वतन्त्र सूत्र मानकर इस कमी को पूर्ति करते हैं। सवार्थसिद्धि में जबकि इसका सम्बन्ध केवल हस्तकर्मविप्रमोक्षः' पदके साथ जोड़ा गया है वहाँ वाचक उमास्वाति इसे पूर्वसूत्र और उत्तरसूष दोनों के लिए बतलाते हैं। 46 ऐसी ही एक बात जो विशेष ध्यान देने योग्य है, पाँचवें अध्याय कालके उपकारके प्रतिपादक सूत्र के प्रसंगसे आती है । प्रकरण परत्व और अपरत्वका है। ये दोनों कितने प्रकार के होते हैं इसका निर्देश सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्य दोनों में किया है । सर्वार्थसिद्धि में इनके प्रकार बतलाते हुए कहा है- परस्वापरत्वे क्षेत्रकृते कालकृते च स्तः किन्तु तत्वार्थ माध्य में ये दो भेद तो बतलाये ही गये हैं। साथ ही वहाँ प्रशंसाकृत परत्वापरत्वका स्वतन्त्र रूप से और ग्रहण किया है । वाचक उमास्वाति कहते हैं- परस्वापरत्वे त्रिविधे प्रशंसाकृते क्षेत्रकृते कामकृते इति । इतना ही नहीं हम देखते हैं कि इस सम्बन्ध में तस्वार्थवातिककार उत्स्वार्थ भाष्यका ही अनुसरण करते हैं। उन्होंने कालके उपकार के प्रतिपादक सूत्रका व्याख्यान करते हुए परस्य और अपरस्वके इन तीन भेदोंका उल्लेख इन शब्दों में किया है 'क्षेत्रप्रशंसाकालनिमितास्वरत्वापरत्वानवचारणमिति चेत् न कालोपकारप्रकरणात्' ।' अतएव क्या इससे यह अनुमान करने में सहायता नहीं मिलती कि जिस प्रकार इस उदाहरण से तत्वार्थभाध्य तस्यार्थवार्तिककार के सामने या इस कथन की पुष्टि होती है उसी प्रकार तस्वार्थाय सर्वार्थसिद्धि के बादकी रचना है इस कथन की भी पुष्टि होती है। स्पष्ट है कि पौर्वापर्य की दृष्टि से विचार करनेपर तत्वार्थ भाष्यका रचनाकाल सर्वार्थसिद्धि के रचे जाने के बाद स्थिर होता है और सब स्थितियोंका विचार करनेपर यह ठीक भी प्रतीत होता है। सर्वार्थसिद्धिमें अन्य साहित्य के उद्धरण -- सर्वार्थसिद्धि लिखते समय आचार्य पूज्यपादके सामने जो विपुल साहित्य उपस्थित था उसका अवलम्बन लेकर उन्होंने इस महान् टीका ग्रन्थको श्रीवृद्धि की है। उसमें प्रमुख स्थान जिसे दिया जा सकता है वह है षट्खण्डागम । पट्खण्डागम - यह वह महान् निधि है जिसे द्वादशांग वाणीका सीधा वारसा मिला है। आचार्य पुष्पदन्त और भूतबलीने आचार्य धरसेनके चरणों में बैठकर तथा उस काल में शेष रहे द्वादशांग वाणी के एकदेशका अभ्यास कर इस महान् ग्रन्थ की रचना की थी। इसके जीवस्थान, क्षुल्लकबन्ध, बन्धस्वामित्व, वेदना, वर्गणा और महाबन्ध इन छह खण्डों में द्वादशांग पाणी का संकलन किया गया है, इसलिए इसे मण्डा गम कहते हैं । सर्वार्थसिद्धिकारके सामने यह महान् ग्रन्थ उपस्थित था और उन्होंने इसका भरपूर उपयोग भी किया है यह बात तत्त्वार्थसूत्र अध्याय एक सूत्र सात और आठकी सर्वार्थसिद्धि टीकाके देखने से स्पष्ट ज्ञात होती है। इसमें निर्देश, स्वामित्व आदि के द्वारा और सत् संख्या, क्षेत्र, स्पर्शन, कान, अन्तर, भाव और पबहुत्व इन आठ अनुयोगोंके द्वारा चौदह गुणस्थान और चौदह मार्गणाओंके आश्रयसे जीव तत्वका जिस 1. अ० सू० 22 तत्वावार्तिक। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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