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________________ 372] सर्वार्थसिद्धी [1017 § 932 8932. आह, हेत्वर्थ: पुष्कलोऽपि दृष्टान्तसमर्थनमन्तरेणाभिप्रेतार्थसाधनाय नालमित्य त्रोच्यते श्राविद्धकुलालचक्रवद्व्यपगतलेपालाबुवदेरण्डबीजवदग्निशिखावच्च ॥7॥ 8933. पूर्व सूत्रे' विहितानां हेतुनामत्रोक्तानां दृष्टान्तानां च यथासंख्यमभिसंबन्धो भवति । तद्यथा - कुलालप्रयोगापादितहस्तदण्डचक्रसंयोगपूर्वकं भ्रमच्यम् । उपरतेऽपि तस्मिन्पूर्वप्रयोगादा संस्कारक्षयाद् भ्रमति । एवं भवस्थेनात्मनापवर्गप्राप्तये बहुशो यत्प्रणिधानं तदभावेऽपि तदावेशपूर्वक मुक्तस्य गमनमवसीयते । किं च, असङ्गत्वात् । यथा मृत्तिकालेपजनितगौरवमलाबुद्रव्यं जलेऽधः पतितं जलक्लेदविश्लिष्टमृत्तिकाबन्धनं लघु सदृध्वंमेव गच्छति तथा कर्मभाराकान्तिवशीकृत आत्मा तदावेश्वशात्संसारे अनियमेन गच्छति । तत्सङ्गविमुक्त स्तूपर्येवोपयाति । कि च, बन्धच्छेदात् । यथा बीजकोशबन्धच्छेदादेरण्डबीजस्य गति ष्टा तथा मनुष्याविभवप्रापकगति जातिनामादिसकलकर्मबन्धच्छेदान्मुक्तस्य ऊर्ध्वगतिरवसीयते । कि च, तथागतिपरिणामात् । यथा तिर्यक्प्लवनस्वभावसमीरण संबन्धनिरुत्सुका प्रदीपशिखा स्वभावादुत्पतति तथा मुक्तात्मापि नानागतिविकार कारणकर्मनिर्वारणे सत्यूर्ध्वगतिस्वभावा' दूर्ध्वमेवारोहति । 8934. आह, यदि मुक्त ऊर्ध्वगतिस्वभावो लोकान्तादूर्ध्वमपि कस्मान्नोत्पततीत्यत्रोच्यते 8932. कहते हैं, पुष्कल भी हेतु दृष्टान्त द्वारा समर्थनके बिना अभिप्रेत अर्थकी सिद्धि करने में समर्थ नहीं होते इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं घुमाये गये कुम्हारके चक्रके समान, लेपसे मुक्त हुई तुमड़ीके सम्मान, एरण्डके बीजके समान और अग्निकी शिखाकें समान ॥ 7 ॥ 8933. पिछले सूत्र में कहे गये हेतुओंका और इस सूत्रमें कहे गये दृष्टान्तोंका क्रमसे सम्बन्ध होता है । यथा- - कुम्हारके प्रयोगसे किया गया हाथ, दण्ड और चक्के संयोगपूर्वक जो भ्रमण होता है उसके उपरत हो जानेपर भी पूर्व प्रयोगवश संस्कारका क्षय होने तक चक्र घूमता रहता है । इसी प्रकार संसारमें स्थित आत्माने मोक्षकी प्राप्तिके लिए जो अनेक बार प्रणिधान किया है उसका अभाव होनेपर भी उसके आवेश पूर्वक मुक्त जीवका गमन जाना जाता है । असंगत्वात् - जिस प्रकार मृत्तिकाके लेपसे तुमड़ीमें जो भारीपन आ जाता है उससे जलके नीचे पड़ी हुई तुमड़ी जलसे मिट्टीके गीले हो जानेके कारण बन्धनके शिथिल होनेसे शीघ्र ही ऊपर ही जाती है उसी प्रकार कर्मभारके आक्रमणसे आधीन हुआ आत्मा उसके आवेशवश संसारमें अनियमसे गमन करता है किन्तु उसके संगसे मुक्त होनेपर ऊपर ही जाता है । बन्धच्छेदात्जिस प्रकार बीजकोशके बन्धनके टूटनेसे एरण्ड बीजकी ऊर्ध्वं गति देखी जाती है उसी प्रकार मनुष्यादि भवको प्राप्त करानेवाले गतिनाम और जातिनाम आदि समस्त कर्मोंके बन्धक छेद होने से मुक्त जीवकी ऊर्ध्वगति जानी जाती है । तथागतिपरिणामात् - जिस प्रकार तिर्यग्वहन . स्वभाववाले वायुके सम्बन्धसे रहित प्रदीपशिखा स्वभावसे ऊपरकी ओर गमन करती है उसी प्रकार मुक्त आत्मा भी नानागति रूप विकारके कारणभूत कर्मका अभाव होनेपर ऊर्ध्वगति स्वभाव होनेसे ऊपरकी ओर ही आरोहण करता है । 8934 कहते हैं कि यदि मुक्त जीव ऊर्ध्व गति स्वभाववाला है तो लोकान्दसे ऊपर भी किस कारण से नहीं गमन करता है, इसलिए यहाँ आगेका सूत्र कहते हैं -- 1. पूर्वसूत्रोदितानां मु. 2 - विप्रमुक्तौ तूपर्येदोप-- मु.। - विभुक्ते तूपर्धेवोप-ता । -विमुक्तोऽत्र दि. 1, दि. 21 3. -भावत्वादू-- सु. ! Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001443
Book TitleSarvarthasiddhi
Original Sutra AuthorDevnandi Maharaj
AuthorFulchandra Jain Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1997
Total Pages568
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size14 MB
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